मनुष्य का जीवन समय की तीन धाराओं के बीच निरंतर प्रवाहित होता रहता है- अतीत, वर्तमान और भविष्य। अतीत स्मृतियों का संसार है, जिसमें सफलताओं का गर्व, असफलताओं की पीड़ा, बिछड़ने वालों की कसक और बीते हुए सुख-दुःख की अनगिनत परछाइयाँ समाई रहती हैं। भविष्य कल्पनाओं का प्रदेश है, जहाँ आशाएँ भी हैं, आशंकाएँ भी, सपने भी हैं, संदेह भी। किंतु इन दोनों के बीच एक ऐसा सत्य खड़ा है, जिसे हम अक्सर सबसे कम महत्व देते हैं। वह सत्य है “वर्तमान”।
विडंबना यह है कि मनुष्य का अधिकांश समय उसी में व्यतीत हो जाता है, जो उसके हाथ में नहीं है। कभी वह बीते हुए कल की भूलों पर पछताता है, कभी आने वाले कल की अनिश्चितताओं से भयभीत रहता है। परिणाम यह होता है कि उसके हाथ से आज का सबसे मूल्यवान समय फिसल जाता है। जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जब वर्तमान बीत जाता है, तब वही वर्तमान भविष्य में अतीत बनकर पछतावे का कारण बनता है।
यही कारण है कि भारतीय दर्शन, उपनिषद, गीता और संत साहित्य बार-बार मनुष्य को वर्तमान में जीने का संदेश देते हैं। श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि मनुष्य का अधिकार केवल कर्म पर है, फल पर नहीं। यह संदेश केवल आध्यात्मिक उपदेश नहीं है, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी व्यावहारिक शिक्षा भी है। जो व्यक्ति आज का कर्म पूरी निष्ठा से करता है, उसका आने वाला कल स्वयं सुदृढ़ होता चला जाता है।
आज का समय अनेक प्रकार की सूचनाओं, बहसों, राजनीतिक घटनाओं, सामाजिक तनावों और वैश्विक परिवर्तनों से भरा हुआ है। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल स्क्रीन पर देश-दुनिया की अनगिनत खबरें हमारा स्वागत करती है। कहीं युद्ध की आशंका है, कहीं चुनावी शोर, कहीं आर्थिक संकट, कहीं तकनीकी क्रांति, कहीं पर्यावरण की चिंता और कहीं सामाजिक असंतोष। हर समाचार हमारी भावनाओं को प्रभावित करता है। धीरे-धीरे हम अपने भीतर की शांति खोने लगते हैं।
समस्या समाचारों में नहीं है, समस्या हमारी मानसिक प्रवृत्ति में है। हम हर घटना को अपने मन का बोझ बना लेते हैं। जिस विषय पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है, उसी पर सबसे अधिक चिंता करने लगते हैं। परिणामस्वरूप हमारा ध्यान अपने कर्तव्य, अपने परिवार, अपने स्वास्थ्य, अपने समाज और अपने आत्मविकास से हटने लगता है। यहीं से जीवन में असंतुलन आरंभ होता है।
भारतीय संस्कृति में अमावस्या का विशेष स्थान है। सामान्यतः लोग इसे अंधकार, शून्यता या विराम का प्रतीक मानते हैं, किंतु भारतीय चिंतन इससे कहीं अधिक गहरा है। अमावस्या हमें यह सिखाती है कि जब बाहर प्रकाश दिखाई नहीं देता है, तब भीतर दीपक जलाना चाहिए। जिस प्रकार चंद्रमा अमावस्या के बाद पुनः अपनी कलाओं का विस्तार करता है, उसी प्रकार मनुष्य भी अपने जीवन में निराशा, असफलता और अंधकार के बाद पुनः नई ऊर्जा प्राप्त कर सकता है। अंधकार स्थायी नहीं होता। वह केवल प्रकाश के आगमन की भूमिका तैयार करता है।
जीवन में भी अनेक ऐसी अमावस्याएँ आती हैं। कभी आर्थिक संकट, कभी पारिवारिक तनाव, कभी सामाजिक उपेक्षा, कभी स्वास्थ्य संबंधी कठिनाइयाँ और कभी मानसिक अकेलापन। यदि मनुष्य इन्हें अंत समझ ले, तो वह टूट जाता है। यदि इन्हें नई शुरुआत मान ले, तो वही परिस्थितियाँ उसके व्यक्तित्व को और अधिक मजबूत बना देती है।
मनुष्य का अधिकांश दुःख अपेक्षाओं से जन्म लेता है। हम चाहते हैं कि परिवार हमें समझे, समाज हमारा सम्मान करे, मित्र साथ दें, राजनीति आदर्श बने, शासन निष्पक्ष हो, व्यवस्था पारदर्शी हो और हर व्यक्ति हमारे अनुरूप व्यवहार करे। इनमें से कुछ अपेक्षाएँ उचित हैं, कुछ स्वाभाविक और कुछ अव्यावहारिक।
