फिल्म “शराफत छोड़ दी मैंने”

Jitendra Kumar Sinha
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हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम दौर माने जाने वाले सत्तर के दशक में कई ऐसी फिल्में बनीं, जिन्होंने अपनी कहानी, अभिनय और संगीत के दम पर दर्शकों के दिलों में स्थायी जगह बनाई। इन्हीं फिल्मों में एक नाम "शराफत छोड़ दी मैंने" का भी है। यह फिल्म भले ही अपने समय की सबसे बड़ी व्यावसायिक सफलता न रही हो, लेकिन इसके गीत, कलाकारों का अभिनय और मधुर संगीत आज भी पुराने फिल्म प्रेमियों की पसंद बने हुए हैं।


फिल्म का निर्देशन जगदेव भांबरी ने किया था। इसमें उस दौर के लोकप्रिय अभिनेता फिरोज खान, खूबसूरत और प्रतिभाशाली अभिनेत्री हेमा मालिनी तथा युवा कलाकार नीतू सिंह ने प्रमुख भूमिकाएं निभाईं। तीनों कलाकारों ने अपने-अपने किरदारों को प्रभावशाली ढंग से निभाया, जिससे फिल्म की कहानी और अधिक रोचक बन गई। फिरोज खान अपने स्टाइलिश व्यक्तित्व और दमदार स्क्रीन प्रेजेंस के लिए जाने जाते थे। वहीं हेमा मालिनी अपनी सहज अभिनय शैली और आकर्षक व्यक्तित्व के कारण दर्शकों की पहली पसंद थीं। नीतू सिंह ने भी अपने किरदार में युवा ऊर्जा और स्वाभाविक अभिनय का परिचय दिया।


इस फिल्म की सबसे बड़ी विशेषता इसका संगीत था। संगीतकार मदन मोहन ने अपने विशिष्ट अंदाज में ऐसे गीत तैयार किए, जो समय की कसौटी पर आज भी खरे उतरते हैं। मदन मोहन को हिंदी फिल्म संगीत का 'गज़लों का बादशाह' कहा जाता है। उनकी धुनों में शास्त्रीय संगीत की मिठास और भावनाओं की गहराई साफ झलकती थी। "शराफत छोड़ दी मैंने" में भी उन्होंने ऐसे गीत दिए, जो फिल्म की लोकप्रियता का प्रमुख आधार बने। उनकी संगीत रचना ने फिल्म को एक अलग पहचान दिलाई।


फिल्म के कई गीत आज भी पुराने संगीत प्रेमियों की प्लेलिस्ट का हिस्सा हैं। विशेष रूप से "श्याम सलोना मैं हूं गोरी" और "शराफत छोड़ दी मैंने" जैसे गीत बेहद लोकप्रिय हुए। "श्याम सलोना मैं हूं गोरी" अपनी मधुर धुन, सुंदर बोल और मनमोहक फिल्मांकन के कारण श्रोताओं को आकर्षित करता है। वहीं शीर्षक गीत "शराफत छोड़ दी मैंने" अपने अलग अंदाज और प्रभावशाली प्रस्तुति के कारण लोगों की जुबान पर चढ़ गया। इन गीतों में उस दौर के संगीत की मिठास, सरलता और भावनात्मक गहराई देखने को मिलती है, जो आज के संगीत से अलग पहचान रखती है।


सत्तर का दशक हिन्दी फिल्मों के लिए प्रयोगों और विविध विषयों का दौर था। इस समय बनने वाली फिल्मों में मनोरंजन के साथ-साथ संगीत, भावनाएं, रोमांस और पारिवारिक मूल्यों का सुंदर मिश्रण देखने को मिलता था। "शराफत छोड़ दी मैंने" भी इसी परंपरा का हिस्सा थी। फिल्म में रोमांच, भावनात्मक उतार-चढ़ाव और आकर्षक गीतों का संतुलित समावेश किया गया था। यही कारण है कि फिल्म आज भी पुराने सिनेमा के प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बनी रहती है।


फिरोज खान और हेमा मालिनी की जोड़ी ने इस फिल्म को विशेष आकर्षण प्रदान किया। दोनों कलाकारों की स्क्रीन केमिस्ट्री दर्शकों को खूब पसंद आई। फिरोज खान का आत्मविश्वास से भरा अंदाज और हेमा मालिनी की सौम्यता ने कहानी को जीवंत बना दिया। नीतू सिंह की उपस्थिति ने फिल्म में नई ऊर्जा का संचार किया और युवा दर्शकों को भी कहानी से जोड़ने का काम किया।


आज जब फिल्मों में आधुनिक तकनीक और भव्य दृश्य प्रभावों का दौर है, तब भी सत्तर और अस्सी के दशक की फिल्मों का आकर्षण कम नहीं हुआ है। इसका सबसे बड़ा कारण उनकी मजबूत पटकथा, प्रभावशाली संवाद, उत्कृष्ट अभिनय और कालजयी संगीत है। "शराफत छोड़ दी मैंने" भी ऐसी ही फिल्मों में शामिल है, जिसे उसके गीतों और कलाकारों के शानदार अभिनय के लिए आज भी याद किया जाता है। पुराने संगीत प्रेमी जब भी इस फिल्म के गीत सुनते हैं, तो वे उस सुनहरे दौर की यादों में खो जाते हैं।


"शराफत छोड़ दी मैंने" केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि हिन्दी सिनेमा के उस दौर की प्रतिनिधि कृति है, जब कहानी और संगीत को समान महत्व दिया जाता था। फिरोज खान, हेमा मालिनी और नीतू सिंह का प्रभावशाली अभिनय, निर्देशक जगदेव भांबरी का संतुलित निर्देशन तथा मदन मोहन का मधुर संगीत इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत रहे। विशेष रूप से "श्याम सलोना मैं हूं गोरी" और "शराफत छोड़ दी मैंने" जैसे गीत आज भी श्रोताओं के दिलों में बसे हुए हैं। यही कारण है कि दशकों बाद भी यह फिल्म हिन्दी सिनेमा के स्वर्णिम इतिहास की एक यादगार संगीतमय प्रस्तुति के रूप में याद की जाती है।



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