भारत में जूता-चप्पल उद्योग देश के सबसे बड़े श्रम-प्रधान उद्योगों में से एक है। यह न केवल करोड़ों लोगों की रोजगार आवश्यकताओं को पूरा करता है, बल्कि निर्यात और घरेलू बाजार में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है। उत्पादों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने और उपभोक्ताओं को सुरक्षित एवं टिकाऊ सामान उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार समय-समय पर गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (Quality Control Orders-QCO) लागू करती है। इसी क्रम में केंद्र सरकार ने जूता-चप्पल क्षेत्र से जुड़े दो गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों में संशोधन करते हुए पुराने स्टॉक की निकासी की समयसीमा बढ़ाकर 31 जुलाई, 2027 कर दी है। यह निर्णय उद्योग और व्यापार जगत के लिए एक महत्वपूर्ण राहत के रूप में देखा जा रहा है।
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अनुसार, जूता-चप्पल उद्योग में उत्पादों का भंडार (इन्वेंट्री) अक्सर एक सामान्य बिक्री चक्र से अधिक समय तक गोदामों और दुकानों में बना रहता है। ऐसे में गुणवत्ता नियंत्रण आदेश लागू होने के बाद पुराने स्टॉक को तुरंत बाजार से हटाना व्यावहारिक नहीं था। इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए सरकार ने पुराने स्टॉक की बिक्री और निकासी के लिए पहले निर्धारित समयसीमा में एक वर्ष का विस्तार कर दिया है। अब निर्माता, वितरक और खुदरा विक्रेता 31 जुलाई, 2027 तक पुराने स्टॉक का व्यवस्थित तरीके से निपटान कर सकेंगे।
गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाजार में बिकने वाले जूते और चप्पल निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप हो। इसके अंतर्गत उत्पादों को भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) द्वारा तय मानकों का पालन करना होता है। इन आदेशों के प्रमुख उद्देश्य हैं उपभोक्ताओं को सुरक्षित और टिकाऊ उत्पाद उपलब्ध कराना। निम्न गुणवत्ता वाले उत्पादों की बिक्री पर रोक लगाना। घरेलू उद्योग को वैश्विक गुणवत्ता मानकों के अनुरूप बनाना। भारतीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय बाजार में विश्वसनीयता बढ़ाना। सस्ते लेकिन निम्न गुणवत्ता वाले आयातित उत्पादों पर नियंत्रण रखना।
जूता-चप्पल उद्योग में अनेक उत्पाद मौसमी मांग पर निर्भर होते हैं। कई बार किसी विशेष डिज़ाइन या मॉडल का स्टॉक महीनों तक बिक्री की प्रतीक्षा करता है। यदि गुणवत्ता नियंत्रण आदेश लागू होने के साथ ही पुराने स्टॉक की बिक्री पर रोक लग जाती, तो उद्योग को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता। समयसीमा बढ़ने से निर्माताओं को पुराने स्टॉक को बेचने का पर्याप्त समय मिलेगा। छोटे और मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) पर वित्तीय दबाव कम होगा। थोक और खुदरा विक्रेताओं को नुकसान से बचाव मिलेगा। गोदामों में जमा माल का व्यवस्थित प्रबंधन संभव होगा। उत्पादन और आपूर्ति श्रृंखला में अनावश्यक व्यवधान नहीं आएगा।
इस संशोधन का अर्थ यह नहीं है कि गुणवत्ता मानकों में कोई ढील दी गई है। सरकार ने केवल पहले से निर्मित और उपलब्ध स्टॉक की बिक्री के लिए अतिरिक्त समय दिया है। भविष्य में बनने वाले उत्पादों पर निर्धारित गुणवत्ता मानकों का पालन अनिवार्य रहेगा। उपभोक्ताओं को इसका लाभ इस रूप में मिल सकता है कि बाजार में उत्पादों की उपलब्धता बनी रहेगी और अचानक कीमतों में वृद्धि की संभावना कम होगी। साथ ही, गुणवत्ता मानकों के प्रभावी क्रियान्वयन से आने वाले समय में अधिक सुरक्षित, टिकाऊ और मानक अनुरूप उत्पाद उपलब्ध होंगे।
भारत के जूता-चप्पल उद्योग का बड़ा हिस्सा सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) पर आधारित है। इन इकाइयों के पास बड़े उद्योगों जैसी वित्तीय क्षमता नहीं होती। यदि उन्हें पुराने स्टॉक को तुरंत हटाना पड़ता, तो उनकी पूंजी फंस जाती और उत्पादन प्रभावित हो सकता था। सरकार का यह निर्णय एमएसएमई इकाइयों को नई गुणवत्ता आवश्यकताओं के अनुरूप उत्पादन व्यवस्था विकसित करने के लिए पर्याप्त समय भी प्रदान करेगा। इससे वे बिना अत्यधिक आर्थिक दबाव के नई तकनीक, परीक्षण और प्रमाणन प्रक्रियाओं को अपना सकेंगे।
सरकार का उद्देश्य केवल नियम लागू करना नहीं, बल्कि उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को भी बनाए रखना है। यदि गुणवत्ता मानकों को लागू करते समय उद्योग को पर्याप्त संक्रमण अवधि (Transition Period) दी जाती है, तो कंपनियां बेहतर योजना बनाकर नई व्यवस्था को अपनाती हैं। इससे गुणवत्ता सुधार और व्यापारिक स्थिरता दोनों सुनिश्चित होते हैं। यह संशोधन इसी संतुलित दृष्टिकोण का उदाहरण है, जिसमें उपभोक्ता हित, उद्योग की व्यावहारिक चुनौतियां और आर्थिक गतिविधियों, तीनों का ध्यान रखा गया है।
जूता-चप्पल क्षेत्र के गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों में संशोधन कर पुराने स्टॉक की निकासी की समयसीमा 31 जुलाई, 2027 तक बढ़ाना एक व्यावहारिक और संतुलित निर्णय है। इससे उद्योग, विशेषकर एमएसएमई इकाइयों और व्यापारियों को आर्थिक राहत मिलेगी, जबकि गुणवत्ता सुधार की प्रक्रिया भी जारी रहेगी। दीर्घकाल में यह कदम भारतीय फुटवियर उद्योग को अधिक संगठित, प्रतिस्पर्धी और वैश्विक मानकों के अनुरूप बनाने में सहायक सिद्ध होगा। साथ ही, उपभोक्ताओं को बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद उपलब्ध कराने के सरकार के उद्देश्य को भी मजबूती मिलेगी।
