भारत में नदियाँ केवल जल का स्रोत नहीं हैं, बल्कि कृषि, पेयजल, पर्यावरण, जैव विविधता और क्षेत्रीय विकास की आधारशिला भी हैं। यही कारण है कि जब किसी नदी के जल बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच मतभेद उत्पन्न होते हैं तो उनका प्रभाव केवल प्रशासनिक स्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लाखों लोगों के जीवन, आर्थिक गतिविधियों और प्राकृतिक संसाधनों पर भी पड़ता है। दक्षिण-पश्चिम भारत की महादयी नदी इसी प्रकार के बहुआयामी विवाद का केंद्र रही है। कर्नाटक, गोवा और महाराष्ट्र के बीच दशकों से चल रहे इस विवाद ने समय-समय पर राजनीतिक, कानूनी और पर्यावरणीय बहसों को जन्म दिया है।
हाल ही में केंद्र सरकार ने महादयी नदी बेसिन में प्रस्तावित कलसा-बंडूरी पेयजल परियोजना के लिए वन्यजीव मंजूरी संबंधी कर्नाटक सरकार के प्रस्ताव को वापस लौटा दिया। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि यह मामला वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए वन्यजीव मंजूरी पर आगे की कार्रवाई करना उचित नहीं होगा। भविष्य में न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप प्रस्ताव पर पुनर्विचार किया जाएगा। इस प्रकार केंद्र सरकार ने प्रस्ताव को अस्वीकार नहीं किया है, बल्कि वर्तमान परिस्थितियों में उस पर निर्णय टाल दिया। इस निर्णय ने एक बार फिर महादयी विवाद को राष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है।
कर्नाटक सरकार का कहना है कि यह परियोजना उत्तर कर्नाटक के जल संकट से जूझ रहे जिलों के लिए अत्यंत आवश्यक है, जबकि गोवा सरकार का तर्क है कि इससे राज्य की पारिस्थितिकी, नदी प्रवाह और वन्यजीवों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। महाराष्ट्र भी इस नदी बेसिन में अपनी हिस्सेदारी का दावा करता है। परिणामस्वरूप यह विवाद केवल जल बंटवारे तक सीमित न रहकर पर्यावरण संरक्षण, संघीय ढांचे और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन गया है।
महादयी नदी पश्चिमी घाट क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण नदी है। इसे गोवा में "मांडोवी नदी" के नाम से भी जाना जाता है। यह नदी पश्चिमी घाट के घने वनों और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्रों से होकर गुजरती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 111 किलोमीटर मानी जाती है। महादयी नदी का उद्गम कर्नाटक के बेलगावी जिले के पश्चिमी घाट क्षेत्र में होता है। इसके बाद नदी गोवा में प्रवेश करती है और अंततः अरब सागर में मिल जाती है। नदी का अधिकांश प्रवाह गोवा में है, जबकि इसका जलग्रहण क्षेत्र कर्नाटक और महाराष्ट्र तक फैला हुआ है। इस नदी की अनेक सहायक नदियाँ हैं, जो वर्षा ऋतु में जल प्रवाह को बढ़ाती हैं। पश्चिमी घाट क्षेत्र में भारी वर्षा होने के कारण महादयी नदी वर्षभर जल उपलब्ध कराती है। यही कारण है कि यह नदी गोवा की जीवनरेखा मानी जाती है।
महादयी नदी का महत्व तीनों राज्यों के लिए अलग-अलग दृष्टिकोण से देखा जाता है। गोवा में यह नदी पेयजल की प्रमुख स्रोत है। राजधानी पणजी सहित अनेक शहरों और कस्बों को इसी नदी से जल आपूर्ति होती है। नदी पर्यटन, मत्स्य पालन, नौवहन और कृषि के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। गोवा की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा पर्यटन पर आधारित है। महादयी और मांडोवी नदी पर आयोजित क्रूज पर्यटन, जल क्रीड़ाएँ तथा नदी तटीय पर्यटन राज्य की आय में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
