बंगाल के मदरसों में हुआ अनिवार्य - ‘वंदे मातरम’

Jitendra Kumar Sinha
0

 


पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य के सभी मदरसों में प्रार्थना सभाओं के दौरान ‘वंदे मातरम’ के गायन को तत्काल प्रभाव से अनिवार्य करने का निर्णय लिया है। यह निर्देश ऐसे समय में आया है जब कुछ ही दिन पहले राज्य सरकार ने सभी विद्यालयों में राष्ट्रगीत के गायन को आवश्यक बनाया था। अब यह व्यवस्था मदरसों तक भी विस्तारित कर दी गई है। 


मदरसा शिक्षा निदेशालय द्वारा जारी आदेश के अनुसार, यह नियम केवल सरकारी मॉडल मदरसों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी सहायता प्राप्त मदरसों, अनुमोदित शिशु शिक्षा केंद्रों, माध्यमिक शिक्षा केंद्रों और अल्पसंख्यक मामलों एवं मदरसा शिक्षा विभाग के अंतर्गत आने वाले मान्यता प्राप्त मदरसों पर भी लागू होगा। इससे स्पष्ट है कि सरकार इसे व्यापक स्तर पर लागू करना चाहती है।


विद्यालय और शिक्षा संस्थान केवल पढ़ाई-लिखाई के केंद्र नहीं होते हैं, बल्कि वे सामाजिक और राष्ट्रीय मूल्यों को विकसित करने के महत्वपूर्ण मंच भी होते हैं। प्रार्थना सभाएं विद्यार्थियों के भीतर अनुशासन, सामूहिकता और सांस्कृतिक चेतना विकसित करने का माध्यम मानी जाती हैं। ‘वंदे मातरम’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक रहा है। यह गीत लोगों में देशभक्ति और स्वतंत्रता के प्रति भावना जगाने में महत्वपूर्ण रहा। ऐसे में सरकार का तर्क हो सकता है कि सभी शैक्षणिक संस्थानों में इसके माध्यम से विद्यार्थियों में राष्ट्रीय भावना को मजबूत किया जाए। हालांकि भारत जैसे विविधता वाले देश में जब शिक्षा, संस्कृति और धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर निर्णय लिए जाते हैं, तब वे केवल प्रशासनिक आदेश नहीं रह जाते, बल्कि सामाजिक विमर्श का विषय भी बन जाते हैं।


‘वंदे मातरम’ भारतीय साहित्य और स्वतंत्रता आंदोलन की एक ऐतिहासिक धरोहर है। इसे प्रसिद्ध साहित्यकार बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास आनंदमठ में शामिल किया था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान यह गीत केवल शब्दों का समूह नहीं था, बल्कि आंदोलन का प्रेरणास्रोत बन गया था। अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने इसी गीत के साथ संघर्ष किया और इसे राष्ट्रीय जागरण के प्रतीक के रूप में अपनाया। हालांकि भारत ने बाद में ‘जन गण मन’ को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया, लेकिन ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया गया और इसकी ऐतिहासिक भूमिका को सम्मान प्रदान किया गया।


पश्चिम बंगाल सरकार का यह निर्णय आने वाले समय में राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन सकता है। भारत में मदरसे धार्मिक शिक्षा से जुड़े संस्थान माने जाते हैं और समय-समय पर इनके पाठ्यक्रम तथा प्रशासनिक ढांचे को लेकर बहस होती रही है। कुछ लोग इसे राष्ट्रीय एकता और समान शैक्षणिक वातावरण बनाने की दिशा में उठाया गया कदम मान सकते हैं। उनके अनुसार सभी संस्थानों में राष्ट्रगीत का गायन विद्यार्थियों के बीच समान नागरिक पहचान को मजबूत कर सकता है। दूसरी ओर कुछ वर्ग इसे धार्मिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता के संदर्भ में देख सकते हैं। भारत का संविधान विभिन्न समुदायों को अपनी परंपराओं और पहचान के अनुसार संस्थान संचालित करने का अधिकार देता है। इसलिए ऐसे आदेशों पर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आना स्वाभाविक है।


भारत में शिक्षा और राजनीति का संबंध हमेशा संवेदनशील विषय रहा है। शिक्षा को जहां राष्ट्रीय मूल्यों के विकास का माध्यम माना जाता है, वहीं यह भी अपेक्षा की जाती है कि शैक्षणिक संस्थानों में सामाजिक सद्भाव और विविधता का सम्मान बना रहे। सरकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही होती है कि वे राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने और विभिन्न समुदायों की संवेदनाओं के बीच संतुलन स्थापित करें। यदि संवाद और सहमति के साथ नीतियां लागू हों, तो उनका प्रभाव अधिक सकारात्मक हो सकता है।


बंगाल के मदरसों में ‘वंदे मातरम’ का गायन अनिवार्य करने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि यह शिक्षा, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी बड़ी बहस का हिस्सा बन सकता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि इस फैसले को समाज और संबंधित संस्थानों द्वारा किस प्रकार स्वीकार किया जाता है। एक लोकतांत्रिक और बहुलतावादी समाज में राष्ट्रीय एकता तथा विविधता, दोनों का सम्मान समान रूप से आवश्यक है। यही संतुलन किसी भी नीति की वास्तविक सफलता तय करता है।


एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top