परिवार और रिश्तों की उलझनों की कहानी है - ‘मधुविधु’

Jitendra Kumar Sinha
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ओटीटी प्लेटफॉर्म पर इन दिनों क्षेत्रीय फिल्मों का आकर्षण लगातार बढ़ रहा है। मलयालम सिनेमा अपनी अलग तरह की कहानियों और हल्के-फुल्के मनोरंजन के लिए जाना जाता है। इसी कड़ी में फिल्म ‘मधुविधु’ दर्शकों के लिए एक ताज़ा फैमिली कॉमेडी के रूप में सामने आई है। यह फिल्म इसी वर्ष सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी और अब हिन्दी भाषा में भी ओटीटी पर उपलब्ध है। पारिवारिक माहौल, हास्य से भरपूर परिस्थितियां और रिश्तों की जटिलताओं को हल्के अंदाज में दिखाने वाली यह फिल्म दर्शकों को मुस्कुराने का भरपूर मौका देती है।


फिल्म की कहानी एक ऐसे युवा के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसका पालन-पोषण पूरी तरह पुरुषों से भरे घर में हुआ है। बचपन से लेकर युवावस्था तक उसने स्त्री-सुलभ व्यवहार, भावनात्मक समझ और पारिवारिक संतुलन को करीब से नहीं देखा। ऐसे माहौल में बड़ा होने के कारण उसकी सोच और व्यवहार भी उसी दिशा में विकसित होता है। लेकिन कहानी में मजेदार मोड़ तब आता है, जब उसके विवाह की बात शुरू होती है और वह अपने लिए दुल्हन खोजने निकलता है। एक साधारण सी लगने वाली यह प्रक्रिया उसके लिए बेहद असाधारण और हास्यास्पद अनुभवों में बदल जाती है। दुल्हन की तलाश के दौरान पैदा होने वाली अजीब परिस्थितियां फिल्म की जान बन जाती हैं।


फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका हास्य है। यहां कॉमेडी को जबरदस्ती डालने की कोशिश नहीं की गई, बल्कि परिस्थितियों से पैदा होने वाले हास्य को महत्व दिया गया है। नायक के जीवन का अनुभव सीमित होने के कारण वह कई सामाजिक और भावनात्मक स्थितियों को समझ नहीं पाता। उसकी मासूमियत और अजीब प्रतिक्रियाएं कई बार दर्शकों को खुलकर हंसने पर मजबूर करती हैं। फिल्म में ऐसे कई दृश्य हैं जहां साधारण बातचीत भी मनोरंजक बन जाती है। विवाह संबंधी मुलाकातें, परिवार की उम्मीदें और समाज के दबाव को मजेदार ढंग से प्रस्तुत किया गया है। यही कारण है कि फिल्म देखते समय दर्शकों को कहीं भी कृत्रिमता महसूस नहीं होती।


फिल्म मुख्य रूप से एक कॉमेडी है, लेकिन इसमें रिश्तों की भावनात्मक परत भी मौजूद है। कहानी यह दिखाती है कि परिवार सिर्फ लोगों का समूह नहीं होता, बल्कि सोच और व्यक्तित्व को आकार देने वाली संस्था भी है। नायक का जीवन इस बात का उदाहरण बनता है कि हमारा परिवेश किस प्रकार हमारे व्यवहार और समझ को प्रभावित करता है। फिल्म हल्के अंदाज में यह भी बताती है कि जीवन में संतुलन कितना आवश्यक है और रिश्तों को समझने के लिए केवल अनुभव ही नहीं बल्कि संवेदनशीलता भी जरूरी है।


फिल्म में कलाकारों ने अपने किरदारों को जीवंत बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी है। मुख्य भूमिका में शराफुद्दीन ने बेहतरीन अभिनय किया है। उनके चेहरे के भाव और सहज अभिनय फिल्म को और रोचक बनाते हैं। वहीं कल्याणी पंणिक्कर ने अपने किरदार को प्रभावशाली तरीके से निभाया है। अनुभवी कलाकार साईकुमार और अजीस नेदुमंगद भी अपनी भूमिकाओं में पूरी तरह फिट दिखाई देते हैं। सभी कलाकारों के बीच की केमिस्ट्री फिल्म को और मजबूत बनाती है।


निर्देशक विष्णु अरविंद ने फिल्म को बहुत संतुलित तरीके से पेश किया है। उन्होंने कहानी को जरूरत से ज्यादा गंभीर या अत्यधिक हास्यप्रधान बनाने की कोशिश नहीं की। यही संतुलन फिल्म को खास बनाता है। निर्देशन की सबसे बड़ी सफलता यह है कि फिल्म अपनी गति बनाए रखती है। कहीं भी कहानी बोझिल नहीं लगती और दर्शक पूरे समय उससे जुड़े रहते हैं।


यदि आप ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जिसमें पारिवारिक माहौल हो, हल्का-फुल्का हास्य हो और बिना किसी भारी ड्रामे के मनोरंजन मिले, तो ‘मधुविधु’ एक अच्छा विकल्प साबित हो सकती है। यह फिल्म उन लोगों के लिए भी खास है जो रोजमर्रा की भागदौड़ के बीच कुछ समय हंसना और तनाव से दूर रहना चाहते हैं। मलयालम सिनेमा की सरल लेकिन प्रभावशाली कहानी कहने की शैली इस फिल्म में भी साफ दिखाई देती है।


‘मधुविधु’ केवल एक कॉमेडी फिल्म नहीं है, बल्कि यह परिवार, रिश्तों और सामाजिक व्यवहार की छोटी-छोटी बातों को हंसी के साथ प्रस्तुत करती है। फिल्म का हास्य स्वाभाविक है, पात्र वास्तविक लगते हैं और कहानी दर्शकों को अंत तक बांधे रखती है। 



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