बचत की आदत - असुरक्षा का डर - मध्यमवर्गीय बुजुर्ग की अधूरी कर दी है जिन्दगी

Jitendra Kumar Sinha
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भारत जैसे देश में “बचत” केवल एक आर्थिक आदत नहीं रही, बल्कि यह एक संस्कार की तरह पीढ़ियों से लोगों के भीतर बैठी हुई है। हमारे माता-पिता और दादा-दादी की पीढ़ी ने एक ऐसे दौर में जीवन बिताया, जहां नौकरी की सुरक्षा सीमित थी, सुविधाएं कम थी, महंगाई का डर हमेशा सिर पर मंडराता था और भविष्य पूरी तरह अनिश्चित दिखाई देता था। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश हिस्सा “आज कम खर्च करो ताकि कल सुरक्षित रहो” की सोच के साथ बिताया। यही कारण है कि आज जब वे रिटायरमेंट की उम्र में पहुंच चुके हैं, तब भी उनके भीतर पैसों को लेकर वही डर, वही असुरक्षा और वही कमी की मानसिकता जिंदा है। 


विडंबना यह है कि जिन लोगों ने पूरी जिन्दगी अपने परिवार के लिए कमाया, बचाया, घर बनाया, बच्चों को पढ़ाया और करोड़ों की संपत्ति खड़ी की, वही लोग अपने जीवन के आखिरी पड़ाव में खुद पर पैसा खर्च करने से डरते हैं। उनके बैंक खातों में पैसे पड़े रहते हैं, एफडी सुरक्षित रहती है, जमीन-जायदाद बनी रहती है, लेकिन उनका अपना जीवन अधूरा और असुविधाओं से भरा रह जाता है। वे सोचते रहते हैं कि “अगर आगे जरूरत पड़ गई तो?”, “अगर बीमारी आ गई तो?”, “अगर पैसा खत्म हो गया तो?” और इसी डर में वे जीना भूल जाते हैं।


आज की युवा पीढ़ी जिस दौर में जी रही है, वह उपभोग और सुविधाओं का दौर है। लेकिन आज से 40-50 वर्ष पहले भारत की आर्थिक स्थिति बिल्कुल अलग थी। उस समय मध्यम वर्ग के पास सीमित साधन होते थे। घर चलाना, बच्चों की पढ़ाई कराना, शादी करवाना और एक छोटा-सा घर बना लेना ही बहुत बड़ी उपलब्धि मानी जाती थी। उस दौर में आर्थिक सुरक्षा का कोई मजबूत ढांचा नहीं था। पेंशन हर किसी को नहीं मिलती थी, स्वास्थ्य बीमा बहुत कम लोगों के पास होता था और मेडिकल सुविधाएं भी महंगी लगती थी।


ऐसे समय में लोगों ने अपने जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य “बचत” को बना लिया। वे हर छोटी चीज में पैसे बचाने की कोशिश करते थे। नया कपड़ा त्योहारों में ही खरीदा जाता था, बाहर खाना विलासिता माना जाता था, यात्रा केवल जरूरत पड़ने पर की जाती थी और अपने शौकों को अक्सर दबा दिया जाता था। धीरे-धीरे यह सोच उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गई। समस्या तब शुरू होती है जब यही मानसिकता रिटायरमेंट के बाद भी बनी रहती है। उम्र बदल जाती है, बैंक बैलेंस बढ़ जाता है, बच्चे आत्मनिर्भर हो जाते हैं, लेकिन दिमाग वही पुरानी असुरक्षा में फंसा रहता है। व्यक्ति करोड़पति हो सकता है, लेकिन मानसिक रूप से वह खुद को अब भी संघर्षरत महसूस करता है।


रिटायरमेंट के बाद नियमित आय का स्रोत बंद हो जाता है। नौकरी का वेतन नहीं आता, व्यवसाय की सक्रियता कम हो जाती है और व्यक्ति को लगता है कि अब जो पैसा है, वही जीवनभर चलाना है। यही सोच धीरे-धीरे डर में बदल जाती है। बहुत से बुजुर्गों को यह एहसास ही नहीं हो पाता है कि उन्होंने जितना पैसा जमा किया है, वह उनके जीवन के लिए पर्याप्त से भी अधिक है। वे अपने खर्चों का वास्तविक आकलन नहीं करते हैं। उन्हें केवल इतना दिखाई देता है कि अब कमाई बंद हो चुकी है। इस कारण वे हर खर्च को खतरे की तरह देखने लगते हैं। कई लोग बैंक में करोड़ों रुपए होने के बावजूद केवल एफडी के ब्याज पर जिन्दगी काटते रहते हैं। वे मूल रकम को छूना ही नहीं चाहते। उन्हें लगता है कि मूल पैसा खत्म हो गया तो वे असुरक्षित हो जाएंगे। जबकि वास्तविकता यह है कि महंगाई धीरे-धीरे उनकी बचत की ताकत को कम करती रहती है। जो पैसा उन्होंने “भविष्य की सुरक्षा” के लिए बचाया था, वही पैसा उनके वर्तमान की खुशियों को निगलने लगता है।


