मलेशिया का फैसला - 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर प्रतिबंध

Jitendra Kumar Sinha
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डिजिटल युग में सोशल मीडिया मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। आज फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म न केवल मनोरंजन और संवाद के माध्यम हैं, बल्कि सूचना, शिक्षा और व्यवसाय के भी महत्वपूर्ण साधन बन गए हैं। लेकिन इन प्लेटफॉर्मों के बढ़ते प्रभाव ने बच्चों और किशोरों के मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक स्वास्थ्य को लेकर गंभीर चिंताएं भी पैदा की हैं। इसी चिंता को ध्यान में रखते हुए मलेशिया ने एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट रखने पर प्रतिबंध लगाने वाले नए नियम लागू कर दिए हैं। यह फैसला केवल मलेशिया तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर चल रही बहस और प्रयासों का हिस्सा है। इस कदम ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या सोशल मीडिया बच्चों के लिए लाभकारी है या फिर यह उनके विकास के लिए खतरा बनता जा रहा है।


पिछले एक दशक में स्मार्टफोन और इंटरनेट की पहुंच में जबरदस्त वृद्धि हुई है। बच्चों के हाथों में मोबाइल फोन आ चुके हैं और कम उम्र में ही वे सोशल मीडिया की दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं। कई सर्वेक्षणों से पता चला है कि 10 से 15 वर्ष के बच्चे प्रतिदिन कई घंटे सोशल मीडिया पर बिताते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक सोशल मीडिया उपयोग से बच्चों में अवसाद, चिंता, आत्मविश्वास की कमी, साइबर बुलिंग, नींद की समस्या और पढ़ाई में गिरावट जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। इसके अलावा ऑनलाइन शोषण, फर्जी सूचनाओं और हानिकारक सामग्री तक पहुंच का खतरा भी लगातार बढ़ रहा है। मलेशिया सरकार का कहना है कि इन चुनौतियों का सामना करने के लिए केवल अभिभावकों की निगरानी पर्याप्त नहीं है। तकनीकी कंपनियों को भी जिम्मेदारी उठानी होगी।


मलेशिया में लागू किए गए नए नियमों के तहत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बनाने की अनुमति नहीं होगी। इन नियमों की प्रमुख विशेषताएं हैं- सोशल मीडिया कंपनियों को अनिवार्य रूप से आयु सत्यापन प्रणाली लागू करनी होगी। 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के नए अकाउंट बनने से रोकना होगा। पहले से मौजूद अकाउंट्स की भी समीक्षा की जाएगी। नियम उन प्लेटफॉर्मों पर लागू होंगे जिनके कम से कम 80 लाख उपयोगकर्ता हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब और अन्य बड़े प्लेटफॉर्म इसके दायरे में आएंगे। नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर एक करोड़ रिंगिट तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सोशल मीडिया कंपनियां केवल लाभ कमाने तक सीमित न रहें, बल्कि बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी निभाएं।


मलेशिया पहला देश नहीं है जिसने बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग पर कड़े कदम उठाए हैं। दुनिया के कई देशों में इस दिशा में कानून बनाए जा रहे हैं। 


ऑस्ट्रेलिया ने भी किशोरों के सोशल मीडिया उपयोग को नियंत्रित करने के लिए सख्त नियमों पर काम शुरू किया है। वहां बच्चों की मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को सोशल मीडिया से जोड़कर देखा जा रहा है।


यूरोपीय संघ का डिजिटल सर्विसेज एक्ट तकनीकी कंपनियों को बच्चों की सुरक्षा के लिए विशेष उपाय लागू करने के लिए बाध्य करता है।


अमेरिका के कई राज्यों में ऐसे कानूनों पर चर्चा चल रही है जिनके तहत बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग के लिए अभिभावकीय अनुमति आवश्यक हो सकती है।


चीन पहले से ही इंटरनेट और सोशल मीडिया के उपयोग पर काफी सख्त नियंत्रण रखता है। वहां बच्चों के ऑनलाइन गेमिंग समय पर भी प्रतिबंध लगाया गया है।मलेशिया का नया कानून इसी वैश्विक प्रवृत्ति का हिस्सा माना जा रहा है।


सोशल मीडिया के कुछ सकारात्मक पहलू अवश्य हैं, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार इसके कई गंभीर दुष्प्रभाव भी हैं। लगातार दूसरों की जीवनशैली, सुंदरता और सफलता देखकर बच्चों में हीन भावना विकसित हो सकती है। लाइक और फॉलोअर्स की संस्कृति आत्मसम्मान को प्रभावित करती है। ऑनलाइन उत्पीड़न आज दुनिया भर में बड़ी समस्या बन चुका है। कई बच्चे सोशल मीडिया पर अपमान, धमकी और मानसिक प्रताड़ना का शिकार होते हैं। बच्चे अक्सर सत्य और असत्य में अंतर नहीं कर पाते। इससे वे अफवाहों और भ्रामक सूचनाओं के प्रभाव में आ सकते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों को अपराधियों, ठगों और यौन शोषण करने वाले लोगों से खतरा रहता है। अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों की एकाग्रता और शैक्षणिक प्रदर्शन को प्रभावित करता है। रात देर तक मोबाइल का उपयोग बच्चों की नींद और शारीरिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।