जब अपेक्षाएँ पूरी नहीं होती है, तब मन में उपेक्षा का भाव जन्म लेता है। यही उपेक्षा धीरे-धीरे शिकायत, क्रोध और निराशा का रूप धारण कर लेती है। व्यक्ति बाहर से सामान्य दिखाई देता है, किंतु भीतर ही भीतर टूटने लगता है।
भारतीय दर्शन कहता है कि अपेक्षा कम और कर्तव्य अधिक होना चाहिए। इसका अर्थ यह नहीं कि अन्याय सह लिया जाए या अधिकार छोड़ दिए जाएँ। इसका अर्थ केवल इतना है कि अपने सुख का आधार केवल दूसरों के व्यवहार पर नहीं रखा जाना चाहिए।
आज का प्रत्येक दिन किसी न किसी राजनीतिक घटना से भरा होता है। सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप, चुनावी रणनीतियाँ, नीतिगत घोषणाएँ, जनसभाएँ, मीडिया बहसें और सोशल मीडिया पर चलने वाले विचारों के अनगिनत प्रवाह। इन सबके बीच सामान्य नागरिक अनेक बार स्वयं को भ्रमित अनुभव करता है।
लोकतंत्र में राजनीति आवश्यक है, क्योंकि वही शासन व्यवस्था का आधार है। किंतु राजनीति यदि समाज को जोड़ने के बजाय बाँटने लगे, संवाद के स्थान पर टकराव को बढ़ाने लगे और जनहित के स्थान पर केवल प्रचार का माध्यम बन जाए, तो नागरिक का विश्वास कमजोर होने लगता है।
एक सजग नागरिक का दायित्व है कि वह समाचार पढ़े, तथ्यों को समझे, प्रश्न पूछे, मतदान करे और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भाग ले। परंतु साथ ही उसे यह भी समझना चाहिए कि उसका संपूर्ण जीवन केवल राजनीतिक बहसों तक सीमित नहीं हो सकता है। यदि किसान खेती छोड़कर केवल राजनीति पर चर्चा करने लगे, शिक्षक पढ़ाना छोड़ दे, चिकित्सक सेवा छोड़ दे, पत्रकार सत्य की खोज छोड़ दे और विद्यार्थी अध्ययन छोड़ दे, तो समाज की वास्तविक प्रगति रुक जाएगी। इसलिए राजनीति को समझना आवश्यक है, किंतु अपने कर्तव्य से विमुख होना उचित नहीं।
जीवन की सबसे बड़ी शक्ति यथार्थ को स्वीकार करने में है। यथार्थ का अर्थ निराशावाद नहीं है। इसका अर्थ है, वस्तुस्थिति को वैसा ही देखना जैसी वह है। यदि समाज में समस्याएँ हैं, तो उन्हें स्वीकार करना होगा। यदि उपलब्धियाँ हैं, तो उनका सम्मान भी करना होगा। यदि व्यवस्था में कमियाँ हैं, तो सुधार के लिए सकारात्मक प्रयास भी करने होंगे। केवल आलोचना समाज का निर्माण नहीं करती। केवल प्रशंसा भी प्रगति का मार्ग नहीं बनाती। विकास का मार्ग संतुलित दृष्टि से होकर गुजरता है। यही संतुलन भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी पहचान रहा है।
हमारा प्रत्येक छोटा निर्णय भविष्य का निर्माण करता है। आज बोया गया बीज ही कल वृक्ष बनता है। आज पढ़ा गया एक पृष्ठ, आज किया गया एक सद्कर्म, आज बोला गया एक मधुर शब्द, आज निभाई गई एक जिम्मेदारी, ये सभी मिलकर आने वाले वर्षों का चरित्र बनाते हैं। इसीलिए जीवन की सबसे बड़ी कला भविष्य की चिंता करना नहीं, बल्कि वर्तमान को श्रेष्ठ बनाना है। जो व्यक्ति आज का सम्मान करता है, समय उसका सम्मान करता है। जो व्यक्ति आज को व्यर्थ खो देता है, भविष्य उसे अवसर नहीं लौटाता।
अमावस्या का यही संदेश है कि यदि बाहर अंधकार है तो भीतर प्रकाश जगाइए। यदि परिस्थितियाँ कठिन हैं तो धैर्य रखिए। यदि समाज में शोर है तो अपने विवेक की आवाज सुनिए। यदि राजनीति में मतभेद हैं तो मानवता को मत भूलिए। यदि अपेक्षाएँ टूट रही हैं तो अपने कर्तव्य को और अधिक दृढ़ कीजिए। क्योंकि अंततः इतिहास उन्हीं लोगों को याद रखता है जिन्होंने परिस्थितियों को दोष देने के बजाय अपने वर्तमान को सार्थक बनाया। यह वर्तमान ही कल का इतिहास बनेगा और आज का प्रत्येक कर्म आने वाली पीढ़ियों के लिए एक संदेश छोड़ जाएगा।
