16 एफडीसी दवाओं पर लगा प्रतिबंध

Jitendra Kumar Sinha
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भारत में दवाओं का उपयोग केवल रोगों के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह करोड़ों लोगों के जीवन और स्वास्थ्य से सीधे जुड़ा हुआ विषय है। जब कोई व्यक्ति चिकित्सक के पास जाता है, तो उसे उम्मीद होती है कि जो दवा उसे दी जा रही है वह सुरक्षित, प्रभावी और वैज्ञानिक परीक्षणों से प्रमाणित होगी। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार ने हाल ही में 16 फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन (एफडीसी) दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया है।


सरकार का कहना है कि इन दवाओं के उपयोग का कोई स्पष्ट चिकित्सकीय औचित्य नहीं पाया गया है और इनसे मिलने वाले संभावित लाभों की तुलना में इनके जोखिम अधिक हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी अधिसूचना में कहा गया है कि यह कदम जनस्वास्थ्य की सुरक्षा, दवाओं के तर्कसंगत उपयोग को बढ़ावा देने तथा नागरिकों को केवल वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित दवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उठाया गया है। यह निर्णय केवल कुछ दवाओं पर प्रतिबंध लगाने भर का मामला नहीं है, बल्कि यह देश की दवा नीति, चिकित्सा व्यवस्था और मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा एक व्यापक कदम है। 


फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन या एफडीसी ऐसी दवाएं होती हैं जिनमें दो या दो से अधिक सक्रिय औषधीय तत्वों को एक निश्चित अनुपात में मिलाकर तैयार किया जाता है। उदाहरण के लिए दर्द निवारक और बुखार कम करने वाली दवा का संयोजन। एंटीबायोटिक और एंटी-एलर्जिक दवा का संयोजन और मधुमेह नियंत्रण की दो दवाओं का मिश्रण। एफडीसी का मूल उद्देश्य मरीजों को सुविधा प्रदान करना है ताकि उन्हें अलग-अलग गोलियां लेने के बजाय एक ही दवा में आवश्यक उपचार मिल सके।


यदि वैज्ञानिक आधार पर तैयार किए जाएं तो एफडीसी के कई लाभ हो सकते हैं। मरीजों के लिए दवा लेना आसान हो जाता है। उपचार का पालन (कंप्लायंस) बेहतर होता है। दवा लेने में भूल की संभावना कम होती है। कुछ रोगों में उपचार अधिक प्रभावी हो सकता है। उदाहरण के लिए तपेदिक (टीबी), एचआईवी और कुछ हृदय रोगों में एफडीसी दवाओं का सफल उपयोग किया जाता है।


समस्या तब पैदा होती है जब दो या अधिक दवाओं को बिना पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन के एक साथ मिला दिया जाता है। ऐसी स्थिति में दवा का प्रभाव अनिश्चित हो सकता है। दुष्प्रभाव बढ़ सकते हैं। रोगी को अनावश्यक दवाएं मिल सकती हैं। यकृत, गुर्दे या अन्य अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। एंटीबायोटिक प्रतिरोध जैसी गंभीर समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।


केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, विशेषज्ञ समितियों द्वारा विस्तृत समीक्षा के बाद पाया गया कि इन 16 एफडीसी दवाओं का कोई पर्याप्त चिकित्सकीय औचित्य उपलब्ध नहीं है। विशेषज्ञों ने चिंताएं व्यक्त की है कि  कई संयोजन ऐसे पाए गए जिनसे मरीज को मिलने वाला लाभ सीमित था, जबकि दुष्प्रभावों की संभावना अधिक थी। कुछ दवाओं के संयोजन के समर्थन में पर्याप्त क्लिनिकल ट्रायल उपलब्ध नहीं थे। मरीज को ऐसी दवा दी जा रही थी जिसकी उसे वास्तविक आवश्यकता नहीं थी। विशेष रूप से एंटीबायोटिक संयोजनों के मामले में दुरुपयोग से एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (एएमआर) का खतरा बढ़ सकता है।


