पिछले एक दशक में भारतीय राजनीति में जो परिवर्तन दिखाई दिए हैं, वे केवल सरकार बदलने या किसी एक दल के मजबूत होने तक सीमित नहीं हैं। वास्तव में यह भारतीय लोकतंत्र के चरित्र में आए व्यापक बदलाव का संकेत है। आज राजनीति का स्वरूप, चुनावों की रणनीति, मतदाताओं की अपेक्षाएँ, मीडिया की भूमिका और नेतृत्व की परिभाषा सभी पहले की तुलना में काफी अलग हो चुकी हैं।
नरेन्द्र मोदी के लगातार 4399 दिनों तक निर्वाचित प्रधानमंत्री बने रहने की उपलब्धि को समझने के लिए इस व्यापक राजनीतिक परिवर्तन को समझना आवश्यक है। किसी भी नेता की सफलता केवल उसके व्यक्तिगत गुणों का परिणाम नहीं होती, बल्कि वह उस समय के सामाजिक और राजनीतिक परिवेश का भी प्रतिबिंब होती है।
स्वतंत्रता के बाद भारत की राजनीति लंबे समय तक कांग्रेस के इर्द-गिर्द घूमती रही। पंडित जवाहरलाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी जैसे नेताओं के दौर में कांग्रेस एक राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत लेकर चल रही थी। उस समय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा तो थी, लेकिन कांग्रेस की पकड़ इतनी मजबूत थी कि उसके विकल्प की कल्पना करना भी कठिन माना जाता था। कई राज्यों में विपक्ष अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहा था। लेकिन 1967 के बाद भारतीय राजनीति में बदलाव शुरू हुआ। क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ। सामाजिक न्याय के आंदोलन मजबूत हुए। जातीय और क्षेत्रीय पहचान राजनीति का महत्वपूर्ण आधार बनने लगी। 1989 के बाद देश गठबंधन युग में प्रवेश कर गया। केंद्र में ऐसी सरकारें बनने लगी जो कई दलों के समर्थन पर निर्भर थी। यह दौर लगभग ढाई दशक तक चला।
2014 का चुनाव भारतीय राजनीति में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। लंबे समय बाद किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिला। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह थी कि चुनाव किसी दल से अधिक एक नेता के व्यक्तित्व के इर्द-गिर्द केंद्रित दिखाई दिया। यह प्रवृत्ति केवल भारत तक सीमित नहीं थी। दुनिया के कई देशों में व्यक्तित्व आधारित राजनीति मजबूत हो रही थी। मतदाता दलों की विचारधारा से अधिक नेतृत्व की क्षमता, निर्णय लेने की योग्यता और व्यक्तिगत छवि को महत्व देने लगे थे। नरेन्द्र मोदी ने स्वयं को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया जो निर्णायक फैसले लेने की क्षमता रखते हैं। समर्थकों ने इसे मजबूत नेतृत्व कहा, जबकि आलोचकों ने इसे सत्ता का केंद्रीकरण बताया। लेकिन दोनों पक्ष इस बात पर सहमत दिखाई देते हैं कि मोदी भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक बन चुके हैं।
यदि 20वीं सदी के चुनावों में रेडियो और टेलीविजन सबसे महत्वपूर्ण माध्यम थे, तो 21वीं सदी के चुनावों में सोशल मीडिया ने यह स्थान प्राप्त कर लिया है। आज राजनीतिक संदेश कुछ ही मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुँच जाता है। एक वीडियो, एक पोस्ट या एक भाषण का अंश पूरे देश में चर्चा का विषय बन सकता है। इस बदलाव ने राजनीति को अधिक लोकतांत्रिक भी बनाया है और अधिक चुनौतीपूर्ण भी। अब केवल बड़े मीडिया संस्थानों के माध्यम से ही जनता तक पहुँचना आवश्यक नहीं रह गया है। कोई भी व्यक्ति अपने विचार सीधे जनता तक पहुँचा सकता है। लेकिन इसके साथ ही फर्जी खबरों, आधी-अधूरी सूचनाओं और दुष्प्रचार का खतरा भी बढ़ा है। सूचना का लोकतंत्रीकरण हुआ है, लेकिन सत्य और असत्य के बीच अंतर करना पहले से अधिक कठिन हो गया है।
भारतीय मतदाता को कभी केवल जाति, धर्म या क्षेत्र के आधार पर मतदान करने वाला माना जाता था। लेकिन समय के साथ उसकी प्राथमिकताएँ भी बदली हैं। आज का मतदाता विकास, रोजगार, आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों को भी महत्व देता है। वह स्थानीय और राष्ट्रीय दोनों स्तरों पर अलग-अलग तरीके से सोच सकता है। एक ही मतदाता विधानसभा चुनाव में एक दल और लोकसभा चुनाव में दूसरे दल को वोट दे सकता है। यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का संकेत है।
किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकप्रियता महत्वपूर्ण होती है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण जवाबदेही होती है। लोकप्रिय नेता जनता की अपेक्षाओं को बढ़ा देते हैं। लोग उनसे अधिक परिणाम चाहते हैं। इसलिए जितनी बड़ी सफलता होती है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी भी होती है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। रोजगार, कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सामाजिक समरसता जैसे विषय निरंतर ध्यान मांगते हैं। लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि वह उपलब्धियों का सम्मान करता है और कमियों पर प्रश्न भी पूछता है।
भारत के भीतर जो परिवर्तन हुए हैं, उसी प्रकार वैश्विक राजनीति भी नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। शीत युद्ध के दौरान दुनिया मुख्यतः दो ध्रुवों में बंटी हुई थी। सोवियत संघ के विघटन के बाद अमेरिका एकमात्र महाशक्ति के रूप में उभरा। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है। चीन का उदय, भारत की बढ़ती भूमिका, रूस की सक्रियता और यूरोप की चुनौतियाँ एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की ओर संकेत करती हैं। अब किसी एक देश का पूर्ण वर्चस्व स्थापित करना कठिन होता जा रहा है। देशों को सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों के साथ आगे बढ़ना पड़ रहा है।
आज भारत केवल दक्षिण एशिया का देश नहीं है, बल्कि वैश्विक राजनीति का महत्वपूर्ण खिलाड़ी बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की आवाज़ पहले की तुलना में अधिक प्रभावशाली हुई है। वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच भारत एक महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देखा जा रहा है। अर्थव्यवस्था, तकनीक, रक्षा और कूटनीति के क्षेत्रों में भारत की बढ़ती भूमिका आने वाले दशकों में और अधिक महत्वपूर्ण हो सकती है। इसी कारण प्रधानमंत्री पद पर लंबे समय तक बने रहने वाले किसी भी नेता का प्रभाव केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं रहता। उसका असर अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर भी पड़ता है।
इतिहास बताता है कि सत्ता स्थायी नहीं होती। दुनिया के अनेक शक्तिशाली नेताओं ने अपने समय में अजेय दिखाई देने वाली स्थिति प्राप्त की, लेकिन अंततः समय ने परिस्थितियाँ बदल दी। यह नियम लोकतंत्र में और भी अधिक प्रभावी होता है क्योंकि अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है। इसीलिए किसी भी राजनीतिक सफलता को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता है। लोकतंत्र निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया है। यहाँ हर चुनाव एक नई परीक्षा है और हर जनादेश एक नया अवसर।
किसी नेता की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल रिकॉर्ड बनाना नहीं होती है। वास्तविक प्रश्न यह होता है कि उसकी विरासत क्या होगी। क्या उसने संस्थाओं को मजबूत किया? क्या उसने देश को नई दिशा दी? क्या उसने आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर अवसर तैयार किए? क्या उसके निर्णयों का सकारात्मक प्रभाव लंबे समय तक बना रहेगा? इन प्रश्नों का उत्तर तत्काल नहीं मिलता। इतिहास अक्सर दशकों बाद अपना अंतिम निर्णय सुनाता है। इसीलिए आज जो उपलब्धि दिखाई देती है, उसका वास्तविक मूल्यांकन भविष्य की पीढ़ियाँ करेगी।
नरेन्द्र मोदी का 4399 दिनों तक निर्वाचित प्रधानमंत्री बने रहना भारतीय लोकतंत्र की एक महत्वपूर्ण घटना है। यह केवल एक राजनीतिक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि उस दौर का प्रतीक है जिसमें नेतृत्व, जनादेश, तकनीक, वैश्विक राजनीति और सामाजिक परिवर्तन सभी एक साथ नई दिशा ले रहे हैं। ऐसे समय में जहाँ इतिहास बहुत तेजी से बन रहा है। कल जो असंभव लगता है, वह आज सामान्य दिखाई देता है। नए नेता उभरते हैं, नए विचार जन्म लेते हैं और नई चुनौतियाँ सामने आती हैं। समय का पहिया चलता रहता है। व्यक्ति बदलते हैं, सरकारें बदलती हैं, विचार बदलते हैं, लेकिन इतिहास की यात्रा कभी नहीं रुकती। यही यात्रा मानव सभ्यता को आगे बढ़ाती है और यही यात्रा नए कीर्तिमानों को जन्म देती है।
