बिहार के छह जिलों में होगी पॉपकॉर्न की खेती

Jitendra Kumar Sinha
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बिहार सरकार किसानों की आय बढ़ाने और पारंपरिक खेती के साथ-साथ नकदी फसलों को बढ़ावा देने की दिशा में लगातार नए कदम उठा रही है। इसी कड़ी में अब राज्य के छह जिलों में पॉपकॉर्न (विशेष मक्का) की खेती को प्रोत्साहित करने की योजना बनाई गई है। यह पहल न केवल किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने का प्रयास है, बल्कि कृषि क्षेत्र में विविधीकरण और मूल्य संवर्धन (वैल्यू एडिशन) की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। रबी (वासंतिक) मौसम के दौरान शुरू होने वाली इस योजना के तहत किसानों को सब्सिडी पर बीज उपलब्ध कराए जाएंगे, जिससे खेती की लागत कम होगी और अधिक किसान इस नई फसल को अपनाने के लिए प्रेरित होंगे।


राज्य सरकार ने इस योजना के लिए छह जिलों का चयन किया है। इनमें नालंदा, खगड़िया, पूर्णिया, किशनगंज, अररिया और कटिहार शामिल है। इन जिलों की जलवायु और मिट्टी को पॉपकॉर्न उत्पादन के लिए उपयुक्त माना गया है। सरकार का लक्ष्य इन जिलों में कुल 7,742 एकड़ भूमि पर पॉपकॉर्न की खेती कराना है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन क्षेत्रों में पहले से मक्का की खेती का अच्छा अनुभव मौजूद है, इसलिए किसान पॉपकॉर्न की खेती को आसानी से अपना सकते हैं।


योजना के अंतर्गत प्रत्येक किसान को एक एकड़ खेती के लिए 5 किलोग्राम पॉपकॉर्न बीज उपलब्ध कराया जाएगा। बीज खरीदने पर किसानों को 375 रुपये प्रति किलोग्राम की दर से सहायता राशि मिलेगी। यह सहायता प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आरकेवीवाई) के माध्यम से दी जाएगी। इससे किसानों पर शुरुआती निवेश का बोझ कम होगा और अधिक से अधिक किसान इस नई फसल की ओर आकर्षित होंगे।


पिछले कुछ वर्षों में पॉपकॉर्न की मांग देशभर में तेजी से बढ़ी है। मल्टीप्लेक्स, सिनेमाघर, मॉल, फूड प्रोसेसिंग उद्योग, सुपरमार्केट और ऑनलाइन बाजारों में इसकी खपत लगातार बढ़ रही है। आज पॉपकॉर्न केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गया है, बल्कि इसे एक हेल्दी स्नैक के रूप में भी लोकप्रियता मिल रही है। कम वसा, अधिक फाइबर और आसान पाचन क्षमता के कारण स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोग भी इसे पसंद कर रहे हैं। बढ़ती मांग के कारण किसानों को सामान्य मक्का की तुलना में बेहतर मूल्य मिलने की संभावना रहती है।


पॉपकॉर्न की खेती किसानों के लिए आय का एक नया स्रोत बन सकती है। यदि किसानों को उचित गुणवत्ता का बीज, वैज्ञानिक खेती की जानकारी और बाजार की सुविधा मिले, तो वे प्रति एकड़ अधिक लाभ अर्जित कर सकते हैं। इसके अलावा फूड प्रोसेसिंग उद्योग से जुड़ने पर किसानों को सीधे खरीददार भी मिल सकते हैं, जिससे बिचौलियों पर निर्भरता कम होगी। यदि भविष्य में बिहार में पॉपकॉर्न प्रोसेसिंग इकाइयों की स्थापना होती है, तो स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।


कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि पॉपकॉर्न की खेती में अच्छी गुणवत्ता वाले बीज, संतुलित उर्वरक प्रबंधन, समय पर सिंचाई और रोग-कीट नियंत्रण का विशेष महत्व होता है। यदि किसानों को कृषि विभाग द्वारा नियमित प्रशिक्षण, तकनीकी मार्गदर्शन और खेत स्तर पर सहायता उपलब्ध कराई जाए, तो उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में सुधार संभव है। आधुनिक कृषि तकनीकों के प्रयोग से प्रति एकड़ उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।


किसी भी नई फसल की सफलता केवल उत्पादन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उसके विपणन और प्रसंस्करण की मजबूत व्यवस्था भी आवश्यक होती है। यदि सरकार किसानों को खरीद केंद्र, भंडारण सुविधा, प्रोसेसिंग यूनिट और निजी कंपनियों से जोड़ने की व्यवस्था विकसित करती है, तो पॉपकॉर्न की खेती लंबे समय तक लाभदायक बनी रह सकती है। इससे किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलेगा और राज्य में कृषि आधारित उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा।


बिहार सरकार की यह पहल कृषि क्षेत्र में नवाचार और विविधीकरण को बढ़ावा देने वाली योजना मानी जा रही है। परंपरागत फसलों के साथ पॉपकॉर्न जैसी व्यावसायिक फसलें किसानों की आमदनी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। यदि यह योजना सफल रहती है, तो आने वाले वर्षों में इसे राज्य के अन्य जिलों तक भी विस्तारित किया जा सकता है। इससे बिहार पॉपकॉर्न उत्पादन के क्षेत्र में एक नई पहचान बना सकता है और किसानों को स्थायी एवं बेहतर आय के अवसर उपलब्ध हो सकते हैं।


छह जिलों में पॉपकॉर्न की खेती शुरू करने का निर्णय बिहार की कृषि नीति में एक सकारात्मक और दूरदर्शी पहल है। सब्सिडी पर बीज, सरकारी सहायता और बढ़ती बाजार मांग इस योजना को किसानों के लिए आकर्षक बना सकती है। अब आवश्यकता इस बात की है कि खेती से लेकर विपणन तक पूरी श्रृंखला को मजबूत बनाया जाए, ताकि किसान इस नई फसल का पूरा आर्थिक लाभ उठा सकें और बिहार कृषि नवाचार के क्षेत्र में एक नई मिसाल कायम कर सके।



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