कर्नाटक विशेषकर उत्तर कर्नाटक के कई जिले लंबे समय से पेयजल संकट का सामना कर रहे हैं। राज्य सरकार का कहना है कि महादयी नदी की कुछ सहायक धाराओं से सीमित मात्रा में पानी लेकर इन क्षेत्रों को राहत दी जा सकती है। हुबली-धारवाड़, बेलगावी, गदग तथा आसपास के क्षेत्रों में गर्मियों के दौरान पानी की भारी कमी देखने को मिलती है। कलसा-बंडूरी परियोजना का उद्देश्य इन्हीं क्षेत्रों की जल आवश्यकताओं को पूरा करना है।
महाराष्ट्र का महादयी नदी बेसिन में सीमित हिस्सा है, लेकिन राज्य भी जल उपयोग के अपने अधिकारों का दावा करता रहा है। इसलिए वह भी इस विवाद में एक पक्ष बना हुआ है।
महादयी नदी का अधिकांश जलग्रहण क्षेत्र पश्चिमी घाट में स्थित है। पश्चिमी घाट विश्व के सबसे महत्वपूर्ण जैव विविधता वाले क्षेत्रों में से एक माना जाता है। यह क्षेत्र अनेक दुर्लभ वनस्पतियों, पक्षियों, स्तनधारियों और सरीसृपों का प्राकृतिक आवास है। यहाँ बाघ, तेंदुआ, हाथी, गौर, हिरण, मालाबार विशाल गिलहरी तथा अनेक संकटग्रस्त प्रजातियाँ पाई जाती हैं। महादयी वन्यजीव अभयारण्य तथा आसपास के संरक्षित वन इस पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पर्यावरणविदों का मानना है कि नदी के प्राकृतिक प्रवाह में किसी भी प्रकार का बड़ा परिवर्तन वन्यजीवों और जंगलों पर दीर्घकालीन प्रभाव डाल सकता है।
महादयी जल विवाद नया नहीं है। इसकी शुरुआत लगभग चार दशक पहले हुई थी। जैसे-जैसे उत्तर कर्नाटक में जल संकट बढ़ा, राज्य सरकार ने महादयी नदी की सहायक धाराओं से पानी मोड़ने की योजना तैयार की। गोवा ने इसका विरोध किया और कहा कि इससे राज्य में नदी का प्राकृतिक प्रवाह कम हो जाएगा। धीरे-धीरे यह विवाद दोनों राज्यों के बीच राजनीतिक मुद्दा बन गया। कई बार आंदोलन हुए, ज्ञापन दिए गए और केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की गई। जब आपसी सहमति नहीं बन सकी तो मामला कानूनी प्रक्रिया तक पहुँच गया।
महादयी जल विवाद न्यायाधिकरण ने वर्षों तक तकनीकी और कानूनी अध्ययन किया। इस दौरान विभिन्न प्रकार के साक्ष्य प्रस्तुत किए गए। इनमें प्रमुख थे वर्षा के आँकड़े। नदी के प्रवाह का वैज्ञानिक अध्ययन। जलग्रहण क्षेत्र का विश्लेषण। भविष्य की जल आवश्यकताओं का अनुमान। पर्यावरणीय प्रभाव अध्ययन। राज्यों की विकास योजनाएँ। कृषि और पेयजल की आवश्यकताएँ। विशेषज्ञ समितियों की रिपोर्ट। न्यायाधिकरण ने विभिन्न सरकारी एजेंसियों, वैज्ञानिक संस्थानों तथा विशेषज्ञों की राय भी सुनी।
लंबी सुनवाई के बाद न्यायाधिकरण ने तीनों राज्यों के लिए जल उपयोग का ढांचा निर्धारित किया। हालाँकि निर्णय आने के बाद भी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। कारण यह था कि विभिन्न राज्यों ने फैसले की अलग-अलग व्याख्या की। कर्नाटक का कहना था कि न्यायाधिकरण ने उसकी पेयजल आवश्यकताओं को स्वीकार किया है। गोवा का तर्क था कि किसी भी परियोजना के लिए पर्यावरणीय और वन्यजीव मंजूरी लेना अनिवार्य है तथा प्राकृतिक प्रवाह को नुकसान नहीं पहुँचाया जा सकता।
न्यायाधिकरण के निर्णय के बाद भी कई कानूनी प्रश्न शेष रहे। इनमें प्रमुख थे निर्णय की व्याख्या। परियोजना की वैधता। पर्यावरणीय मंजूरी। वन्यजीव मंजूरी। विभिन्न प्रशासनिक आदेशों की वैधानिकता। इन्हीं मुद्दों को लेकर मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा। आज भी इस विवाद के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई जारी है।