सरकार ने यह कार्रवाई औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 की धारा 26ए के तहत की है। यह धारा केंद्र सरकार को अधिकार देती है कि यदि किसी दवा का उपयोग मानव स्वास्थ्य के लिए जोखिमपूर्ण पाया जाता है या उसके उपयोग का कोई पर्याप्त चिकित्सकीय औचित्य नहीं होता, तो उसके निर्माण, बिक्री और वितरण पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। यह प्रावधान भारत में दवा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी उपकरण माना जाता है।


स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जिन संयोजनों पर रोक लगाई गई है उनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं, एसिटाइल सैलिसिलिक एसिड के साथ एथोहेप्टाजीन- विशेषज्ञों के अनुसार इस संयोजन की उपयोगिता स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं हो सकी। डायसाइक्लोमाइन, पैरासिटामोल और क्लिडिनियम ब्रोमाइड- यह संयोजन पेट संबंधी समस्याओं और दर्द के उपचार में उपयोग किया जाता था, लेकिन इसके वैज्ञानिक औचित्य पर प्रश्न उठाए गए। पैरासिटामोल और क्लिडिनियम ब्रोमाइड- इस संयोजन को भी विशेषज्ञ समिति ने असंगत माना। डायसाइक्लोमाइन, क्लोरडायजेपॉक्साइड और अन्य तत्वों का मिश्रण- इस प्रकार के संयोजनों में कई दवाओं को एक साथ मिलाया गया था, जिससे अनावश्यक दुष्प्रभावों का खतरा बढ़ता था। ग्लिक्लाजाइड और क्रोमियम पिकोलिनेट- मधुमेह उपचार में प्रयुक्त इस संयोजन के पर्याप्त लाभ सिद्ध नहीं हो सके। पैरासिटामोल और लिग्नोकेन- विशेषज्ञों ने माना कि इस संयोजन की चिकित्सकीय आवश्यकता स्पष्ट नहीं है। इसके अतिरिक्त कई एंटीबायोटिक संयोजनों पर भी रोक लगाई गई है।


आज पूरी दुनिया एंटीबायोटिक प्रतिरोध की गंभीर समस्या से जूझ रही है। जब बैक्टीरिया किसी एंटीबायोटिक दवा के प्रति प्रतिरोध विकसित कर लेते हैं, तो वह दवा प्रभावी नहीं रह जाती है। इसके परिणामस्वरूप संक्रमण का इलाज कठिन हो जाता है। अस्पताल में भर्ती होने की अवधि बढ़ जाती है। मृत्यु दर बढ़ सकती है। उपचार महंगा हो जाता है।


भारत दुनिया में एंटीबायोटिक के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है। विशेषज्ञ लंबे समय से चेतावनी देते रहे हैं कि अनावश्यक एंटीबायोटिक संयोजन भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा कर सकते हैं। सरकार का यह कदम इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है।


यह प्रश्न अक्सर उठता है कि यदि कोई दवा वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं है तो वह बाजार तक पहुंचती कैसे है? इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। अतीत में कई एफडीसी दवाओं को अलग-अलग राज्यों के स्तर पर अनुमति मिल गई थी। उस समय सभी संयोजनों की केंद्रीय स्तर पर कठोर वैज्ञानिक समीक्षा नहीं होती थी।


फार्मास्यूटिकल कंपनियां कई बार बाजार में अलग पहचान बनाने के लिए नए संयोजन विकसित करती हैं। यदि इन संयोजनों के पीछे पर्याप्त शोध नहीं होता तो उनकी उपयोगिता संदिग्ध हो सकती है। कुछ संयोजन इस सोच के साथ बनाए गए कि एक ही गोली में कई समस्याओं का समाधान मिल जाए। लेकिन सुविधा हमेशा वैज्ञानिक औचित्य का विकल्प नहीं हो सकती। भारत जैसे विशाल देश में हजारों दवा उत्पादों की लगातार निगरानी करना एक जटिल कार्य है। इसलिए समय-समय पर समीक्षा और पुनर्मूल्यांकन की आवश्यकता होती है।


