कुर्सी की अस्थायी चमक और जीवन का शाश्वत सत्य - सत्ता, अहंकार और समय का न्याय

Jitendra Kumar Sinha
0

 


मनुष्य का स्वभाव बड़ा विचित्र है। जब तक उसके पास पद, प्रतिष्ठा, अधिकार और शक्ति होती है, तब तक उसे लगता है कि यह सब स्थायी है। वह भूल जाता है कि संसार का सबसे बड़ा नियम परिवर्तन है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि जो व्यक्ति कभी सत्ता के शिखर पर था, समय ने उसे उसी ऊंचाई से उतारकर सामान्य जन की भीड़ में खड़ा कर दिया। यही कारण है कि भारतीय दर्शन बार-बार यह चेतावनी देता है कि पद का नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का सम्मान अर्जित करो,  क्योंकि पद तो समय के साथ बदल जाता है, लेकिन व्यक्तित्व की छाप पीढ़ियों तक बनी रहती है।


आज बिहार की राजनीतिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को देखकर यह सत्य फिर से प्रासंगिक हो उठा है। सत्ता के गलियारों में चल रहे घटनाक्रम केवल राजनीतिक समीकरणों का विषय नहीं हैं, बल्कि वे इस बात का भी संकेत हैं कि समय किस प्रकार व्यक्ति के अहंकार को चुनौती देता है और उसे वास्तविकता से परिचित कराता है। कुर्सी स्वयं में कोई शक्ति नहीं होती है। शक्ति उस विश्वास से पैदा होती है जो समाज, व्यवस्था और संविधान उस पद को प्रदान करते हैं। लेकिन अक्सर पद पर बैठा व्यक्ति यह भूल जाता है कि लोग उसका सम्मान उसके व्यक्तित्व के कारण नहीं, बल्कि उस पद की गरिमा के कारण कर रहे हैं।


जब कोई अधिकारी, नेता या प्रभावशाली व्यक्ति लंबे समय तक अधिकार के केंद्र में रहता है, तब उसके भीतर यह भ्रम पैदा हो जाता है कि व्यवस्था उसी के इर्द-गिर्द घूम रही है। उसके सामने झुकने वाले लोग, उसके आदेशों का पालन करने वाले अधीनस्थ और उसके आसपास घूमने वाले हितैषी उसे यह विश्वास दिला देते हैं कि उसकी स्थिति अटूट है। लेकिन जैसे ही वह पद समाप्त होता है, सच्चाई सामने आने लगती है। जिन लोगों की भीड़ कभी उसके आसपास दिखाई देती थी, वे धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं। जिन दरवाजों पर उसकी गाड़ी के पहुंचते ही गतिविधि बढ़ जाती थी, वहां उसका आना-जाना सामान्य घटना बन जाता है। यही वह क्षण होता है जब व्यक्ति को समझ में आता है कि सम्मान और भय में कितना अंतर होता है।


बिहार की राजनीति हमेशा से सत्ता और सामाजिक समीकरणों का रोचक संगम रही है। यहां राजनीतिक परिवर्तन केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं रहते हैं, बल्कि प्रशासनिक संरचना और नौकरशाही के व्यवहार पर भी उनका गहरा प्रभाव पड़ता है।


2025 के चुनावों के बाद गृह विभाग का भाजपा के पास जाना और उसके बाद सत्ता संरचना में आए बदलावों को कई लोगों ने सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया माना। लेकिन पिछले कुछ समय की घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि सत्ता के भीतर चल रहे समीकरण कहीं अधिक गहरे हैं।


राजनीति में अक्सर कुछ व्यक्तित्व केवल व्यक्ति नहीं रहते हैं, बल्कि रणनीतिक प्रतीक बन जाते हैं। वे ऐसे मोहरे बनते हैं जिनके माध्यम से भविष्य की दिशा तय होती है। वर्तमान परिस्थितियों में भी ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ चेहरे केवल तत्कालीन भूमिका नहीं निभा रहे हैं, बल्कि आने वाले वर्षों की राजनीतिक संरचना को आकार देने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि राजनीतिक विश्लेषक वर्तमान घटनाओं को केवल प्रशासनिक निर्णयों के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक रणनीति के संकेतों के रूप में देख रहे हैं।


लोकतांत्रिक व्यवस्था में नौकरशाही की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। प्रशासनिक अधिकारी सरकारों के बदलने के बावजूद व्यवस्था को निरंतरता प्रदान करते हैं। लेकिन जब नौकरशाही स्वयं को जनप्रतिनिधियों से ऊपर समझने लगती है, तब समस्या उत्पन्न होती है। भारतीय लोकतंत्र का मूल सिद्धांत यह है कि अंतिम उत्तरदायित्व जनता के प्रति निर्वाचित नेतृत्व का होता है। अधिकारी व्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन वे व्यवस्था के स्वामी नहीं हैं।


कई बार लंबे समय तक प्रभावशाली पदों पर रहने वाले अधिकारियों के भीतर एक प्रकार का अभिजात्य भाव विकसित हो जाता है। उन्हें लगता है कि नीति निर्माण से लेकर क्रियान्वयन तक सब कुछ उन्हीं के हाथ में है। यह सोच धीरे-धीरे अहंकार का रूप ले लेती है। लेकिन समय का चक्र यहां भी वैसा ही काम करता है जैसा राजनीति में करता है। सेवा निवृत्ति के बाद वही अधिकारी अचानक स्वयं को उस दुनिया से बाहर पाते हैं जिसे वे कभी अपनी उपलब्धियों का केंद्र मानते थे। तब उन्हें समझ में आता है कि वास्तविक शक्ति पद में थी, व्यक्ति में नहीं।