भारत में अंतरराज्यीय नदी जल विवादों के समाधान के लिए विशेष न्यायाधिकरण गठित किए जाते हैं। महादयी विवाद के समाधान के लिए भी महादयी जल विवाद न्यायाधिकरण का गठन किया गया। न्यायाधिकरण ने कई वर्षों तक विभिन्न राज्यों के दावे, जल उपलब्धता, वर्षा, पर्यावरणीय प्रभाव और तकनीकी रिपोर्टों का अध्ययन किया। सैकड़ों दस्तावेज, विशेषज्ञों की रिपोर्ट तथा वैज्ञानिक आंकड़ों का परीक्षण करने के बाद न्यायाधिकरण ने अपना निर्णय सुनाया। इस निर्णय में तीनों राज्यों के बीच जल बंटवारे का एक ढांचा निर्धारित किया गया। हालांकि न्यायाधिकरण का फैसला आने के बाद भी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ, क्योंकि कई मुद्दों पर राज्यों ने अलग-अलग व्याख्या प्रस्तुत की।
कलसा-बंडूरी परियोजना कर्नाटक सरकार की एक महत्वाकांक्षी पेयजल योजना है। इस परियोजना के अंतर्गत महादयी नदी की सहायक धाराओं से सीमित मात्रा में पानी को मोड़कर मालप्रभा नदी प्रणाली तक पहुँचाने का प्रस्ताव है। इस पानी का उपयोग मुख्य रूप से पेयजल आपूर्ति के लिए किया जाना है। राज्य सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य सिंचाई का विस्तार नहीं बल्कि मानव उपयोग के लिए आवश्यक जल उपलब्ध कराना है। कर्नाटक का दावा है कि इस परियोजना से लाखों लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जा सकेगा।
उत्तर कर्नाटक का बड़ा हिस्सा अर्ध-शुष्क क्षेत्र माना जाता है। यहाँ वर्षा अपेक्षाकृत कम होती है और भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। कई शहरों में गर्मियों के दौरान पानी की गंभीर कमी उत्पन्न हो जाती है। कुछ स्थानों पर टैंकरों के माध्यम से जलापूर्ति करनी पड़ती है। राज्य सरकार का तर्क है कि यदि महादयी की सहायक धाराओं से सीमित मात्रा में पानी उपलब्ध हो जाए तो इस समस्या का स्थायी समाधान संभव हो सकता है।
गोवा सरकार इस परियोजना का लगातार विरोध करती रही है। गोवा का कहना है कि नदी के ऊपरी हिस्से से पानी मोड़ने पर राज्य में नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होगा। इसके कारण नदी की पारिस्थितिकी प्रभावित हो सकती है। मत्स्य पालन पर असर पड़ सकता है। मैंग्रोव क्षेत्रों को नुकसान पहुँच सकता है। समुद्री जल का प्रवेश बढ़ सकता है। पेयजल उपलब्धता पर प्रभाव पड़ सकता है। गोवा का यह भी कहना है कि पश्चिमी घाट का पर्यावरण अत्यंत संवेदनशील है, इसलिए किसी भी निर्माण कार्य से पहले व्यापक वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है।
यदि कोई परियोजना संरक्षित वन, राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य अथवा पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र को प्रभावित करती है, तो उसके लिए विभिन्न प्रकार की वैधानिक मंजूरियाँ आवश्यक होती हैं। इनमें शामिल हैं पर्यावरणीय मंजूरी। वन मंजूरी। वन्यजीव मंजूरी। अन्य नियामकीय स्वीकृतियाँ। महादयी परियोजना का कुछ हिस्सा वन्यजीव संरक्षण से जुड़े क्षेत्रों के निकट होने के कारण वन्यजीव मंजूरी का प्रश्न महत्वपूर्ण बन गया है।
हाल के घटनाक्रम में केंद्र सरकार ने कर्नाटक सरकार द्वारा भेजे गए वन्यजीव मंजूरी संबंधी प्रस्ताव को वापस लौटा दिया है। केंद्र का कहना है कि मामला सर्वोच्च न्यायालय में विचाराधीन है और संबंधित राज्यों के बीच कई मुद्दों का समाधान अभी शेष है। इसलिए न्यायालय के अंतिम निर्देशों से पहले किसी प्रकार की प्रशासनिक मंजूरी देना उचित नहीं होगा।
कर्नाटक सरकार ने संकेत दिया है कि वह सर्वोच्च न्यायालय में स्पष्टीकरण के लिए आवेदन दायर करेगी। राज्य की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता का कहना है कि गोवा के जिस आदेश को आधार बनाया गया है, उसकी वैधानिकता पर भी प्रश्न हैं। दूसरी ओर गोवा सरकार पर्यावरण संरक्षण को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की बात कह रही है। स्पष्ट है कि महादयी विवाद का अंतिम समाधान अब न्यायिक प्रक्रिया, वैज्ञानिक अध्ययन और राज्यों के बीच सहमति पर निर्भर करेगा।
