आईना दिखाता है कालचक्र - "समय बलवान होता है”

Jitendra Kumar Sinha
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"समय बड़ा बलवान होता है" यह केवल एक कहावत नहीं है, बल्कि इतिहास का सबसे बड़ा सत्य है। कहते हैं कि संसार में यदि कोई सबसे बड़ा शिक्षक है तो वह समय है। यदि कोई सबसे बड़ा न्यायाधीश है तो वह भी समय है। यदि कोई ऐसा बल है जो राजा को रंक और रंक को राजा बना सकता है तो वह भी समय ही है। मनुष्य ने विज्ञान की ऊँचाइयों को छुआ, समुद्र की गहराइयों को नापा, अंतरिक्ष में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का निर्माण किया, लेकिन एक चीज आज भी उसके नियंत्रण से बाहर है, वह है वक्त। हर कालखंड में इंसान ने समय को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की है। सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों ने यह मान लिया कि उनका प्रभाव स्थायी है। साम्राज्यों ने सोचा कि उनका सूर्य कभी अस्त नहीं होगा। राजनीतिक दलों ने माना कि जनता हमेशा उनके साथ खड़ी रहेगी। लेकिन इतिहास के पन्ने बताते हैं कि समय ने हर बार मनुष्य के अहंकार को तोड़ा है।


आज की राजनीति में भी यही दृश्य दिखाई देता है। पश्चिम बंगाल से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार तक समय की चाल ने कई लोगों को चौंकाया है। जो कल तक अजेय दिखाई दे रहे थे, वे आज बचाव की मुद्रा में हैं। जो कल तक हाशिये पर थे, वे आज केंद्र में दिखाई दे रहे हैं।


लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र का सबसे बड़ा प्रहरी समय होता है। जनता समय के साथ अपने विचार बदलती है, प्राथमिकताएँ बदलती है और अपने निर्णय भी बदलती है। राजनीति की सबसे बड़ी भूल तब होती है जब कोई दल या नेता यह मान लेता है कि जनता का समर्थन स्थायी है। इतिहास बताता है कि जनता किसी की बपौती नहीं होती है। वह अवसर देती है, लेकिन आवश्यकता पड़ने पर उसी गति से वापस भी ले लेती है। यही कारण है कि लोकतंत्र में समय सबसे बड़ा निर्णायक बन जाता है।


कुछ वर्ष पहले तक पश्चिम बंगाल का राजनीतिक वातावरण अलग था। राष्ट्रीय राजनीति में यह धारणा बन चुकी थी कि बंगाल में कुछ राजनीतिक शक्तियाँ इतनी मजबूत हैं कि उन्हें चुनौती देना लगभग असंभव है। कोलकाता केवल एक महानगर नहीं था, बल्कि राजनीतिक प्रभाव का प्रतीक बन गया था। सत्ता के गलियारों में जो आत्मविश्वास दिखाई देता था, वह कई बार अजेयता के भाव में बदल जाता था। लेकिन समय का स्वभाव ही परिवर्तन है। आज परिस्थितियाँ बदल रही हैं। जिन मुद्दों पर पहले चुप्पी दिखाई देती थी, वे अब राष्ट्रीय बहस का हिस्सा हैं। जिन घटनाओं को स्थानीय मामला कहकर टाल दिया जाता था, वे अब राष्ट्रीय सुर्खियाँ बन रही हैं। यह केवल किसी दल या नेता की कहानी नहीं है। यह समय की शक्ति का उदाहरण है। समय बताता है कि कोई भी राजनीतिक व्यवस्था स्थायी नहीं होती है।


मीडिया भी समय के प्रभाव से अछूता नहीं रहता है। हर दौर का अपना विमर्श होता है। कभी जिन विषयों को महत्व नहीं दिया जाता था, वे अचानक प्रमुख खबर बन जाते हैं। कभी जिन नेताओं की आलोचना सीमित होती थी, वे व्यापक समीक्षा के केंद्र में आ जाते हैं। यह परिवर्तन केवल पत्रकारिता का नहीं है बल्कि सामाजिक चेतना का भी संकेत होता है। समाज जब बदलता है तो मीडिया की प्राथमिकताएँ भी बदलती हैं। समय का यही प्रभाव लोकतंत्र को जीवंत बनाए रखता है।


यदि वर्तमान भारतीय राजनीति में किसी राज्य ने प्रशासनिक निर्णयों के आधार पर अलग पहचान बनाई है तो वह उत्तर प्रदेश है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई अवसरों पर यह संदेश दिया है कि शासन केवल घोषणाओं से नहीं बल्कि त्वरित निर्णयों से चलता है। गाजियाबाद जैसी घटनाओं पर देर रात तक सक्रिय प्रशासन यह संकेत देता है कि आधुनिक राजनीति में प्रतिक्रिया की गति भी महत्वपूर्ण है। समय की यही मांग है। जनता अब वर्षों तक प्रतीक्षा नहीं करना चाहती। वह त्वरित उत्तर चाहती है, त्वरित कार्रवाई चाहती है और त्वरित परिणाम भी चाहती है। जो राजनीतिक नेतृत्व इस परिवर्तन को समझ रहा है, वही समय की नब्ज को पकड़ पा रहा है।