सेवानिवृत्ति केवल नौकरी का अंत नहीं होती है, बल्कि वह व्यक्ति के आत्मबोध की परीक्षा भी होती है। जो अधिकारी अपने कार्यकाल में विनम्र रहे, लोगों से जुड़े रहे और मानवीय संबंधों को महत्व देते रहे, उनके लिए सेवानिवृत्ति सम्मानजनक होती है। लोग उन्हें पद के कारण नहीं, बल्कि उनके व्यवहार के कारण याद रखते हैं। लेकिन जिनका पूरा व्यक्तित्व केवल अधिकार प्रदर्शन पर आधारित रहा, उनके लिए यह समय अक्सर कठिन साबित होता है। उन्हें लगता है कि दुनिया बदल गई है, जबकि वास्तविकता यह होती है कि दुनिया पहले जैसी ही है; केवल पद चला गया है।


आज समाज में ऐसे अनेक उदाहरण देखने को मिलते हैं जहां कभी प्रभावशाली रहे लोग अपने पुराने परिचितों से संपर्क बनाए रखने के लिए प्रयासरत दिखाई देते हैं। यह स्थिति केवल व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि सामाजिक संदेश भी देती है। 


समय संसार का सबसे निष्पक्ष न्यायाधीश है। वह न किसी का पक्ष लेता है और न किसी का विरोध करता है। वह केवल परिस्थितियों को बदलता है और व्यक्ति के वास्तविक स्वरूप को सामने ले आता है। जिस व्यक्ति को आज लगता है कि उसके बिना व्यवस्था नहीं चल सकती, समय उसे यह दिखा देता है कि व्यवस्था उससे पहले भी थी और उसके बाद भी रहेगी।


जिसे आज अपने पद पर गर्व है, वह कल किसी और के अधीन भी हो सकता है। जिसे आज दूसरों की सलाह की आवश्यकता नहीं लगती, वही कल मार्गदर्शन पाने के लिए लोगों के पास जा सकता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में विनम्रता को सबसे बड़ा गुण माना गया है। विनम्र व्यक्ति पद मिलने पर भी संतुलित रहता है और पद छिन जाने पर भी सम्मानित बना रहता है।


जीवन का सबसे रोचक पक्ष यह है कि यहां भूमिकाएं स्थायी नहीं होती है, जो व्यक्ति कभी दूसरों को दिशा देता था, वह स्वयं भी किसी समय मार्गदर्शन का इच्छुक हो सकता है। आज कई ऐसे दृश्य देखने को मिलते हैं जहां कभी व्यवस्था को संचालित करने वाले लोग नई परिस्थितियों में स्वयं सीखने की स्थिति में खड़े दिखाई देते हैं। यह कोई कमजोरी नहीं है, बल्कि जीवन का स्वाभाविक नियम है।


समस्या तब पैदा होती है जब व्यक्ति इस परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पाता है। वह अतीत की उपलब्धियों में जीता रहता है और वर्तमान की वास्तविकताओं से संघर्ष करता रहता है। बुद्धिमानी इसी में है कि व्यक्ति समय के साथ स्वयं को बदलना सीखे। जो ऐसा कर लेते हैं, वे हर परिस्थिति में सम्मानित रहते हैं। जो नहीं कर पाते, वे अपने ही अहंकार के कैदी बन जाते हैं।


लोकतंत्र का सौंदर्य इसी में है कि यहां कोई भी पद स्थायी नहीं होता है। जनता समय-समय पर निर्णय करती है और व्यवस्था को नई दिशा देती है। राजनीति में हो, प्रशासन में हो या समाज के किसी अन्य क्षेत्र में, जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वह कभी अहंकार का शिकार नहीं होता है। उसे पता होता है कि आज जो सम्मान मिल रहा है, वह जिम्मेदारी के साथ जुड़ा हुआ है, अधिकार के साथ नहीं। इसी समझ के कारण कुछ लोग पद छोड़ने के बाद भी समाज में आदर प्राप्त करते हैं, जबकि कुछ लोग पद रहते हुए भी लोगों के मन में स्थान नहीं बना पाते हैं।


जीवन का सबसे बड़ा सत्य यही है कि कोई भी कुर्सी स्थायी नहीं है। सत्ता, पद, प्रतिष्ठा और प्रभाव सभी समय के अधीन हैं। आज जो व्यक्ति स्वयं को अजेय समझ रहा है, कल वह भी सामान्य नागरिक की तरह जीवन जी सकता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति पद के साथ-साथ विनम्रता भी अर्जित करे। वह यह समझे कि सम्मान आदेश से नहीं, व्यवहार से मिलता है। अधिकार से लोग झुक सकते हैं, लेकिन दिल से सम्मान केवल चरित्र के कारण मिलता है।


बिहार की वर्तमान परिस्थितियां हो या देश की राजनीति और प्रशासन का व्यापक परिदृश्य, हर जगह यही संदेश दिखाई देता है कि समय सबसे बड़ा शिक्षक है। वह अहंकार को तोड़ता है, वास्तविकता का बोध कराता है और यह याद दिलाता है कि आज जिस पद पर बैठकर व्यक्ति स्वयं को सर्वोच्च समझ रहा है, कल वही पद किसी और के पास होगा। अतः विवेक इसी में है कि कुर्सी की अस्थायी चमक के बजाय व्यक्तित्व की स्थायी गरिमा को महत्व दिया जाए। क्योंकि अंततः इतिहास पदों को नहीं, व्यक्तित्वों को याद रखता है।



एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top