पलायन की अवधारणा - “मजबूरी, महत्वाकांक्षा और राजनीति”

Jitendra Kumar Sinha
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समाज में एक बड़ा ही चर्चित शब्द है “पलायन”। यह शब्द सुनने में जितना सरल लगता है, उसकी परतों को समझना उतना ही कठिन है। सामान्यतः पलायन का अर्थ एक स्थान को छोड़कर दूसरे स्थान पर जाना माना जाता है, लेकिन यदि गहराई से देखा जाए तो पलायन केवल भौगोलिक नहीं होता है। यह विचारों का भी होता है, संबंधों का भी, संस्कृतियों का भी, मूल्यों का भी और राजनीति में तो यह दलों और सिद्धांतों का भी होता है।


मनुष्य के इतिहास का यदि अध्ययन किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि पृथ्वी पर सभ्यता का विकास ही पलायन के कारण संभव हुआ। आदिमानव भोजन और सुरक्षा की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान पर गया। कृषि का विकास हुआ तो लोग नदियों के किनारे बस गए। व्यापार बढ़ा तो नगर विकसित हुए। औद्योगिक क्रांति आई तो गांवों से शहरों की ओर पलायन हुआ। आज वैश्वीकरण के दौर में लोग देशों की सीमाएं पार कर रहे हैं अर्थात पलायन मानव जीवन की निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है।


जब यही प्रवृत्ति राजनीति में दिखाई देती है तो उसका नाम बदल जाता है। वहां इसे दलबदल कहा जाता है। शब्द बदल जाता है, परंतु मूल भावना वही रहती है एक स्थान, एक विचार या एक संगठन को छोड़कर दूसरे की ओर जाना।


संस्कृत में "पलायन" का अर्थ है दूर चले जाना, बच निकलना या किसी परिस्थिति से स्वयं को अलग कर लेना। सामान्य जीवन में यह कई रूपों में दिखाई देता है। कोई व्यक्ति गरीबी से बचने के लिए गांव छोड़ देता है। कोई विद्यार्थी बेहतर शिक्षा के लिए महानगर चला जाता है। कोई वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए विदेश चला जाता है। कोई कलाकार बड़े मंच की तलाश में महानगरों का रुख करता है। कोई कर्मचारी अधिक वेतन के लिए नौकरी बदल लेता है। इन सभी स्थितियों को हम पलायन नहीं बल्कि अवसर की तलाश कहते हैं। समाज इन्हें स्वीकार भी करता है। लेकिन जब कोई नेता एक दल छोड़कर दूसरे दल में जाता है तो समाज अचानक नैतिकता की कसौटी लेकर खड़ा हो जाता है। यहीं से प्रश्न प्रारंभ होता है कि क्या राजनीतिक दलबदल वास्तव में पलायन है या परिस्थितियों का परिणाम?


मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि मनुष्य तीन मूल प्रवृत्तियों से संचालित होता है। पहला सुरक्षा, दूसरा सम्मान और तीसरा अवसर।  जहां उसे ये तीनों नहीं मिलते, वहां से वह हटना चाहता है। यही कारण है कि कर्मचारी नौकरी बदलता है। विद्यार्थी विद्यालय बदलता है। खिलाड़ी टीम बदलता है। अभिनेता फिल्म निर्माण संस्था बदलता है। उद्योगपति नया निवेश स्थल खोजता है। नेता राजनीतिक दल बदलता है। यदि इन सभी घटनाओं का मूल कारण खोजा जाए तो पाएंगे कि व्यक्ति अपने लिए बेहतर भविष्य देखता है। इसलिए केवल राजनीति को दोष देना भी उचित नहीं होगा।


प्रत्येक पलायन के पीछे दो कारण प्रमुख होते हैं। पहला मजबूरी- जब व्यक्ति को लगता है कि वर्तमान स्थान पर उसका भविष्य सुरक्षित नहीं है, तब वह वहां से हट जाता है। जैसे- बेरोजगारी, भुखमरी, युद्ध, प्राकृतिक आपदा, सामाजिक भेदभाव, राजनीतिक उत्पीड़न। ये सभी मजबूरी के कारण होने वाले पलायन हैं। दूसरा महत्वाकांक्षा- यह वह स्थिति है जिसमें व्यक्ति अपनी क्षमता का बड़ा मंच चाहता है। उसे लगता है कि यदि वह वर्तमान स्थान पर रहेगा तो उसकी प्रतिभा सीमित रह जाएगी। इसलिए वह आगे बढ़ जाता है। इसे समाज प्रायः सफलता की कहानी मानता है।


