प्रकृति का एक अटल नियम है कि बड़ी छलांग लगाने से पहले शरीर पीछे की ओर झुकता है। तीर को लक्ष्य तक पहुंचाने के लिए धनुष की प्रत्यंचा को पीछे खींचना पड़ता है। कोई धावक लंबी कूद लगाने से पहले कुछ कदम पीछे हटकर गति प्राप्त करता है। यही सिद्धांत विज्ञान का भी है और जीवन का भी। राजनीति भी इससे अलग नहीं है। यहां भी कई बार अस्थायी पराजय भविष्य की निर्णायक विजय की भूमिका बन जाती है।
भारतीय राजनीति में पिछले तीन महीनों की घटनाओं ने इसी सिद्धांत को साकार किया है। 17 अप्रैल को संसद में केंद्र सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता वाला 131वां संविधान संशोधन विधेयक अपेक्षित समर्थन न मिलने के कारण पारित नहीं हो सका। उस समय विपक्ष ने इसे सरकार की राजनीतिक पराजय और संसदीय अंकगणित की कमजोरी के रूप में प्रस्तुत किया। अनेक राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी संसदीय चुनौती बताया।
राजनीति स्थिर नहीं रहती है। लोकतंत्र में संख्या ही शक्ति है और संख्या समय के साथ बदलती रहती है। संसद का गणित केवल आम चुनावों से ही नहीं बदलता, दलबदल, दलों के विभाजन, नए गठबंधन, समर्थन वापसी और नए समर्थन से भी बदलता है। पिछले तीन महीनों में भारतीय राजनीति में ऐसे ही घटनाक्रम तेजी से सामने आए हैं, जिन्होंने सत्ता और विपक्ष दोनों की स्थिति को बदल दिया है।
सोमवार को संसद का मानसून सत्र आरंभ हो गया है, अब तस्वीर अप्रैल वाली नहीं रह गई है। सत्ता पक्ष पहले की तुलना में कहीं अधिक आत्मविश्वास के साथ सदन में प्रवेश कर रहा है, जबकि विपक्ष अनेक अंतर्विरोधों, टूट और नेतृत्व संबंधी चुनौतियों से जूझता दिखाई देता है। यही कारण है कि अब उन विधेयकों के दोबारा आने की चर्चा तेज है, जिन्हें कुछ समय पहले सरकार के लिए कठिन माना जा रहा था।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में संसद केवल कानून बनाने का मंच नहीं है, बल्कि राजनीतिक शक्ति की वास्तविक परीक्षा भी है। 17 अप्रैल का दिन इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा। सरकार जिस संविधान संशोधन विधेयक को अपनी प्राथमिकता बता रही थी, वह अपेक्षित समर्थन प्राप्त नहीं कर सका। संविधान संशोधन सामान्य विधेयकों की तरह नहीं होते हैं। इनके लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत आवश्यक होता है। केवल उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों का बहुमत पर्याप्त नहीं होता है, बल्कि कुल सदस्य संख्या के आधार पर भी एक निश्चित समर्थन चाहिए। यही कारण है कि सरकारों को अपने सहयोगी दलों के साथ-साथ कई बार अन्य दलों का भी समर्थन जुटाना पड़ता है।
उस समय सरकार के पास लोकसभा में स्पष्ट बहुमत तो था, किंतु संविधान संशोधन के लिए आवश्यक संख्या को लेकर चुनौती बनी हुई थी। विपक्ष इस मुद्दे पर अपेक्षाकृत अधिक संगठित दिखाई दिया और सरकार को पीछे हटना पड़ा। राजनीति में ऐसी घटनाएं असामान्य नहीं हैं। कई बार सरकारें किसी विधेयक को वापस लेकर परिस्थितियों के अनुकूल होने की प्रतीक्षा करती हैं। इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं, जब किसी प्रस्ताव को पहले अस्वीकार किया गया, लेकिन बाद में वही प्रस्ताव बदले हुए राजनीतिक वातावरण में पारित हो गया।
अप्रैल से जुलाई के बीच भारतीय राजनीति में घटनाओं की गति असाधारण रही। कई राज्यों में राजनीतिक समीकरण बदले। कुछ दलों में असंतोष खुलकर सामने आया। कुछ नेताओं ने अपनी पुरानी पार्टी छोड़ दी, तो कुछ दलों के भीतर विभाजन हुआ। कई निर्दलीय सांसदों और छोटे दलों ने भी अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप नए निर्णय लिए।
भारतीय लोकतंत्र में गठबंधन राजनीति अब स्थायी वास्तविकता बन चुकी है। इसलिए संसद की शक्ति केवल चुनाव परिणामों से निर्धारित नहीं होती। सरकार की स्थिरता इस बात पर भी निर्भर करती है कि सहयोगी दल कितने संतुष्ट हैं, विपक्ष कितना संगठित है और क्षेत्रीय दल किस दिशा में झुक रहे हैं। इन तीन महीनों में सत्ता पक्ष ने लगातार राजनीतिक संवाद बनाए रखा। सहयोगी दलों की चिंताओं को दूर करने का प्रयास किया गया। कई राज्यों में नए राजनीतिक समीकरण तैयार हुए। इसका सीधा प्रभाव संसद की संख्या पर भी दिखाई देने लगा।
