भारत और पाकिस्तान के बीच हुए कई समझौते दशकों से दोनों देशों के रिश्तों का आधार बना हुआ है, लेकिन यह समझौता अभी भी अपने मूल उद्देश्य को पूरा नहीं कर रहा हैं। वर्ष 1960 में हुई थी सिंधु जल संधि, लेकिन आज बहस के केन्द्र बिंदु बना हुआ है। जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकवादी हमले के बाद से भारत अब इस संधि के प्रावधानों पर पुनर्विचार कर रहा है।
भारत और पाकिस्तान के बीच बहने वाली सिंधु नदी प्रणाली में मुख्यतः छह नदियाँ शामिल हैं। वह नादियाँ है - सतलज, ब्यास, रावी, सिंधु, चिनाब और झेलम। वर्ष 1947 में जब भारत का विभाजन हुआ था, तब इन नदियों का भी बंटवारा हुआ था। वर्ष 1960 में विश्व बैंक की 'गुड ऑफिस' भूमिका में भारत और पाकिस्तान के बीच एक संधि पर हस्ताक्षर हुआ था और इस समझौते के तहत भारत के लिए पूर्वी नदियाँ (सतलज, ब्यास, रावी) पूर्ण रूप से सुरक्षित रहीं। जबकि पश्चिमी नदियाँ (सिंधु, चिनाब, झेलम) — पाकिस्तान के लिए आरक्षित कर दी गईं, पर भारत को सीमित उपयोग की अनुमति दी गई (जैसे सिंचाई, बिजली उत्पादन)।
पाकिस्तान इस समझौता को 'अंतरराष्ट्रीय संधि' कहता है, जबकि वास्तव में यह समझौता भारत और पाकिस्तान के बीच एक द्विपक्षीय समझौता है। विश्व बैंक की भूमिका सिर्फ एक सुविधादाता की थी, न कि किसी मध्यस्थता की।
वर्ष 1947 में जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था, तब पाकिस्तान और भारत के बीच सिर्फ जमीन का ही नहीं बल्कि जल संसाधनों का भी विभाजन हुआ था। उत्तर-पश्चिम भारत की छह प्रमुख नदियां (सतलज, ब्यास, रावी, सिंधु, चिनाब और झेलम नदियां) इस बंटवारे की शिकार बनी थी। इनमें से सतलज, ब्यास और रावी पूर्वी नदियां हैं, जबकि सिंधु, चिनाब और झेलम पश्चिमी नदियों में आती हैं।
वर्ष 1960 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान के बीच वर्ल्ड बैंक की ‘गुड ऑफिसेस’ के तहत एक समझौता हुआ था, जिसे 'सिंधु जल संधि' कहा गया। इसमें यह तय हुआ था कि पूर्वी नदियों का पानी भारत उपयोग कर सकेगा और पश्चिमी नदियों का नियंत्रण पाकिस्तान को मिलेगा, हालांकि भारत को उनमें सीमित रूप से बिजली और सिंचाई का अधिकार होगा।
पाकिस्तान द्वारा बार - बार यह धारणा बनाई जाती है कि सिंधु जल संधि अंतरराष्ट्रीय संधि है और इसमें विश्व बैंक मध्यस्थ है, जबकि सच्चाई इससे अलग है। विश्व बैंक सिर्फ एक ‘सुविधादाता’ या ‘गुड ऑफिसर’ की भूमिका में था। यह पूरी तरह भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय समझौता है।
विश्व बैंक की मदद से पाकिस्तान को दुनियाभर के देशों से अपने नदी तंत्र के विकास के लिए भारी-भरकम वित्तीय सहायता मिली थी, जिससे वह तकनीकी और अवसंरचना के मामले में भारत से आगे निकल गया था।
भारत, सिंधु प्रणाली की सभी नदियों का उद्गम स्थल है, यानि जल का स्रोत है भारत, लेकिन समझौते में भारत को उस जल पर पूर्ण नियंत्रण नहीं मिला। जबकि एक ऊपरी तटीय राष्ट्र होने के कारण भारत को अधिक अधिकार मिलना चाहिए था।
ब्रिटिश काल में बनाए गए अधिकतर बांध, नहरें और सिंचाई परियोजनाएं पाकिस्तान के हिस्से में चली गईं। भारत के हिस्से में न तो पर्याप्त इंफ्रास्ट्रक्चर था, न ही पर्याप्त पानी। भाखड़ा नांगल बांध जैसी परियोजनाएं उस समय सिर्फ कागजों में थीं।
सिंधु जल संधि के अंतर्गत पाकिस्तान को झेलम, चिनाब और सिंधु नदियों के जल का पूर्ण अधिकार दिया गया। इससे पाकिस्तान ने अपने सिंचाई ढांचे को आधुनिक बनाया और कृषि उत्पादन में तेजी से बढ़ोतरी की। इस संधि से पाकिस्तान जीवन रेखा मिली। वहीं, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात ऐसे राज्य हैं जिन्हें कृषि योग्य भूमि तो मिली, लेकिन पानी नहीं। सतलज के आसपास का क्षेत्र वर्षों तक सूखा पड़ा रहा। इस कारण इन राज्यों में जल संसाधनों को लेकर हमेशा संकट की स्थिति रही है।