राजनीति भी अंततः मनुष्यों द्वारा संचालित व्यवस्था है। यहां भी व्यक्ति सम्मान चाहता है। पद चाहता है। निर्णय लेने की शक्ति चाहता है। अपने समर्थकों को आगे बढ़ाना चाहता है। यदि उसे लगता है कि वर्तमान दल में उसकी उपेक्षा हो रही है तो उसके सामने तीन विकल्प होते हैं संघर्ष करे। प्रतीक्षा करे। दल बदल ले। तीसरा विकल्प सबसे अधिक विवादास्पद बन जाता है।


समाज का एक बड़ा विरोधाभास यह है कि वह अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही कार्य को अलग-अलग नाम देता है। व्यापार में इसे करियर ग्रोथ कहा जाता है। नौकरी में इसे बेहतर अवसर कहा जाता है। खेल में इसे ट्रांसफर कहा जाता है। फिल्म उद्योग में इसे नई शुरुआत कहा जाता है। लेकिन राजनीति में वही कार्य दलबदल बन जाता है। यही कारण है कि राजनीतिक पलायन हमेशा चर्चा का विषय बनता है।


हाल के दिनों में बिहार की राजनीति में भी एक महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन देखने को मिला। वर्षों तक एक दल की विचारधारा का मुखर समर्थन करने वाले एक प्रमुख नेता ने नया राजनीतिक रास्ता चुना। इस घटना ने फिर वही पुराना प्रश्न खड़ा कर दिया कि क्या यह विचारधारा का परिवर्तन है, राजनीतिक रणनीति है, व्यक्तिगत असंतोष है या भविष्य की संभावनाओं की तलाश?


ऐसी घटनाओं का मूल्यांकन केवल भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रक्रिया के व्यापक संदर्भ में किया जाना चाहिए। लोकतंत्र में दल बदलना वैधानिक रूप से संभव है, लेकिन जनता अक्सर यह देखती है कि परिवर्तन का कारण सार्वजनिक हित है या व्यक्तिगत राजनीतिक भविष्य। इसलिए किसी एक व्यक्ति या एक घटना के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय पूरे परिदृश्य को समझना अधिक उचित है।


राजनीतिक दल स्वयं समय-समय पर अपनी नीतियां बदलते रहे हैं। जो दल कभी निजीकरण के विरोध में थे, वे आज उसका समर्थन करते हैं। जो कभी गठबंधन राजनीति के विरोधी थे, वही बाद में गठबंधन सरकार चलाते हैं। जो कभी एक-दूसरे के कट्टर विरोधी थे, वे परिस्थितियों के अनुसार साथ भी आए हैं। इसलिए केवल व्यक्ति ही नहीं, संस्थाएं भी समय के साथ बदलती है।


भारत की राजनीति में अनेक ऐसे उदाहरण हैं जहां नेताओं ने दल बदले और बाद में मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री या बड़े राष्ट्रीय नेता बने। कुछ नेताओं ने दल छोड़कर नए दल बनाए। कुछ दल समाप्त हो गए। कुछ विलय हो गए। कुछ गठबंधन में बदल गए। यदि इतिहास को देखें तो राजनीति स्वयं निरंतर परिवर्तन का नाम है।


जनता की सबसे बड़ी अपेक्षा होती है कि नेता अपने विचारों पर टिके रहें। जब कोई नेता वर्षों तक किसी विचारधारा का समर्थन करता है और अचानक उसका विरोध करने लगता है, तब मतदाता स्वयं को ठगा हुआ महसूस कर सकता है। यही कारण है कि दलबदल पर सबसे अधिक नैतिक प्रश्न उठते हैं। लेकिन दूसरी ओर यह भी सत्य है कि यदि किसी दल के भीतर लोकतांत्रिक संवाद समाप्त हो जाए, तो वहां बने रहना भी कठिन हो सकता है। इसलिए प्रत्येक घटना की परिस्थितियाँ अलग होती है।


भारतीय राजनीति का यह प्रसिद्ध वाक्य वर्षों से दोहराया जाता रहा है कि "राजनीति में न कोई स्थायी मित्र होता है और न कोई स्थायी शत्रु, केवल हित स्थायी होते हैं।" यह कथन पूरी तरह आदर्शवादी नहीं है, लेकिन राजनीतिक व्यवहार में इसकी झलक अक्सर दिखाई देती है। चुनाव, गठबंधन, सामाजिक समीकरण और बदलती परिस्थितियाँ राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करती है। यही कारण है कि समय के साथ विरोधी दल भी साथ आ जाते हैं और पुराने सहयोगी अलग हो जाते हैं।


