ओटीटी दौर में पारिवारिक कहानियों का स्वरूप तेजी से बदल रहा है और इसी बदलाव की एक खूबसूरत मिसाल है कॉमेडी-ड्रामा वेब फिल्म ‘सिंगल पापा’। यह फिल्म सिर्फ मनोरंजन नहीं करती, बल्कि आज के बदलते भारतीय समाज, रिश्तों और पितृत्व की नई परिभाषा को भी सामने रखती है। हल्के-फुल्के हास्य के साथ गहरी भावनात्मक परतों को छूती यह कहानी दर्शकों को हंसाती भी है और सोचने पर भी मजबूर करती है।
फिल्म की कहानी गौरव गहलोत (कुणाल खेमू) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो हाल ही में तलाक से गुजर चुका है। टूटे हुए रिश्ते और भावनात्मक खालीपन के बीच गौरव एक ऐसा फैसला ले लेता है, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होती है कि वह एक बच्चे को गोद लेने का निर्णय करता है। यह फैसला न सिर्फ उसके जीवन को पूरी तरह बदल देता है, बल्कि उसके पारंपरिक भारतीय परिवार को भी असमंजस में डाल देता है। समाज की तयशुदा धारणाएं, रिश्तेदारों की प्रतिक्रियाएं और परिवार की चिंता, इन सबके बीच गौरव का सफर आसान नहीं होता है।
‘सिंगल पापा’ की सबसे बड़ी ताकत इसकी ईमानदार प्रस्तुति है। यह फिल्म यह दिखाती है कि पिता होना सिर्फ आर्थिक जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि भावनात्मक समझ, धैर्य और प्रेम का भी नाम है। एक अकेला पुरुष जब बच्चे की परवरिश की जिम्मेदारी उठाता है, तो उसे किन सामाजिक सवालों, व्यावहारिक चुनौतियों और आत्मसंघर्षों से गुजरना पड़ता है, फिल्म इन्हें बेहद सहज ढंग से पेश करती है।
अभिनय की बात करें तो कुणाल खेमू ने गौरव के किरदार में जान डाल दी है। उनका अभिनय कहीं भी बनावटी नहीं लगता है। एक उलझा हुआ, लेकिन संवेदनशील इंसान, इस किरदार को उन्होंने सादगी और गहराई के साथ निभाया है। मनोज पाहवा पारिवारिक मुखिया के रूप में अपनी खास कॉमिक टाइमिंग और भावनात्मक संतुलन से कहानी को मजबूती देते हैं। आयशा रजा और नेहा धूपिया अपने-अपने किरदारों में प्रभाव छोड़ती हैं, वहीं प्राजक्ता कोली युवा दर्शकों से खास जुड़ाव बनाती हैं।
निर्देशक शशांक खैतान और लेखिका इशिता मोइत्रा ने मिलकर कहानी को न तो जरूरत से ज्यादा गंभीर बनाया है और न ही सिर्फ कॉमेडी तक सीमित रखा है। हास्य और भावनाओं का संतुलन इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है। संवाद सरल हैं, लेकिन असरदार हैं, और कई दृश्य ऐसा है जो दिल को छू जाता है। ‘सिंगल पापा’ एक ऐसी फिल्म है जो परिवार के साथ बैठकर देखा जा सकता है।
