बिहार चुनाव में कांग्रेस की आत्मघाती राजनीति दिखती है

Jitendra Kumar Sinha
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राजनीति, शेर के शिकार की तरह होती है। इसमें साहस, धैर्य, रणनीति और विवेक की आवश्यकता होती है। जो गलती से शेर के मुँह में हाथ डाल देता है, उसकी जान अनजाने में जाती है, परंतु जो जानबूझकर यह मूर्खता करता है, वह दरअसल पागलपन और आत्मघात की ओर बढ़ रहा होता है। बिहार चुनाव के संदर्भ में यदि कांग्रेस पार्टी की हालिया रणनीतियों और वक्तव्यों का विश्लेषण करें तो साफ झलकता है कि उन्होंने स्वयं को एक ऐसी ही स्थिति में पहुँचा दिया है जहाँ जीत की बाजी को हाथों से फिसलाना और फिर दोष दूसरों पर मढ़ना उनकी आदत बन चुकी है।

राजनीति में जैसे शेर का शिकार केवल ताकत से नहीं होता है, वैसे ही सत्ता की लड़ाई केवल नारेबाजी और भीड़ जुटाने से नहीं जीती जाती है। इसके लिए तीन बातें आवश्यक हैं रणनीति- सही समय पर सही कदम। धैर्य- जनता की नब्ज पकड़ने की कला। संवेदनशीलता- रिश्तों और भावनाओं की अहमियत। कांग्रेस इन तीनों में बार-बार चूक करती रही है। चुनावों में जब-जब उसे बढ़त मिली, किसी न किसी विवादित बयान या असंवेदनशील टिप्पणी ने जनता को उससे दूर कर दिया।

बिहार चुनाव में कांग्रेस का सफर पिछले कुछ वर्षों से निरंतर गिरावट का रहा है। इसका मुख्य कारण उनकी बार-बार की गई वही गलतियाँ हैं, जैसे- कांग्रेस राष्ट्रीय चेहरों के भरोसे चुनाव लड़ती रही है, जबकि बिहार जैसे राज्य में क्षेत्रीय मुद्दों और स्थानीय नेतृत्व की अहमियत सबसे ज्यादा है। आरजेडी के साथ रहते हुए भी कांग्रेस ने खुद को सहयोगी की बजाय आलोचक की तरह पेश किया। सबसे बड़ी गलती रही नरेन्द्र मोदी की दिवंगत माता को चुनावी बहस में घसीटना। इन गलतियों ने न केवल जनता का विश्वास तोड़ा, बल्कि सहयोगी दलों को भी असहज कर दिया।

भारतीय राजनीति का इतिहास गवाह है कि जिसने जनता के साथ आत्मीय रिश्ता बनाया, उसे सत्ता तक पहुँचने से कोई नहीं रोक पाया। अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता उनके संवेदनशील और काव्यमय व्यक्तित्व से जुड़ी थी। नीतीश कुमार ने बिहार में ‘सुशासन बाबू’ की छवि बनाई, जिसने उन्हें बार-बार मुख्यमंत्री की कुर्सी दिलाई। लालू प्रसाद यादव ने भले ही आलोचनाओं का सामना किया हो, लेकिन जनता से उनका रिश्ता दिल से जुड़ा हुआ था। इसके विपरीत, जब कांग्रेस ने व्यक्तिगत हमले और असंवेदनशील टिप्पणियाँ कीं, तो जनता ने इसे अपमानजनक ठहराया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की माता का देहांत भारतीय समाज के लिए केवल एक राजनीतिक घटना नहीं थी, बल्कि एक मानवीय क्षण था। भारतीय संस्कृति में माँ को पूजनीय माना जाता है। ऐसे में उनकी स्मृति पर राजनीति करना न केवल असंवेदनशील है, बल्कि यह जनता की भावनाओं का भी अपमान है।

कांग्रेस ने दूसरी बार इस मुद्दे को उठाकर दिखा दिया कि उसके लिए चुनाव जीतने की भूख मानवीय संवेदनाओं से बड़ी है। यही कारण है कि तेजस्वी यादव जैसे सहयोगी नेता भी कांग्रेस से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं और सफाई देने पर मजबूर हैं।