भारत में राजनीतिक दलबदल स्वतंत्रता के बाद से ही दिखाई देने लगा था, लेकिन 1967 के आम चुनावों के बाद यह प्रवृत्ति अत्यधिक चर्चा में आई। कई राज्यों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। गठबंधन सरकारें बनी और कुछ ही महीनों में विधायक दल बदलकर सरकारें गिराने और बनाने लगे। इसी दौर में एक वाक्य पूरे देश में प्रसिद्ध हुआ "आया राम, गया राम"। यह केवल एक व्यक्ति की घटना नहीं थी, बल्कि उस दौर की राजनीति का प्रतीक बन गया। इसके बाद दलबदल भारतीय राजनीति का स्थायी विषय बन गया।


1967 में हरियाणा के विधायक गया लाल ने कुछ ही दिनों में कई बार दल बदला। इस घटना ने पूरे देश में राजनीतिक नैतिकता पर बहस छेड़ दी। तब से "आया राम, गया राम" भारतीय राजनीति का ऐसा मुहावरा बन गया जो अवसरवादी दलबदल का पर्याय माना जाने लगा। यह घटना बताती है कि दलबदल कोई आधुनिक प्रवृत्ति नहीं है, यह लोकतांत्रिक राजनीति के विकास के साथ-साथ चलता रहा है।


1970 और 1980 के दशक तक कई राज्यों में सरकारें लगातार गिरती रही। विधायकों के दल बदलने से राजनीतिक अस्थिरता बढ़ी। जनता का विश्वास भी प्रभावित हुआ। इसी पृष्ठभूमि में 1985 में संविधान की दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) जोड़ी गई, जिसे सामान्यतः दलबदल विरोधी कानून कहा जाता है।


इस कानून का उद्देश्य था निर्वाचित प्रतिनिधियों की राजनीतिक निष्ठा बनाए रखना। सरकारों को अस्थिर होने से बचाना। धनबल और पद के लालच में होने वाले दलबदल पर रोक लगाना। मतदाताओं के जनादेश का सम्मान सुनिश्चित करना। हालाँकि समय के साथ इस कानून की भी अपनी सीमाएँ सामने आईं।


दलबदल विरोधी कानून बनने के बाद व्यक्तिगत स्तर पर दल बदलना कठिन हुआ, लेकिन राजनीतिक दलों ने नए रास्ते खोज लिए। आज कई बार देखने को मिलता है कि पूरी पार्टी का विलय हो जाता है। बड़े समूह के रूप में विधायक दल बदलते हैं। इस्तीफा देकर पुनः चुनाव लड़ा जाता है। नए गठबंधन बन जाते हैं अर्थात कानून ने प्रक्रिया को कठिन अवश्य बनाया, लेकिन दलबदल की राजनीति पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।


बिहार की राजनीति हमेशा से राष्ट्रीय राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र रही है। सामाजिक न्याय, जातीय समीकरण, गठबंधन राजनीति, क्षेत्रीय दलों का उदय और राष्ट्रीय दलों की रणनीति। इन सभी ने बिहार को राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत सक्रिय राज्य बनाया है। यहाँ समय-समय पर अनेक बड़े राजनीतिक पुनर्संयोजन हुए हैं। सहयोगी दल अलग हुए, विरोधी दल साथ आए, नए गठबंधन बने और पुराने टूटे। इसलिए बिहार की राजनीति में परिवर्तन कोई असामान्य घटना नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा रहा है।


सामान्य नागरिक की अपेक्षा बहुत सरल होती है। उसे चाहिए स्थिर सरकार। पारदर्शी प्रशासन। विकास। रोजगार। शिक्षा। स्वास्थ्य। सुरक्षा। यदि राजनीतिक परिवर्तन इन लक्ष्यों को मजबूत करता है, तो जनता उसे सकारात्मक दृष्टि से देख सकती है। यदि परिवर्तन केवल सत्ता-संतुलन तक सीमित रह जाए, तो उसके प्रति निराशा भी उत्पन्न हो सकती है।


पलायन को केवल नकारात्मक दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। यह मानव सभ्यता के विकास का भी आधार रहा है और व्यक्तिगत प्रगति का भी माध्यम। राजनीति में जब यही प्रक्रिया दलबदल के रूप में सामने आती है, तो उससे जुड़े नैतिक, वैचारिक और लोकतांत्रिक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठते हैं। किसी भी राजनीतिक परिवर्तन का मूल्यांकन तथ्यों, परिस्थितियों और उसके सार्वजनिक प्रभाव के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया के आधार पर। इसलिए यह कहना अधिक उचित होगा कि पलायन और दलबदल दोनों मानव निर्णय की प्रक्रियाएँ हैं, लेकिन उनका आकलन उनके उद्देश्य, परिस्थितियों और परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए।



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