हमारे समाज में त्याग को बहुत बड़ा गुण माना जाता है। खासकर माता-पिता की पीढ़ी ने हमेशा अपने बच्चों और परिवार को खुद से ऊपर रखा। उन्होंने अपने सपनों को पीछे छोड़ दिया ताकि उनके बच्चे बेहतर जिन्दगी जी सके। यही कारण है कि बहुत से बुजुर्ग अपने ऊपर खर्च करना गलत समझते हैं। उन्हें लगता है कि महंगा इलाज करवाना, अच्छी यात्रा करना, आरामदायक होटल में रुकना या अपने शौकों पर पैसा खर्च करना फिजूलखर्ची है। वे यह सोच ही नहीं पाते कि उन्होंने पूरी जिन्दगी मेहनत इसलिए की थी ताकि जीवन के अंतिम वर्षों में थोड़ा सुकून और आनंद पा सकें। कई बुजुर्ग आज भी गर्मी में एसी चलाने से बचते हैं। वे अच्छे कपड़े खरीदने में संकोच करते हैं। स्लिपर क्लास में सफर करते हैं जबकि आराम से एसी कोच का टिकट खरीद सकते हैं। वे खुद को तकलीफ देकर बचत करते रहते हैं। यह समझदारी नहीं, बल्कि वर्षों से बनी मानसिक कैद है।


भारत में बुजुर्गों की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि वे अपनी सेहत पर पैसा खर्च करने से बचते हैं। घुटनों का ऑपरेशन टालना, दांतों का इलाज न करवाना, आंखों के मोतियाबिंद को नजरअंदाज करना, नियमित हेल्थ चेकअप न कराना,  ये सब बहुत सामान्य बातें हैं। इसके पीछे केवल पैसा नहीं, बल्कि मानसिकता जिम्मेदार है। उन्हें लगता है कि “इतना पैसा खर्च क्यों करें?” जबकि वास्तविकता यह है कि स्वास्थ्य पर खर्च किया गया पैसा खर्च नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता में निवेश होता है। कई बार बच्चे भी अपने माता-पिता को समझाने की कोशिश करते हैं कि वे अच्छे अस्पताल में इलाज करवा लें, लेकिन बुजुर्ग मना कर देते हैं। वे सोचते हैं कि पैसा बचाकर अगली पीढ़ी के लिए छोड़ना ज्यादा जरूरी है। लेकिन दुखद सच यह है कि वही लोग अपनी आखिरी उम्र दर्द, असुविधा और अधूरेपन में बिताते हैं।


हर इंसान के भीतर कुछ छोटे-छोटे सपने होते हैं। कोई देश घूमना चाहता है, कोई पहाड़ देखना चाहता है, कोई संगीत सीखना चाहता है, कोई किताबें लिखना चाहता है, कोई आराम से समुद्र किनारे समय बिताना चाहता है। लेकिन भारतीय मध्यम वर्ग की एक बड़ी पीढ़ी ने अपने अधिकांश सपनों को “रिटायरमेंट के बाद” के लिए टाल दिया। उन्होंने सोचा कि पहले बच्चों की पढ़ाई पूरी हो जाए, फिर शादी हो जाए, फिर घर बन जाए, फिर जिम्मेदारियां खत्म हो जाएं।  उसके बाद वे अपने लिए जिएंगे। लेकिन जब वह समय आया, तब तक शरीर थक चुका था, ऊर्जा कम हो चुकी थी और मन डर से भर चुका था। फिर वही लोग कहते हैं कि “काश थोड़ा घूम लिया होता…”, “काश खुद पर खर्च किया होता…”, “काश जिन्दगी को थोड़ा जी लिया होता…”।  यह पछतावा केवल पैसों का नहीं, बल्कि छूटे हुए जीवन का होता है।


हमारे समाज में सफलता को अक्सर संपत्ति से मापा जाता है। जिसके पास बड़ा घर है, बैंक बैलेंस है, जमीन है, उसे सफल माना जाता है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या वह व्यक्ति अपने जीवन में खुश भी था? कई लोग पूरी जिन्दगी केवल संपत्ति जोड़ते रहते हैं। वे इतना अधिक भविष्य के बारे में सोचते हैं कि वर्तमान जीना भूल जाते हैं। वे हमेशा अगले संकट के लिए तैयारी करते रहते हैं। लेकिन जीवन केवल सुरक्षा का नाम नहीं है। जीवन अनुभवों, रिश्तों, यादों और संतुलन का भी नाम है। यदि कोई व्यक्ति करोड़ों रुपए छोड़ जाए लेकिन अपने जीवन में कभी सुकून से यात्रा न कर पाया हो, कभी अपने मन का खाना न खा पाया हो, कभी अपने शौक पूरे न कर पाया हो, तो क्या वह वास्तव में समृद्ध जीवन था?


