वाशिंगटन से आई एक खबर ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और भू-राजनीतिक संवेदनशीलताओं को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है। अमेरिका ने वह सोशल मीडिया पोस्ट हटा ली है, जिसमें पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) और चीन के कब्जे वाले अक्साई चिन को भारत के मानचित्र में उसके हिस्से के रूप में दर्शाया गया था। यह पोस्ट यूनाइटेड स्टेट्स ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव (USTR) द्वारा भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के संदर्भ में साझा की गई थी। पोस्ट हटाए जाने के बाद इस कदम के पीछे के कारणों और इसके संभावित कूटनीतिक प्रभावों को लेकर बहस तेज हो गई है।
फरवरी में भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक समझौते को लेकर सकारात्मक माहौल बना था। इसी क्रम में USTR ने भारत का एक मानचित्र साझा किया था, जिसमें जम्मू-कश्मीर का पूरा क्षेत्र, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर और चीन के नियंत्रण वाला अक्साई चिन भी शामिल है, भारत का अभिन्न हिस्सा दिखाया गया था।
यह प्रस्तुति भारत की आधिकारिक स्थिति के अनुरूप थी, क्योंकि भारत लगातार यह कहता आया है कि पूरा जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उसका अभिन्न अंग है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इन क्षेत्रों को विवादित माना जाता है और कई देश अपने आधिकारिक दस्तावेजों में सावधानी बरतते हैं। पोस्ट के सार्वजनिक होने के बाद कुछ अंतरराष्ट्रीय हलकों और पाकिस्तान से जुड़े समूहों ने इस पर आपत्ति जताई है। इसके बाद अमेरिकी प्रशासन ने वह पोस्ट हटा दी।
अमेरिका लंबे समय से दक्षिण एशिया में संतुलन की नीति अपनाता आया है। भारत के साथ उसके रणनीतिक और आर्थिक संबंध लगातार मजबूत हो रहे हैं, वहीं पाकिस्तान के साथ भी उसके ऐतिहासिक और सुरक्षा संबंध रहे हैं।
कश्मीर मुद्दे पर अमेरिका आमतौर पर इसे “द्विपक्षीय मामला” बताता है और भारत-पाकिस्तान को आपसी बातचीत से समाधान निकालने की सलाह देता है। ऐसे में किसी आधिकारिक अमेरिकी संस्था द्वारा विवादित क्षेत्र को स्पष्ट रूप से भारत का हिस्सा दिखाना पाकिस्तान के लिए कूटनीतिक झटका माना जा सकता था। विशेषज्ञों का मानना है कि पोस्ट हटाने का निर्णय इसी संतुलन को बनाए रखने की कोशिश का हिस्सा हो सकता है।
भारत का रुख स्पष्ट और लगातार एक जैसा रहा है। भारत सरकार का कहना है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का पूरा क्षेत्र, जिसमें पीओके और अक्साई चिन शामिल हैं, भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है।
2019 में अनुच्छेद 370 हटाने और जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के बाद भारत ने अपने आधिकारिक मानचित्र में इन क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से शामिल किया है। भारत का यह भी कहना है कि पाकिस्तान ने अवैध रूप से कुछ हिस्सों पर कब्जा कर रखा है और चीन ने 1962 के युद्ध के बाद अक्साई चिन पर नियंत्रण स्थापित किया है। इस दृष्टि से देखा जाए तो अमेरिकी पोस्ट में दिखाया गया मानचित्र भारत की संवैधानिक स्थिति के अनुरूप था।
अमेरिका द्वारा पोस्ट हटाना कई तरह के संकेत देता है। पहला, यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानचित्र संबंधी प्रस्तुति बेहद संवेदनशील विषय है। दूसरा, यह बताता है कि अमेरिका आधिकारिक स्तर पर किसी भी ऐसे कदम से बचना चाहता है, जिससे क्षेत्रीय तनाव बढ़े।
इस घटना से भारत-अमेरिका संबंधों में किसी बड़े बदलाव की संभावना कम मानी जा रही है। दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में सहयोग तेजी से बढ़ रहा है। इंडो-पैसिफिक रणनीति के तहत भी भारत अमेरिका का प्रमुख साझेदार है। फिर भी, यह घटना यह याद दिलाती है कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में प्रतीकों और मानचित्रों का महत्व कम नहीं होता है।
मानचित्र केवल भौगोलिक चित्रण नहीं होता है, बल्कि वह राजनीतिक दावों और संप्रभुता की अभिव्यक्ति भी होता है। किसी देश द्वारा किसी क्षेत्र को मानचित्र में दिखाना या न दिखाना उसके राजनीतिक रुख का संकेत माना जाता है।
इसी कारण से कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां और संस्थाएं मानचित्र प्रकाशित करते समय विशेष सावधानी बरतती हैं। गूगल, एप्पल जैसी टेक कंपनियां भी अलग-अलग देशों में स्थानीय कानूनों के अनुसार मानचित्र प्रदर्शित करती हैं। अमेरिका की इस पोस्ट को हटाने की घटना भी इसी व्यापक संदर्भ में देखी जा सकती है।
अमेरिका द्वारा भारत का विस्तृत मानचित्र दिखाने वाली पोस्ट हटाना एक कूटनीतिक कदम माना जा सकता है, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना है। हालांकि यह कदम भारत की आधिकारिक स्थिति के विपरीत नहीं था, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवादित क्षेत्रों को लेकर संवेदनशीलता के कारण इसे वापस लिया गया प्रतीत होता है।
यह घटना दर्शाती है कि वैश्विक राजनीति में प्रतीकात्मक कदम भी महत्वपूर्ण होते हैं। भारत और अमेरिका के मजबूत होते संबंधों के बीच यह प्रकरण एक छोटी सी कूटनीतिक झलक है, जो बताता है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में हर कदम सोच-समझकर उठाया जाता है।
