आज के दौर में जब जलवायु परिवर्तन, जंगलों की अंधाधुंध कटाई और प्रकृति के दोहन से पूरी दुनिया जूझ रही है, ऐसे समय में केन्या के न्येरी शहर से आई एक खबर ने वैश्विक स्तर पर लोगों का ध्यान खींचा है। यहां एक महिला ने लगातार 72 घंटे तक एक पेड़ को गले लगाकर न सिर्फ नया विश्व रिकॉर्ड बनाया है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए एक बेहद सशक्त और भावनात्मक संदेश भी दिया है।
यह महिला कोई मंचीय भाषण देने या नारे लगाने नहीं आई थी। उसका विरोध शांत था, मगर असरदार। उसने एक पेड़ को बाहों में भरकर यह दिखाया कि प्रकृति के साथ इंसान का रिश्ता केवल उपयोग का नहीं, बल्कि अपनत्व और जिम्मेदारी का भी है। तीन दिन और तीन रात तक बिना पेड़ छोड़े खड़े रहना आसान नहीं था। नींद, थकान और शारीरिक पीड़ा के बावजूद उसने अपना संकल्प नहीं छोड़ा।
महिला का कहना था कि जंगलों की कटाई और जलवायु परिवर्तन ने पूरी मानवता के भविष्य को खतरे में डाल दिया है। अगर आज भी इंसान नहीं चेता, तो आने वाली पीढ़ियों को सांस लेने के लिए शुद्ध हवा और पीने के लिए साफ पानी तक नसीब नहीं होगा। उसका यह अनूठा प्रदर्शन इस बात का प्रतीक था कि विरोध हमेशा आक्रामक या हिंसक ही हो, यह जरूरी नहीं है। प्रेम, करुणा और धैर्य के जरिए भी दुनिया को झकझोरा जा सकता है।
इस दौरान उसके समर्थक लगातार उसके साथ मौजूद रहे। जब उसे नींद आने लगती थी, तो वे उसे बातचीत, गीतों और नारों के जरिए जगाए रखते थे। यह सामूहिक प्रयास धीरे-धीरे एक आंदोलन जैसा रूप लेता गया। आसपास के लोग रुक-रुककर इस दृश्य को देखने लगे और पर्यावरण पर चर्चा करने लगे। सोशल मीडिया के जरिए यह खबर तेजी से पूरी दुनिया में फैल गई।
यह घटना भारत में चिपको आंदोलन की याद दिलाती है, जहां ग्रामीण महिलाओं ने पेड़ों से लिपटकर उन्हें कटने से बचाया था। केन्या की इस महिला ने उसी परंपरा को वैश्विक मंच पर फिर से जीवित कर दिया। उसने यह साबित कर दिया कि प्रकृति की रक्षा के लिए बड़े संसाधनों या ताकत की नहीं, बल्कि मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत होती है।
आज जब पर्यावरण संरक्षण अक्सर सरकारी नीतियों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों तक सीमित रह जाता है, तब ऐसे व्यक्तिगत प्रयास लोगों के दिलों को छूते हैं। यह 72 घंटे का रिकॉर्ड केवल समय की गणना नहीं है, बल्कि यह उस धैर्य, समर्पण और प्रेम की कहानी है, जो इंसान और प्रकृति के बीच फिर से जुड़ाव की उम्मीद जगाती है।
यह महिला याद दिलाती है कि अगर एक इंसान अकेले खड़े होकर इतना बड़ा संदेश दे सकता है, तो सोचिए अगर पूरी मानवता प्रकृति को गले लगा ले, तो दुनिया कितनी सुंदर और सुरक्षित हो सकती है।