भारतीय राजनीति में विचारधारा महत्वपूर्ण है, लेकिन संसद के भीतर अंतिम निर्णय संख्या ही करती है। लोकसभा में कौन कितना मजबूत है, इसका निर्धारण सीटों की संख्या से होता है। यही संख्या तय करती है कि कोई विधेयक पारित होगा या नहीं। यही कारण है कि प्रत्येक राजनीतिक दल लगातार अपनी संसदीय शक्ति बढ़ाने का प्रयास करता है। कभी नए सहयोगी जोड़े जाते हैं, कभी छोटे दलों को साथ लाया जाता है, तो कभी विपक्षी दलों में असंतुष्ट नेताओं को अपने पक्ष में लाने का प्रयास किया जाता है।
इसी प्रक्रिया को विपक्ष अक्सर "दलबदल की राजनीति" कहता है, जबकि सत्ता पक्ष इसे "राजनीतिक पुनर्संयोजन" और "विकास के एजेंडे के लिए समर्थन" बताता है। दोनों पक्षों की अपनी-अपनी व्याख्या होती है, लेकिन संसदीय परिणाम अंततः संख्या पर ही निर्भर करते हैं। भारतीय लोकतंत्र में आम धारणा यह रही है कि चुनाव के बाद अगले चुनाव तक संसद की तस्वीर लगभग स्थिर रहती है। लेकिन पिछले दो दशकों में यह धारणा काफी बदली है।
अब अनेक राज्य सरकारें दलबदल, गठबंधन परिवर्तन और दलों के विभाजन के कारण बदल चुकी हैं। महाराष्ट्र, बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और कई अन्य राज्यों ने यह दिखाया है कि चुनाव परिणाम अंतिम सत्य नहीं होते हैं। राजनीतिक परिस्थितियां समय-समय पर बदलती रहती है। इसी प्रवृत्ति का प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति पर भी दिखाई देता है। यदि सहयोगी दलों का समर्थन बढ़ता है या विपक्ष कमजोर होता है, तो सरकार की संसदीय स्थिति स्वतः मजबूत हो जाती है।
लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष सरकार के लिए संतुलन का कार्य करता है। लेकिन जब विपक्ष स्वयं आंतरिक मतभेदों, नेतृत्व विवादों और क्षेत्रीय महत्वाकांक्षाओं से जूझने लगे, तब उसकी प्रभावशीलता कम होने लगती है। आज विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती सरकार नहीं है, बल्कि अपनी एकजुटता है। अलग-अलग राज्यों में विपक्षी दल एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी भी हैं। जहां एक दल मजबूत है, वहां दूसरा कमजोर है। राष्ट्रीय स्तर पर साझा रणनीति बनाना लगातार कठिन होता जा रहा है। यही कारण है कि संसद के भीतर कई बार विपक्ष संयुक्त दिखाई देता है, लेकिन राज्यों में वही दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं। यह विरोधाभास उनकी राजनीतिक विश्वसनीयता को भी प्रभावित करता है।
मानसून सत्र शुरू होने से पहले ही सरकार की ओर से जो संकेत मिले हैं, उनसे स्पष्ट है कि सत्ता पक्ष अब पहले की तुलना में कहीं अधिक आत्मविश्वास में है। इसका कारण केवल संसदीय संख्या नहीं है, बल्कि सहयोगी दलों का अपेक्षाकृत स्थिर समर्थन भी है। सरकार यह संदेश देना चाहती है कि पिछले कुछ महीनों में जो राजनीतिक परिस्थितियां बदली है, उनका उपयोग केवल सत्ता विस्तार के लिए नहीं, बल्कि लंबित विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया जाएगा। यही कारण है कि अनेक महत्वपूर्ण विधेयकों और संवैधानिक संशोधनों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं फिर तेज है।
यदि भारतीय राजनीति में आने वाले वर्षों का सबसे बड़ा मुद्दा किसी एक विषय को माना जाए, तो वह परिसीमन हो सकता है। जनसंख्या के आधार पर संसदीय क्षेत्रों के पुनर्गठन का प्रभाव केवल चुनावी नक्शे तक सीमित नहीं रहेगा। इससे राज्यों की राजनीतिक शक्ति, संसद की संरचना और राष्ट्रीय राजनीति का संतुलन भी प्रभावित हो सकता है। दक्षिण और उत्तर भारत के बीच प्रतिनिधित्व का प्रश्न, जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों का प्रभाव और संघीय ढांचे की नई बहस। ये सभी मुद्दे परिसीमन के साथ और अधिक प्रमुखता से सामने आ सकते हैं। इसीलिए संसद का वर्तमान सत्र केवल विधायी प्रक्रिया तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसे भविष्य की राजनीति की दिशा तय करने वाले सत्र के रूप में भी देखा जा रहा है।
मानसून सत्र की शुरुआत ऐसे समय हुई है, जब सत्ता पक्ष पहले की तुलना में अधिक संगठित दिखाई दे रहा है और विपक्ष नए राजनीतिक संतुलन की तलाश में है। आने वाले दिनों में संसद के भीतर होने वाली बहसें केवल वर्तमान कानूनों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि वे 2029 की राजनीति, परिसीमन के बाद बनने वाले भारत और बदलते गठबंधन युग की भी भूमिका तैयार करेगी। इसलिए यह सत्र केवल संसदीय कार्यवाही नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के अगले अध्याय की प्रस्तावना भी माना जा सकता है।