भारतीय माता-पिता की एक और बड़ी सोच यह होती है कि वे अपनी सारी संपत्ति बच्चों के लिए छोड़कर जाएं। वे खुद पर खर्च करने से इसलिए भी डरते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे बच्चों का हिस्सा कम हो जाएगा। लेकिन समय बदल चुका है। आज की युवा पीढ़ी पहले से ज्यादा आत्मनिर्भर है। बहुत से बच्चे चाहते हैं कि उनके माता-पिता आराम से जीवन जिएं, अच्छे अस्पताल जाएं, घूमने जाएं और खुद पर पैसा खर्च करें। उन्हें विरासत में केवल पैसा नहीं, बल्कि अपने माता-पिता की खुशियां भी चाहिए। दुखद बात यह है कि कई बुजुर्ग यह समझ ही नहीं पाते हैं। वे पूरी जिन्दगी त्याग करते रहते हैं और अंत में अपने ही जीवन का आनंद नहीं ले पाते हैं।


यह भी सच है कि बुजुर्गों का डर पूरी तरह गलत नहीं होता है। स्वास्थ्य खर्च लगातार बढ़ रहे हैं। महंगाई भी बड़ी चिंता है। मेडिकल इमरजेंसी कभी भी आ सकती है। इसलिए आर्थिक सुरक्षा जरूरी है। लेकिन समस्या तब होती है जब सुरक्षा की आवश्यकता “अत्यधिक डर” में बदल जाती है। संतुलन सबसे महत्वपूर्ण चीज है। पैसा बचाना जरूरी है, लेकिन इतना भी नहीं कि इंसान जीवन जीना भूल जाए। यदि किसी व्यक्ति ने अपने रिटायरमेंट की सही योजना बनाई है, पर्याप्त बचत है और नियमित खर्चों का अनुमान है, तो उसे खुद पर खर्च करने में अपराधबोध नहीं होना चाहिए।


रिटायरमेंट के बाद जीवन खत्म नहीं होता है, बल्कि एक नया अध्याय शुरू होता है। यह वह समय होना चाहिए जब व्यक्ति बिना भागदौड़ के अपने जीवन का आनंद ले सके। लेकिन इसके लिए सबसे पहले मानसिकता बदलनी होगी। बुजुर्गों को यह समझना होगा कि पैसा केवल जमा करने के लिए नहीं होता है। उसका उद्देश्य जीवन को बेहतर बनाना भी है। यदि पैसा आपकी सुविधा, स्वास्थ्य और खुशी के काम नहीं आ रहा है, तो फिर उसका क्या अर्थ है? अपने ऊपर खर्च करना स्वार्थ नहीं है। अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं लेना फिजूलखर्ची नहीं है। आरामदायक यात्रा करना अपराध नहीं है। अपने शौक पूरे करना गलत नहीं है। जीवन के अंतिम वर्षों में सुकून से जीना हर इंसान का अधिकार है।


रिटायरमेंट का अर्थ केवल नौकरी से छुट्टी नहीं होना चाहिए। इसका अर्थ होना चाहिए  कि सुबह बिना तनाव के उठना…। अपने मन की जगहों पर घूमना…। पुराने शौक पूरे करना…। परिवार के साथ समय बिताना…। स्वास्थ्य का ध्यान रखना… और सबसे जरूरी है, अपने जीवन को महसूस करना। यदि कोई व्यक्ति पूरी जिन्दगी केवल बचत करता रहा और अंत में उस बचत का उपयोग ही नहीं कर पाया, तो कहीं न कहीं वह जीवन अधूरा रह जाता है।


आज की युवा पीढ़ी को भी इस कहानी से सीख लेनी चाहिए। केवल भविष्य के लिए जीना भी गलत है और केवल वर्तमान में खर्च करना भी गलत है। सही रास्ता संतुलन का है। बचत जरूरी है, निवेश जरूरी है, आर्थिक सुरक्षा जरूरी है।  लेकिन साथ ही जीवन के छोटे-छोटे आनंद भी जरूरी हैं। अपने माता-पिता की तरह पूरी जिन्दगी खुद को रोकते रहना भी सही नहीं है। हमें ऐसा जीवन बनाना चाहिए जिसमें भविष्य सुरक्षित हो और वर्तमान भी सुंदर हो।


जीवन का सबसे बड़ा दुख गरीब होना नहीं है, बल्कि जीवनभर मेहनत करने के बाद भी जीवन का आनंद न ले पाना है। हमारे देश में लाखों बुजुर्ग आर्थिक रूप से सुरक्षित होने के बावजूद मानसिक रूप से अभाव में जी रहे हैं। वे खर्च करने से डरते हैं, खुद पर पैसा लगाने में अपराधबोध महसूस करते हैं और अंत में पछतावे के साथ जीवन बिताते हैं। पैसा जरूरी है, लेकिन पैसा जीवन से बड़ा नहीं है। बचत जरूरी है, लेकिन खुशियां उससे भी ज्यादा जरूरी हैं। सुरक्षा जरूरी है, लेकिन जीना उससे भी ज्यादा जरूरी है। इसलिए रिटायरमेंट के बाद सबसे जरूरी निवेश बैंक बैलेंस में नहीं, बल्कि अपने स्वास्थ्य, अपने अनुभवों और अपनी खुशियों में होना चाहिए। क्योंकि अंत में इंसान यह याद नहीं रखता है कि उसके खाते में कितने रुपए थे। 



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