15 जुलाई से आरंभ होंगे आषाढ़ गुप्त नवरात्र

Jitendra Kumar Sinha
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आषाढ़ शुक्ल  प्रतिपदा, 15 जुलाई से आषाढ़ गुप्त नवरात्र का शुभारंभ होगा। इस वर्ष गुप्त नवरात्र का प्रारंभ अत्यंत शुभ संयोगों में हो रहा है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार इस दिन पुष्य नक्षत्र, हर्षण योग तथा सिद्ध योग का दुर्लभ संयोग बन रहा है, जिसे शक्ति साधना, मंत्र सिद्धि और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है।


गुप्त नवरात्र के पहले दिन विधि-विधान से कलश स्थापना कर मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। इसके बाद दस दिनों तक देवी के विभिन्न स्वरूपों की आराधना होगी। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार निराहार, फलाहार अथवा सात्विक आहार के साथ माता की उपासना करेंगे।


सामान्यतः लोग चैत्र और शारदीय नवरात्र से अधिक परिचित हैं, किंतु वर्ष में दो बार आने वाले गुप्त नवरात्र का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व भी अत्यंत विशेष माना जाता है। आषाढ़ और माघ मास में पड़ने वाले गुप्त नवरात्र विशेष रूप से तंत्र, मंत्र, योग और साधना के लिए श्रेष्ठ माने जाते हैं। इन दिनों में देवी की आराधना करने से मनोकामनाओं की पूर्ति, मानसिक शांति, आध्यात्मिक उन्नति और साधना में सफलता प्राप्त होने की मान्यता है।


वैदिक ज्योतिष में पुष्य नक्षत्र को सभी नक्षत्रों का राजा कहा गया है। यह नक्षत्र देवगुरु बृहस्पति से संबंधित माना जाता है। इस नक्षत्र में आरंभ किए गए धार्मिक अनुष्ठान, यज्ञ, जप, तप, दान, दीक्षा तथा पूजा-पाठ का विशेष पुण्य फल मिलता है। इस वर्ष गुप्त नवरात्र का शुभारंभ पुष्य नक्षत्र में होने से इसकी आध्यात्मिक महत्ता और अधिक बढ़ गई है।


15 जुलाई को हर्षण योग और सिद्ध योग का भी निर्माण हो रहा है। हर्षण योग जीवन में आनंद, सकारात्मकता और शुभ फल प्रदान करने वाला माना जाता है, जबकि सिद्ध योग किसी भी शुभ कार्य की सफलता के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। इन दोनों योगों में देवी की आराधना करने से साधक को विशेष कृपा प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है।


गुप्त नवरात्र के प्रथम दिन प्रातः शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना की जाएगी। मिट्टी के पात्र में जौ बोए जाएंगे और उसके ऊपर जल से भरा कलश स्थापित किया जाएगा। कलश पर नारियल, आम या अशोक के पत्ते तथा लाल वस्त्र स्थापित कर देवी का आवाहन किया जाएगा। कलश को शक्ति, समृद्धि और जीवन ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।


गुप्त नवरात्र के पहले दिन देवी के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाती है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री होने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा जाता है। इनके दाहिने हाथ में त्रिशूल तथा बाएं हाथ में कमल सुशोभित रहता है। इनका वाहन वृषभ है। मां शैलपुत्री की उपासना से जीवन में स्थिरता, साहस और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।


गुप्त नवरात्र के दौरान श्रद्धालु प्रतिदिन देवी के विभिन्न स्वरूपों का पूजन करेंगे। घरों, शक्ति पीठों तथा देवी मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, दुर्गा सप्तशती का पाठ, श्रीचंडी पाठ, देवी कवच, अर्गला स्तोत्र तथा सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ किया जाएगा। अनेक साधक विशेष मंत्रों का जप और साधना भी करेंगे।


गुप्त नवरात्र में घरों और मंदिरों में अखंड दीप प्रज्वलित करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार अखंड दीप ज्ञान, शक्ति, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। यह दीप पूरे नवरात्र तक निरंतर जलता रहता है और देवी की कृपा का प्रतीक माना जाता है।


गुप्त नवरात्र के दौरान अनेक श्रद्धालु नौ या दस दिनों तक व्रत रखते हैं। कुछ लोग निर्जल या निराहार व्रत करते हैं, जबकि अधिकांश फलाहार अथवा सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। इस अवधि में लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा तथा तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है। मन, वचन और कर्म की पवित्रता बनाए रखने पर विशेष बल दिया जाता है।


गुप्त नवरात्र को विशेष रूप से साधकों का पर्व माना जाता है। तंत्र, मंत्र, यंत्र, ध्यान और योग की साधना करने वाले साधक इन दिनों में विशेष अनुष्ठान करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इन दिनों में किए गए जप और साधना का प्रभाव सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक फलदायी होता है।


गुप्त नवरात्र केवल धार्मिक अनुष्ठान का पर्व नहीं है, बल्कि आत्मसंयम, अनुशासन, सकारात्मक सोच और आत्मबल बढ़ाने का भी अवसर है। यह पर्व व्यक्ति को अपनी आंतरिक शक्ति पहचानने, नकारात्मकता पर विजय पाने और जीवन में सदाचार अपनाने की प्रेरणा देता है।


गुप्त नवरात्र में देवी की आराधना का मूल आधार श्रद्धा और विश्वास है। धार्मिक मान्यता है कि जो साधक सच्चे मन से माता की उपासना करते हैं, उनके जीवन के संकट दूर होते हैं तथा सुख, शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है।


15 जुलाई से प्रारंभ हो रहे आषाढ़ गुप्त नवरात्र इस वर्ष पुष्य नक्षत्र, हर्षण योग और सिद्ध योग जैसे दुर्लभ शुभ संयोगों के कारण और भी विशेष माने जा रहे हैं। कलश स्थापना से प्रारंभ होकर दस दिनों तक चलने वाली यह शक्ति साधना श्रद्धालुओं के लिए आस्था, अनुशासन, भक्ति और आध्यात्मिक उन्नति का अनुपम अवसर है। घरों और मंदिरों में अखंड दीप, दुर्गा सप्तशती पाठ, मंत्र-जप, हवन और देवी आराधना के माध्यम से भक्त मां भगवती की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करेंगे। धार्मिक विश्वास है कि इन शुभ दिनों में श्रद्धापूर्वक की गई साधना जीवन में सुख, समृद्धि, आरोग्य, आत्मबल और आध्यात्मिक चेतना का संचार करती है।



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