महामाया शक्तिपीठ (देवी सती का कंठ गिरा था)

Jitendra Kumar Sinha
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आभा सिन्हा, पटना

भारत के पवित्र शक्तिपीठों की परंपरा धार्मिक और सांस्कृतिक धरोहर की रीढ़ है। यह वह स्थान है जहाँ माता सती के अंग, आभूषण या वस्त्र गिरे और वहाँ शक्ति तथा भैरव के रूप में दिव्य उपस्थिति स्थापित हुई। इन्हीं में से एक प्रमुख और पूज्यनीय शक्तिपीठ है “महामाया शक्तिपीठ”, जो कश्मीर के पहलगाम के निकट स्थित है। यहाँ माता का कंठ गिरा था, इसलिए इस स्थान की आध्यात्मिक महत्ता और भी अधिक बढ़ जाता है। इसकी शक्ति को महामाया और भैरव को त्रिसंध्येश्वर कहा जाता है।

भारत की आध्यात्मिक संस्कृति में शक्तिपीठों का विशेष स्थान है। देवी पुराण, तंत्रचूड़ामणि, कालिका पुराण तथा अन्य ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि भगवान शिव जब सती के शरीर को लेकर विचरण कर रहे थे, तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को खंडित कर दिया। उनके अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई।

इन शक्तिपीठों की संख्या अलग-अलग ग्रंथों में भिन्न मिलता है कहीं 51, कहीं 52 तो कहीं 108 का उल्लेख है। हर शक्तिपीठ के साथ शक्ति और भैरव का उपस्थिति अनिवार्य माना जाता है।

कश्मीर केवल अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं बल्कि अपने प्राचीन मंदिरों, गुफाओं और देवी-देवताओं के निवास के कारण भी प्रसिद्ध है। इसे अक्सर देवभूमि कहा जाता है। कश्मीर घाटी में स्थित शक्तिपीठों में “महामाया शक्तिपीठ” का विशेष महत्व है। पहलगाम, जो अपने हरे-भरे जंगलों, लिद्दर नदी और अमरनाथ यात्रा के आरंभिक स्थल के रूप में प्रसिद्ध है, वहीं इस पवित्र स्थल की उपस्थिति श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है।

मान्यता है कि जब माता सती ने अपने पिता दक्ष के यज्ञ में अपमान सहन न कर आत्मदाह किया, तो भगवान शिव व्याकुल होकर उनके शरीर को लेकर तीनों लोकों में घूमने लगे। इसी दौरान माता का कंठ इस स्थान पर गिरा।

चूँकि कंठ वाणी का केंद्र माना जाता है, इसलिए यह स्थल वाणी, शक्ति और सत्य की ऊर्जा का प्रतीक बन गया। यहाँ माता महामाया के रूप में पूजी जाती हैं। "महामाया" शब्द का अर्थ है, वह शक्ति जो समस्त जगत को अपनी माया से आवृत कर रखती है और साथ ही मुक्ति का मार्ग भी प्रदान करती है।

भैरव यहाँ त्रिसंध्येश्वर कहलाते हैं। त्रिसंध्या का अर्थ है प्रातः, मध्यान्ह और सायं काल की तीनों संध्याएँ। यह भैरव रूप समय, साधना और अध्यात्म का प्रतीक है।

महामाया केवल देवी का नाम मात्र नहीं है, बल्कि यह एक गहन दार्शनिक विचार है। महामाया वह शक्ति है जिसने इस जगत की रचना की। वह सभी प्राणियों की रक्षा करती हैं। असुरों और अधर्म का नाश करके धर्म की स्थापना करती हैं। महामाया का कंठ से संबंध वाणी और सत्य से भी है। भारतीय दर्शन में वाणी को ब्रह्म का स्वरूप माना गया है। ऋग्वेद में वाणी की महिमा गाई गई है , वही वाणी ज्ञान, भक्ति और शक्ति का स्रोत है।

महामाया शक्तिपीठ का मंदिर अपेक्षाकृत छोटा किंतु अत्यंत पवित्र स्थल है। पहलगाम की प्राकृतिक वादियों में बसा यह स्थान साधकों को आत्मिक शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान करता है। मंदिर में माता की प्रतिमा कंठस्वरूप में प्रतिष्ठित है। चारों ओर हिमालय की पर्वतमालाएँ और पास से बहती लिद्दर नदी इस स्थान को और भी पवित्र बनाती है। यात्रियों का कहना है कि यहाँ बैठकर साधना करने से मन की चंचलता शांत होती है और आत्मिक ऊर्जा की अनुभूति होती है।

