पेट्रोल में मिलावट घटता - माइलेज नीति की मजबूरी या जनता पर अतिरिक्त बोझ?

Jitendra Kumar Sinha
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भारत में पेट्रोल और डीजल केवल ईंधन नहीं हैं, बल्कि करोड़ों लोगों की रोजमर्रा की जिन्दगी, रोजगार और आर्थिक गतिविधियों की धुरी है। जब कोई वाहन चालक यह महसूस करता है कि उसकी गाड़ी पहले की तुलना में कम माइलेज देने लगी है, तो स्वाभाविक रूप से उसके मन में सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्या पेट्रोल में मिलावट हो रही है? यदि हो रही है तो यह काम पेट्रोल पंप कर रहे हैं या सरकार की नीतियों के कारण ऐसा हो रहा है? और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह कि इससे लाभ किसे मिल रहा है?


पटना के मरीन ड्राइव पर चलने वाली एक टाटा सूमो पेट्रोल गाड़ी यदि पहले 8-9 किलोमीटर प्रति लीटर का माइलेज देती थी और अब 4-5 किलोमीटर प्रति लीटर तक सिमट गई है, तो यह केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है बल्कि लाखों वाहन चालकों की चिंता का विषय है। यह प्रश्न केवल तकनीकी नहीं है, बल्कि आर्थिक और नीतिगत भी है।


भारत में पेट्रोल में मिलावट कोई नई बात नहीं है। कई वर्षों से समय-समय पर ऐसे मामले सामने आते रहे हैं जिनमें पेट्रोल या डीजल में केरोसिन, सॉल्वेंट या अन्य रसायन मिलाने की शिकायतें मिली हैं। इसका उद्देश्य अवैध लाभ कमाना होता है। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल निगरानी, जीपीएस ट्रैकिंग, सख्त नियमों और नियमित जांच के कारण पेट्रोल पंप स्तर पर होने वाली पारंपरिक मिलावट में काफी कमी आई है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी जगह स्थिति पूरी तरह आदर्श है, लेकिन पहले की तुलना में निगरानी व्यवस्था मजबूत हुई है। यदि किसी विशेष पेट्रोल पंप से लगातार खराब माइलेज, इंजन नॉकिंग या वाहन प्रदर्शन में गिरावट की शिकायतें मिलती हैं, तो स्थानीय स्तर पर ईंधन की गुणवत्ता की जांच कराई जा सकती है।


यहीं से विवाद का दूसरा पक्ष शुरू होता है। आज भारत में बिकने वाले पेट्रोल में एथेनॉल (इथेनॉल) मिलाया जाता है। यह कोई अवैध मिलावट नहीं है बल्कि सरकार की घोषित नीति है। केंद्र सरकार लंबे समय से पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा दे रही है। कुछ वर्ष पहले जहां पेट्रोल में लगभग 5 प्रतिशत एथेनॉल मिलाया जाता था, वहीं अब कई क्षेत्रों में 20 प्रतिशत तक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20) उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार इसे "ग्रीन फ्यूल" यानि पर्यावरण-अनुकूल ईंधन के रूप में प्रस्तुत करती है।


एथेनॉल एक प्रकार का अल्कोहल है जो मुख्यतः गन्ने, मक्का और अन्य कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है। सरकार का तर्क है कि इससे कच्चे तेल का आयात कम होगा। विदेशी मुद्रा की बचत होगी। किसानों को अतिरिक्त आय मिलेगी। प्रदूषण घटेगा। ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। सैद्धांतिक रूप से ये सभी उद्देश्य सकारात्मक हैं।


यहीं आम जनता की शिकायत शुरू होती है। एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है। सरल शब्दों में कहें तो एक लीटर पेट्रोल जितनी ऊर्जा देता है, उतनी ऊर्जा एक लीटर एथेनॉल नहीं देता है। इस कारण एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल का उपयोग करने पर कई वाहनों में माइलेज में कुछ कमी देखी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार E20 पेट्रोल के प्रयोग से वाहन की ईंधन दक्षता में लगभग 5 से 10 प्रतिशत तक कमी आ सकती है। यदि किसी वाहन में इससे कहीं अधिक गिरावट आ रही है, तो उसके पीछे अन्य कारण भी हो सकते हैं।


यदि किसी टाटा सूमो का माइलेज 8-9 किलोमीटर से घटकर 4-5 किलोमीटर हो गया है, तो केवल एथेनॉल मिश्रण इसकी पूरी वजह नहीं हो सकता है। इसके पीछे कई अन्य कारण हो सकते हैं।  पुराने इंजन में कार्बन जमा हो जाने से ईंधन की खपत बढ़ जाती है। स्पार्क प्लग ठीक से काम न करे तो ईंधन पूरी तरह नहीं जलता। गंदा एयर फिल्टर इंजन की दक्षता कम कर देता है। ईंधन आपूर्ति प्रणाली में खराबी होने पर माइलेज तेजी से गिर सकता है। पटना जैसे शहरों में बढ़ता ट्रैफिक भी माइलेज पर गंभीर प्रभाव डालता है। कम हवा वाले टायर भी ईंधन की खपत बढ़ाते हैं। इसलिए माइलेज आधा हो जाने की स्थिति में केवल पेट्रोल को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा।