बच्चों की सुरक्षा के उद्देश्य को लेकर व्यापक समर्थन मिल रहा है, लेकिन तकनीकी कंपनियों ने कुछ चिंताएं भी व्यक्त की हैं। विशेष रूप से मेटा, जो फेसबुक और इंस्टाग्राम का संचालन करती है, ने कहा है कि पूर्ण प्रतिबंध समाधान नहीं हो सकता। कंपनी का तर्क है कि यदि बच्चों को मुख्यधारा के सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से पूरी तरह बाहर कर दिया गया, तो वे इंटरनेट के ऐसे हिस्सों की ओर जा सकते हैं जहां सुरक्षा व्यवस्था कमजोर है और निगरानी लगभग नहीं के बराबर है। मेटा का कहना है कि बेहतर विकल्प यह होगा कि अभिभावकीय नियंत्रण, कंटेंट फिल्टर और सुरक्षा उपकरणों को मजबूत बनाया जाए।


नए नियमों का सबसे कठिन हिस्सा आयु सत्यापन प्रणाली को लागू करना है। आज अधिकांश सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म केवल उपयोगकर्ता द्वारा दी गई जन्मतिथि के आधार पर आयु निर्धारित करते हैं। ऐसे में बच्चे आसानी से गलत जानकारी देकर अकाउंट बना लेते हैं।


विशेषज्ञों के अनुसार, आयु सत्यापन के लिए कई विकल्प हो सकते हैं- सरकारी पहचान पत्र का उपयोग, डिजिटल पहचान प्रणाली, बायोमेट्रिक सत्यापन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित आयु अनुमान तकनीक। लेकिन इन सभी विकल्पों के साथ गोपनीयता और डेटा सुरक्षा की नई चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं।


कानून चाहे कितना भी सख्त क्यों न हो, बच्चों की डिजिटल सुरक्षा में अभिभावकों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण बनी रहती है। अभिभावकों को चाहिए कि वे बच्चों के स्क्रीन टाइम पर नजर रखें। इंटरनेट उपयोग के नियम निर्धारित करें। बच्चों से ऑनलाइन गतिविधियों के बारे में खुलकर बातचीत करें। साइबर सुरक्षा के बारे में जानकारी दें। डिजिटल और वास्तविक जीवन के बीच संतुलन बनाने के लिए प्रेरित करें। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी नियंत्रण और पारिवारिक मार्गदर्शन दोनों साथ-साथ चलने चाहिए।


यह सवाल दुनिया भर में बहस का विषय बना हुआ है। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि कम उम्र में सोशल मीडिया से दूरी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होगी। वहीं अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक नहीं है क्योंकि आज की दुनिया में डिजिटल साक्षरता भी उतनी ही आवश्यक है। उनका सुझाव है कि बच्चों को सोशल मीडिया से पूरी तरह दूर रखने के बजाय उन्हें सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग सिखाया जाना चाहिए। संभवतः भविष्य में दुनिया ऐसे मॉडल की ओर बढ़ेगी जहां बच्चों के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए सुरक्षित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म उपलब्ध होंगे।


भारत दुनिया के सबसे बड़े इंटरनेट और सोशल मीडिया उपयोगकर्ता देशों में शामिल है। करोड़ों बच्चे और किशोर विभिन्न प्लेटफॉर्मों का उपयोग करते हैं। हालांकि भारत में भी डेटा संरक्षण और ऑनलाइन सुरक्षा से जुड़े कई नियम लागू किए जा रहे हैं, लेकिन बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को लेकर अभी व्यापक बहस जारी है। मलेशिया का यह कदम भारत सहित अन्य देशों के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है। यदि यह मॉडल सफल साबित होता है तो कई देश इसी प्रकार के नियमों पर विचार कर सकते हैं।


मलेशिया द्वारा 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय डिजिटल सुरक्षा के क्षेत्र में एक साहसिक और ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। यह केवल एक कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि यह संदेश भी है कि बच्चों की मानसिक और सामाजिक सुरक्षा को तकनीकी विकास से ऊपर रखा जाना चाहिए। हालांकि इस कानून के सामने आयु सत्यापन, गोपनीयता और तकनीकी क्रियान्वयन जैसी कई चुनौतियां मौजूद हैं, फिर भी यह स्पष्ट है कि दुनिया अब बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर अधिक गंभीर होती जा रही है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मलेशिया का यह प्रयोग कितना सफल साबित होता है और क्या अन्य देश भी इसी राह पर चलते हैं। डिजिटल युग में बच्चों को सुरक्षित भविष्य देने के लिए सरकारों, तकनीकी कंपनियों, स्कूलों और अभिभावकों को मिलकर काम करना होगा। तभी इंटरनेट वास्तव में ज्ञान, रचनात्मकता और विकास का सुरक्षित माध्यम बन सकेगा।



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