भैरव का स्वरूप यहाँ विशेष है। त्रिसंध्येश्वर का तात्पर्य है वह शक्ति जो समय की हर संध्या पर साधक को साधना में स्थिर करती है। प्रातः संध्या में जागरण, मध्यान्ह में कर्म और सायं संध्या में विश्राम, ये तीनों ही अवस्थाएँ भैरव के अधीन हैं। यह भैरव रूप साधकों को समय की महत्ता का बोध कराता है और उन्हें तप, योग तथा ध्यान में स्थिर होने की प्रेरणा देता है।

महामाया शक्तिपीठ में प्रमुख रूप से नवरात्रि के अवसर पर विशेष उत्सव आयोजित होता है। श्रद्धालु माता की अखंड ज्योति प्रज्वलित करते हैं और दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं। चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि में यहाँ हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। महाशिवरात्रि में कश्मीर की परंपरा के अनुसार शिव और शक्ति की संयुक्त उपासना होती है। अमरनाथ यात्रा का समय यहाँ बड़ी संख्या में यात्री माता का आशीर्वाद लेने आते हैं।

कश्मीर की लोककथाओं, गीतों और परंपराओं में महामाया का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। कश्मीरी पंडित परिवार विशेष अवसरों पर महामाया का आह्वान करते हैं। देवी को संकट हरने वाली, रोग दूर करने वाली और समृद्धि प्रदान करने वाली माना जाता है। कश्मीर की सांस्कृतिक धरोहर में शक्ति की उपासना का स्थान अत्यंत ऊँचा है। शारदा पीठ, ज्वालामुखी, रघुनाथ मंदिर आदि के साथ-साथ महामाया शक्तिपीठ इस धरोहर का अभिन्न हिस्सा है।

श्रद्धालु बताते हैं कि जब वे पहलगाम के इस पवित्र स्थल पर पहुँचते हैं, तो उन्हें असीम शांति और शक्ति की अनुभूति होती है। चारों ओर का वातावरण साधना के लिए उपयुक्त है। बहुत से साधक यहाँ ध्यान और जप में लीन होकर आत्मज्ञान प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।

देवी भागवत पुराण और तंत्र चूड़ामणि में इस स्थान का उल्लेख मिलता है। देवी भागवत में कहा गया है कि माता महामाया वह शक्ति हैं जो समस्त ब्रह्मांड का संचालन करती हैं। यह स्थल कंठ से संबंधित है और कंठ से ही सत्य, धर्म और वाणी की उत्पत्ति होती है।

“महामाया शक्तिपीठ” केवल एक तीर्थ स्थल नहीं है, बल्कि यह साधना और आत्मज्ञान का केंद्र है। यहाँ साधक यह अनुभव करता है कि जगत की समस्त माया वास्तव में महामाया की ही देन है। कंठ का महत्व यहाँ इसलिए भी है क्योंकि साधना में जप और मंत्रोच्चार का प्रयोग कंठ से ही होता है। महामाया साधक को वाणी पर नियंत्रण और मंत्र शक्ति की सिद्धि प्रदान करती हैं।

आज के समय में जब भौतिकता और विज्ञान की ओर मनुष्य का झुकाव अधिक है, तब भी महामाया शक्तिपीठ जैसे स्थान यह स्मरण कराता है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य आत्मिक शांति और ईश्वर की प्राप्ति है। यहाँ आने वाले लोग न केवल धार्मिक आस्था से प्रेरित होते हैं बल्कि मानसिक शांति और आंतरिक ऊर्जा की तलाश में भी आते हैं।

“महामाया शक्तिपीठ” कश्मीर की घाटी में वह पवित्र स्थल है जहाँ माता का कंठ गिरा था। यहाँ महामाया के रूप में शक्ति और त्रिसंध्येश्वर के रूप में भैरव पूजित हैं। यह स्थान केवल श्रद्धा का केंद्र नहीं है बल्कि साधना और आत्मज्ञान की भूमि भी है। भारत की आध्यात्मिक धरोहर में यह शक्तिपीठ एक उज्ज्वल रत्न है, जो सदियों से श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता आ रहा है। प्रकृति की गोद में बसे इस स्थल की पवित्रता, धार्मिक महत्व और दार्शनिक गहराई इसे अद्वितीय बनाता है।



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