राजनीति में प्रतिद्वंद्विता स्वाभाविक है। विपक्ष का काम ही है सरकार की नीतियों की आलोचना करना। परंतु जब यह आलोचना व्यक्तिगत द्वेष में बदल जाए, तो जनता इसे स्वीकार नहीं करती। प्रतिद्वंद्विता का मतलब होता है नीतियों, विचारधारा और कामकाज पर सवाल उठाना। व्यक्तिगत द्वेष का मतलब होता है व्यक्तिगत जीवन, परिवार और निजी परिस्थितियों को राजनीति में घसीटना। कांग्रेस ने बार-बार दूसरे रास्ते को चुना है। यही उसकी सबसे बड़ी हार है।

बिहार की राजनीति में तेजस्वी यादव ने इस बार कांग्रेस की गलती को तुरंत भाँप लिया। उन्होंने लगातार सफाई दी और स्पष्ट किया कि उनकी पार्टी का इससे कोई संबंध नहीं है। यह तेजस्वी की राजनीतिक परिपक्वता का संकेत है। उन्होंने समझ लिया कि जनता को भावनात्मक चोट पहुँचाना राजनीतिक आत्महत्या है।

बिहार की जनता संवेदनशील है। वह गरीबी, बेरोज़गारी और पलायन जैसे मुद्दों से जूझ रही है। ऐसे में उसे यह कतई पसंद नहीं आता कि नेता व्यक्तिगत हमलों में उलझें। वह जनता चाहती है रोज़गार की गारंटी। शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार। कानून व्यवस्था की मजबूती। बुनियादी ढाँचे का विकास। जब कांग्रेस इन मुद्दों से भटककर व्यक्तिगत हमलों पर उतारू हो जाती है, तो जनता उसे नकार देती है।

कांग्रेस की स्थिति ऐसी हो गई है मानो जीतती हुई बाज़ी को स्वयं अपने हाथों से हार में बदलना उसकी आदत हो। जब सहयोगियों की ताकत का लाभ लेना चाहिए, तब वह उन्हें ही असहज कर देती है। जब जनता के मुद्दों को उठाना चाहिए, तब वह व्यक्तिगत हमलों में उलझ जाती है। जब सहानुभूति बटोरनी चाहिए, तब वह संवेदनहीनता दिखा देती है। यह प्रवृत्ति किसी भी राजनीतिक दल को गर्त में ले जाती है।

बिहार का राजनीतिक परिदृश्य हमेशा दिलचस्प रहा है। यहाँ जातिगत समीकरणों का गहरा प्रभाव है। यहाँ गठबंधन राजनीति ही निर्णायक रहती है। यहाँ जनता भावनाओं से अधिक संवेदनाओं को महत्व देती है। कांग्रेस यदि इन तीनों बातों को समझ पाती तो आज उसकी स्थिति कहीं बेहतर होती।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बिहार में प्रभाव काफी गहरा है। उनके खिलाफ चुनाव लड़ना आसान नहीं है। यदि कांग्रेस उनकी नीतियों, बेरोज़गारी, महँगाई या केंद्र की योजनाओं की खामियों पर बात करती तो शायद स्थिति अलग होती। लेकिन कांग्रेस ने व्यक्तिगत हमले कर मोदी को और अधिक सहानुभूति दिला दी। यह वही स्थिति है जैसे कोई शिकारी शेर को भड़काकर स्वयं उसके जबड़ों में चला जाए।

कांग्रेस यदि बिहार में खुद को बचाना चाहती है, तो उसे अपनी रणनीति बदलनी होगी। स्थानीय मुद्दों पर ध्यानदेते हुए रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे पर स्पष्ट दृष्टिकोण रखना होगा। संवेदनशीलता का परिचय देते हुए व्यक्तिगत हमलों से परहेज करना होगा। गठबंधन की मजबूती पर ध्यान देते हुए सहयोगी दलों का सम्मान करना होगा। युवा नेतृत्व को आगे लाना होगा और तेजस्वी जैसे नेताओं के साथ तालमेल बढ़ाना होगा। 

शेर के शिकार में गलती करने वाला शिकारी केवल एक बार जीवित रह सकता है, परंतु राजनीति में वही गलती बार-बार करने वाला दल लंबे समय तक टिक नहीं सकता है। कांग्रेस ने बिहार चुनाव में जिस तरह नरेन्द्र मोदी की माता को राजनीति में घसीटा है, वह उसकी सबसे बड़ी भूल है। यह प्रतिद्वंद्विता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत द्वेष है। जनता इसे बर्दाश्त नहीं करेगी। यही कारण है कि कांग्रेस की स्थिति बार-बार कमजोर होती जा रही है। यदि उसने अपनी रणनीति नहीं बदली तो आने वाले चुनावों में वह केवल दर्शक बनकर रह जाएगी।



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