कई लोग पूछते हैं कि सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी पेट्रोल और एथेनॉल नीति पर इतनी सक्रियता क्यों दिखाते हैं? इसका कारण यह है कि गडकरी लंबे समय से वैकल्पिक ईंधनों के समर्थक रहे हैं। वे लगातार एथेनॉल, बायोफ्यूल, ग्रीन हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की बात करते रहे हैं। हालांकि तकनीकी रूप से पेट्रोलियम उत्पादों की जिम्मेदारी पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय की होती है। इसलिए पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण का निर्णय केवल सड़क परिवहन मंत्रालय नहीं बल्कि केंद्र सरकार की समग्र नीति का हिस्सा है।


इससे फायदा किसे हो रहा है? यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है। यदि पेट्रोल में एथेनॉल मिलाया जाता है तो पेट्रोलियम आयात कम होता है। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होती है। गन्ना उत्पादक किसानों को एथेनॉल उद्योग से अतिरिक्त बाजार मिलता है। चीनी मिलों को भी नया व्यवसाय मिलता है। डिस्टिलरी और एथेनॉल उत्पादक कंपनियों का कारोबार बढ़ता है। सरकारी तेल कंपनियां मिश्रित ईंधन नीति के तहत अपनी आपूर्ति श्रृंखला को नए तरीके से संचालित करती हैं।


सरकार का दावा है कि इससे प्रदूषण कम होगा। आयात बिल घटेगा। देश की ऊर्जा सुरक्षा बढ़ेगी। किसानों की आय बढ़ेगी। लेकिन आम वाहन चालक का सीधा सवाल है कि यदि उसे समान कीमत पर कम माइलेज मिल रहा है तो उसका व्यक्तिगत लाभ क्या है? यहीं नीति और जनता के अनुभव के बीच टकराव दिखाई देता है। राष्ट्रीय स्तर पर लाभ दिखाई दे सकता है, लेकिन व्यक्तिगत स्तर पर वाहन चालक को प्रति किलोमीटर अधिक खर्च महसूस हो सकता है।


कई विशेषज्ञों का तर्क है कि यदि एथेनॉल मिश्रण से ऊर्जा घनत्व कम हो रहा है और माइलेज घट रहा है, तो कीमत निर्धारण में इसका प्रभाव भी दिखना चाहिए। लेकिन व्यवहार में उपभोक्ता को पेट्रोल की कीमत में ऐसी कोई स्पष्ट राहत दिखाई नहीं देती। यही कारण है कि लोगों के मन में यह भावना पैदा होती है कि उनसे कम गुणवत्ता वाला ईंधन भी उसी कीमत पर खरीदा जा रहा है।


सबसे पहले ईंधन की गुणवत्ता पर पूर्ण पारदर्शिता आवश्यक है। पेट्रोल पंपों पर यह स्पष्ट रूप से प्रदर्शित होना चाहिए कि वहां कितना प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल उपलब्ध है। दूसरा, सरकार और वाहन निर्माता कंपनियों को वास्तविक माइलेज पर विस्तृत अध्ययन सार्वजनिक करना चाहिए। तीसरा, उपभोक्ताओं के लिए शिकायत और जांच प्रणाली को और मजबूत बनाना चाहिए। चौथा, यदि किसी क्षेत्र में बड़ी संख्या में लोग माइलेज में असामान्य गिरावट की शिकायत कर रहे हैं, तो स्वतंत्र प्रयोगशालाओं द्वारा ईंधन गुणवत्ता की जांच कराई जानी चाहिए।


पेट्रोल में होने वाला एथेनॉल मिश्रण अवैध मिलावट नहीं है बल्कि सरकार की घोषित ऊर्जा नीति का हिस्सा है। इसका उद्देश्य आयात कम करना, किसानों की आय बढ़ाना और प्रदूषण घटाना है। लेकिन यह भी सच है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल की ऊर्जा क्षमता पारंपरिक पेट्रोल से कम होती है, जिससे कुछ हद तक माइलेज प्रभावित हो सकता है। फिर भी यदि किसी वाहन का माइलेज 8-9 किलोमीटर प्रति लीटर से घटकर 4-5 किलोमीटर प्रति लीटर हो गया है, तो उसके पीछे केवल एथेनॉल मिश्रण जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है। वाहन की तकनीकी स्थिति, ट्रैफिक, रखरखाव और ईंधन की वास्तविक गुणवत्ता जैसे कारकों की भी जांच जरूरी है।


आम नागरिक का सवाल वाजिब है कि यदि राष्ट्रीय हित के नाम पर ईंधन नीति बदली जा रही है, तो उसका लाभ भी उसे स्पष्ट रूप से दिखना चाहिए। अन्यथा घटते माइलेज और बढ़ते खर्च के बीच जनता के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में किसी भी नीति की अंतिम कसौटी यही होती है कि उसका लाभ आम नागरिक को कितना और कैसे मिलता है।



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