भारतीय राजनीति को समझना हो तो बिहार को समझना आवश्यक है। बिहार केवल एक राज्य नहीं है बल्कि राजनीतिक प्रयोगों की भूमि है। यहाँ विचारधाराएँ टकराती हैं, सामाजिक समीकरण बदलते हैं और नए राजनीतिक संदेश जन्म लेते हैं। आज बिहार में भी समय ने अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर दिया है। कभी कुछ नाम ऐसे थे जिनका उल्लेख राजनीतिक विवाद खड़ा कर देता था। कुछ विचार ऐसे थे जिन्हें स्वीकार करना राजनीतिक जोखिम माना जाता था। लेकिन समय ने धारणाएँ बदल दी। आज वही विषय मुख्यधारा की बहस का हिस्सा बन चुके हैं। जो विचार कभी सीमित दायरे में थे, वे व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त कर रहे हैं। यह परिवर्तन किसी एक व्यक्ति की देन नहीं है बल्कि समय की देन है।


राजनीति में प्रतीकों का बड़ा महत्व होता है। वीर सावरकर लंबे समय तक भारतीय राजनीति में विवाद का विषय बने रहे। कुछ दल उन्हें राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रमुख स्तंभ मानते रहे, जबकि कुछ दल उनकी आलोचना करते रहे। लेकिन समय के साथ विमर्श बदलता गया। आज सावरकर पर चर्चा केवल विरोध और समर्थन तक सीमित नहीं है। उनके विचारों, उनके योगदान और उनके राजनीतिक प्रभाव पर व्यापक बहस हो रही है। यह बदलाव दर्शाता है कि समय केवल सत्ता नहीं बदलता, वह विचारों की स्वीकृति भी बदल देता है।


सत्ता का सबसे बड़ा खतरा यह है कि वह स्थायित्व का भ्रम पैदा करती है। जब कोई दल लंबे समय तक सत्ता में रहता है तो उसे लगता है कि जनता का समर्थन स्थायी है। जब कोई नेता लगातार जीतता है तो उसे लगता है कि उसकी लोकप्रियता अटूट है। लेकिन इतिहास बताता है कि ऐसा कभी नहीं होता है। भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में ऐसे असंख्य उदाहरण हैं जहाँ शक्तिशाली नेता और मजबूत सरकारें अचानक कमजोर पड़ गईं। समय ने सभी को यह सिखाया है कि लोकतंत्र में कोई भी स्थायी विजेता नहीं होता है।


समय की शक्ति को समझने के लिए इतिहास से बेहतर कोई शिक्षक नहीं होता है। मौर्य साम्राज्य ने पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को एक सूत्र में बाँध दिया था। गुप्तकाल को भारत का स्वर्ण युग कहा गया। मुगल साम्राज्य अपने वैभव के चरम पर था। ब्रिटिश साम्राज्य के बारे में कहा जाता था कि उसके राज्य में सूर्य कभी अस्त नहीं होता है। लेकिन समय ने इन सभी को बदल दिया। आज वे केवल इतिहास की पुस्तकों में दर्ज हैं। यही समय का सबसे बड़ा संदेश है कि परिवर्तन ही स्थायी है।


लोकतंत्र में जनता समय की प्रतिनिधि होती है। जनता धीरे-धीरे अपना मन बनाती है। वह घटनाओं को देखती है, नेताओं का मूल्यांकन करती है और फिर अपना निर्णय देती है। जब जनता निर्णय देती है तो वह केवल वर्तमान को नहीं बल्कि पूरे कालखंड को प्रभावित करती है। इसलिए लोकतंत्र में जनता को कभी हल्के में नहीं लेना चाहिए।


राजनीति में विनम्रता केवल नैतिक गुण नहीं है बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी है। जो नेता समय के संकेतों को समझते हैं, वे अपने व्यवहार और नीतियों में परिवर्तन लाते हैं। जो ऐसा नहीं करते, वे धीरे-धीरे जनता से दूर होते जाते हैं। भारतीय राजनीति के अनेक उदाहरण बताते हैं कि जनता अहंकार को पसंद नहीं करती। वह संघर्ष, समर्पण और संवेदनशीलता को अधिक महत्व देती है।


आज भारत की राजनीति पहले जैसी नहीं है। युवा मतदाता नई अपेक्षाएँ लेकर सामने आया है। वह केवल नारों से संतुष्ट नहीं होता है। वह परिणाम चाहता है। रोजगार, विकास, कानून व्यवस्था, बुनियादी ढाँचा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दे उसकी प्राथमिकताओं में शामिल हैं। जो राजनीतिक दल इन अपेक्षाओं को समझ रहे हैं, वे समय के साथ आगे बढ़ रहे हैं। जो इन्हें नजरअंदाज कर रहे हैं, वे पीछे छूट रहे हैं।


समय के सामने सब समान हैं। न कोई नेता बड़ा है, न कोई दल, न कोई विचारधारा और न कोई सत्ता। समय का चक्र लगातार घूमता रहता है। वह किसी को स्थायी विजय नहीं देता और किसी को स्थायी पराजय भी नहीं देता। आज जो शीर्ष पर है, वह कल नीचे हो सकता है। आज जो संघर्ष कर रहा है, वह कल नेतृत्व कर सकता है। इसलिए इतिहास का सबसे बड़ा सबक यही है कि सफलता में विनम्रता और संघर्ष में धैर्य बनाए रखना चाहिए।


वक्त जब मेहरबान होता है तो साधारण व्यक्ति को असाधारण बना देता है और जब परीक्षा लेता है तो सबसे शक्तिशाली व्यक्ति को भी उसकी वास्तविकता का एहसास करा देता है। सच यही है कि मनुष्य समय को नियंत्रित करने का सपना देखता है, लेकिन अंत में समय ही मनुष्य को उसकी सीमा, उसकी शक्ति और उसकी वास्तविक औकात का परिचय कराता है।



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