2025 के अप्रैल में हुए पहलगाम हमले में आतंकियों ने धर्म पूछकर पर्यटकों की हत्या की। इस घटना ने भारत को कड़ा रुख अपनाने पर मजबूर कर दिया। इस हमले की ज़िम्मेदारी लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े आतंकियों पर थी, जिसे पाकिस्तान की शह प्राप्त थी।
भारत ने इस हमले के बाद कई महत्वपूर्ण कूटनीतिक कदम उठाए हैं, जिनमें सिंधु जल संधि को स्थगित करना, पाकिस्तानी सैन्य सलाहकारों को अवांछित घोषित करना, पाकिस्तानी नागरिकों का वीजा रद्द करना, अटारी बॉर्डर को बंद करना और भारतीय सैन्य सलाहकारों को इस्लामाबाद से वापस बुलाना, शामिल है।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण कदम है भारत-पाकिस्तान सिंधु जल संधि का स्थगन, जो रणनीतिक दृष्टि से बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
कई दशकों तक भारत इस संधि के प्रावधानों का पालन करता रहा है, जबकि भारत में पाकिस्तान आतंकवाद फैलाता रहा है। भारत के जल को भारत अपने खिलाफ इस्तेमाल होते देखता रहा है जो एक नीतिगत विफलता मानी जाती रही है।
देखा जाए तो भारत अब यह संदेश देना चाहता है कि यदि पाकिस्तान आतंकवाद नहीं रोकेगा, तो भारत अपने प्राकृतिक संसाधनों का संपूर्ण उपयोग करने के लिए स्वतंत्र है। जल अब सिर्फ जीवनदायिनी धारा नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और कूटनीतिक औजार भी बन चुका है।
आज भारत के पास इतना इंफ्रास्ट्रक्चर है कि वह पश्चिमी नदियों के जल को सिंचाई और बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल कर सकता है। भाखड़ा-नांगल, फिरोजपुर बैराज जैसे परियोजनाएं पहले से मौजूद हैं। उनमें मामूली सुधार कर जल को नई दिशा दिया जा सकता है।
हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के सूखे क्षेत्रों को यदि सिंधु, चिनाब और झेलम से जल उपलब्ध कराया जाए, तो वहां हरियाली लौट सकती है। कृषि उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन आ सकता है। इससे अंतरराज्यीय जल विवाद भी काफी हद तक समाप्त हो सकता है।
कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भारत सिंधु जल संधि के समय अपनी स्थिति का बेहतर इस्तेमाल करता, तो कश्मीर मसले पर भी भारत, पाकिस्तान को झुका सकता था। जल के बदले में कश्मीर को लेकर समझौता संभव था।
यह संधि एक ऐसे समय में की गई जब पाकिस्तान आतंकवाद और अस्थिरता का रास्ता अपना रहा था। आज यह संधि भारत की सबसे बड़ी नीतिगत चूकों में गिनी जाती है।
भारत का यह कदम, वैश्विक समुदाय को भी यह संकेत देता है कि भविष्य में जल संसाधनों का कूटनीतिक इस्तेमाल बढ़ेगा। नील नदी, यांग्त्सी और अमेजन जैसे नदी तंत्रों पर भी विवाद अब तेज होते जा रहा है।
भारत का यह निर्णय जल संप्रभुता की ओर एक ठोस कदम है। अब वह अपने जल संसाधनों का नियंत्रण केवल शांति बनाए रखने के लिए नहीं, बल्कि रणनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए भी कर सकेगा।
भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि एक ऐतिहासिक समझौता थी, लेकिन समय और परिस्थितियों के साथ इसकी प्रासंगिकता बदल चुकी है। पाकिस्तान आज भी भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देता है और भारत जल से वंचित रहता है। यह नीति अब बदलने का सही वक्त आ गया है। अब भारत को चाहिए कि वह अपने अधिकारों का पूरी तरह इस्तेमाल करे और अपने जल संसाधनों को राष्ट्रीय हित में उपयोग करे। केवल शांति बनाए रखने के नाम पर अनावश्यक उदारता राष्ट्रहित में उचित नहीं है।