जब सरकार किसी दवा पर प्रतिबंध लगाती है तो उसका अर्थ केवल यह नहीं होता कि वह दवा दुकान से गायब हो जाएगी। प्रतिबंध का अर्थ है कि उसका निर्माण बंद किया जाएगा। नए स्टॉक का वितरण नहीं होगा। बिक्री पर रोक लग जाएगी। नियामक एजेंसियां इसके अनुपालन की निगरानी करेगी। उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई की जा सकती है। यह प्रक्रिया आमतौर पर चरणबद्ध तरीके से लागू होती है ताकि बाजार में अनावश्यक अव्यवस्था न फैले।


सरकार द्वारा प्रतिबंध लगाए जाने के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न मरीजों के सामने आता है कि उन्हें क्या करना चाहिए। कई लोग समाचार सुनते ही दवा लेना बंद कर देते हैं। यह उचित नहीं है। यदि कोई मरीज ऐसी दवा ले रहा है जो प्रतिबंधित सूची में शामिल है, तो उसे अपने डॉक्टर से मिलना चाहिए। अधिकांश मामलों में सुरक्षित और प्रभावी विकल्प पहले से मौजूद होते हैं। पुराने प्रिस्क्रिप्शन और दवा संबंधी दस्तावेज डॉक्टर को सही सलाह देने में मदद करते हैं।


चिकित्सा विशेषज्ञों का मानना है कि दवा उद्योग में कई वर्षों से ऐसे एफडीसी संयोजन मौजूद थे जिनकी प्रभावशीलता और सुरक्षा पर पर्याप्त शोध उपलब्ध नहीं था। विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक संयोजन का वैज्ञानिक परीक्षण आवश्यक है। केवल बाजार में उपलब्ध होना किसी दवा को सुरक्षित नहीं बनाता। मरीजों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। कई चिकित्सकों ने सरकार के इस निर्णय का स्वागत किया है।


भारत का दवा उद्योग दुनिया के सबसे बड़े उद्योगों में गिना जाता है। एफडीसी दवाओं पर प्रतिबंध का प्रभाव कुछ कंपनियों पर पड़ सकता है क्योंकि कुछ उत्पादों की बिक्री बंद करनी पड़ेगी। नए संयोजनों के लिए अतिरिक्त शोध करना होगा। नियामक मानकों का अधिक कठोरता से पालन करना पड़ेगा। हालांकि दीर्घकाल में यह कदम उद्योग की विश्वसनीयता बढ़ाने में मदद करेगा।


सामान्य मरीजों को घबराने की आवश्यकता नहीं है। यदि कोई व्यक्ति इन प्रतिबंधित दवाओं का उपयोग कर रहा है, तो उसे स्वयं दवा बंद नहीं करनी चाहिए। अपने चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। वैकल्पिक दवा के बारे में जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। डॉक्टर मरीज की स्थिति के अनुसार सुरक्षित और प्रभावी विकल्प सुझा सकते हैं।


आधुनिक चिकित्सा में केवल दवा उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। यह भी आवश्यक है कि दवा सुरक्षित हो। वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित हो। उसके लाभ और जोखिम का स्पष्ट मूल्यांकन किया गया हो। विश्व स्वास्थ्य संगठन भी दवाओं के तर्कसंगत उपयोग पर विशेष बल देता है।


16 फिक्स्ड डोज कॉम्बिनेशन दवाओं पर केंद्र सरकार द्वारा लगाया गया प्रतिबंध भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था में दवा सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय दर्शाता है कि सरकार केवल दवाओं की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता, प्रभावशीलता और सुरक्षा को भी सर्वोच्च प्राथमिकता दे रही है।


जनस्वास्थ्य की रक्षा, एंटीबायोटिक प्रतिरोध जैसी चुनौतियों से मुकाबला और वैज्ञानिक आधार पर चिकित्सा व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना इस निर्णय के प्रमुख उद्देश्य हैं। यद्यपि कुछ दवा कंपनियों को इसका आर्थिक प्रभाव झेलना पड़ सकता है, लेकिन मरीजों की सुरक्षा और स्वास्थ्य के सामने यह चिंता गौण है। आने वाले समय में ऐसे कदम भारत को अधिक सुरक्षित, वैज्ञानिक और उत्तरदायी स्वास्थ्य प्रणाली की ओर ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।



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