लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता है। लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति जनता की उस स्वतंत्रता में निहित होती है, जिसके माध्यम से वह अपनी असहमति व्यक्त कर सके, सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठा सके और आवश्यकता पड़ने पर शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज करा सके। यही कारण है कि भारतीय संविधान ने नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शांतिपूर्ण सभा करने का अधिकार तथा संगठन बनाने का अधिकार प्रदान किया है। इन अधिकारों के बिना लोकतंत्र केवल एक प्रशासनिक व्यवस्था बनकर रह जाएगा, जिसमें जनता की भागीदारी सीमित हो जाएगी।
संविधान ने अधिकारों के साथ-साथ उनकी सीमाएँ भी निर्धारित की हैं। किसी भी अधिकार का उद्देश्य दूसरे नागरिक के अधिकारों का हनन करना नहीं हो सकता। यदि विरोध के नाम पर सड़कें स्थायी रूप से बंद कर दी जाएँ, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया जाए, पुलिस या प्रशासन पर हमला किया जाए अथवा आम नागरिकों के जीवन को बाधित किया जाए, तो वह लोकतांत्रिक विरोध नहीं है, बल्कि कानून-व्यवस्था की चुनौती बन जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी प्रारंभ होती है।
हाल के वर्षों में देश ने अनेक बड़े आंदोलन देखे हैं। कुछ आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहे और उन्होंने लोकतंत्र को मजबूत किया, जबकि कुछ ऐसे भी रहे जहाँ आंदोलन धीरे-धीरे अपने मूल उद्देश्य से भटककर हिंसा, टकराव और अराजकता का रूप लेते दिखाई दिए। प्रत्येक ऐसी घटना के बाद वही प्रश्न फिर सामने आता है- लोकतंत्र में विरोध की सीमा क्या है? सरकार को कितनी सहनशीलता दिखानी चाहिए और कब कठोर कार्रवाई आवश्यक हो जाती है?
इसी संदर्भ में राजधानी दिल्ली में जंतर-मंतर से शुरू हुआ हालिया घटनाक्रम व्यापक चर्चा का विषय बन गया है। विरोध प्रदर्शन के दौरान जब प्रदर्शनकारियों का एक समूह निर्धारित क्षेत्र से आगे बढ़ते हुए संसद की ओर कूच करने लगा, तब प्रशासन ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। प्रारंभिक स्तर पर समझाइश, बैरिकेडिंग और चेतावनी जैसे उपाय अपनाए गए, लेकिन स्थिति तेजी से तनावपूर्ण होती चली गई। देखते ही देखते टकराव, धक्का-मुक्की, पत्थरबाजी, लाठीचार्ज और आंसू गैस के प्रयोग तक बात पहुँच गई। कई लोगों को हिरासत में लिया गया और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी भी घायल हुए। घटनाओं के अलग-अलग पक्षों की अपनी-अपनी व्याख्या हो सकती है, किंतु इतना स्पष्ट है कि किसी भी लोकतंत्र के लिए ऐसी स्थिति चिंताजनक होती है।
इस प्रकार की घटनाएँ केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं होती है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कृति की भी परीक्षा होती हैं। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना आवश्यक है, किंतु उतना ही आवश्यक यह भी है कि विरोध अपनी वैधानिक सीमाओं के भीतर रहे। यदि विरोध का स्वरूप ऐसा हो जाए कि संसद, न्यायालय, अस्पताल, स्कूल, सार्वजनिक परिवहन या सामान्य नागरिकों का जीवन प्रभावित होने लगे, तो लोकतांत्रिक अधिकार और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बिगड़ जाता है।
भारत का संविधान अनुच्छेद 19(1)(क) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 19(1)(ख) के अंतर्गत शांतिपूर्ण और निरस्त्र सभा करने का अधिकार देता है। किंतु अनुच्छेद 19(2) और 19(3) यह भी स्पष्ट करते हैं कि सार्वजनिक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा, नैतिकता तथा देश की अखंडता के हित में इन अधिकारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। अर्थात संविधान स्वयं यह स्वीकार करता है कि स्वतंत्रता पूर्णतः निरंकुश नहीं हो सकती है।
यही कारण है कि किसी भी आंदोलन के लिए प्रशासन अनुमति, स्थान, समय और मार्ग निर्धारित करता है। इन नियमों का उद्देश्य आंदोलन को रोकना नहीं है, बल्कि उसे व्यवस्थित बनाए रखना होता है ताकि आम नागरिकों के अधिकार भी सुरक्षित रहे। यदि कोई समूह इन निर्धारित सीमाओं को तोड़कर संवेदनशील क्षेत्रों की ओर बढ़ता है या सुरक्षा घेरा भेदने का प्रयास करता है, तो प्रशासन के पास हस्तक्षेप करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की भूमिका भी अत्यंत कठिन होती है। एक ओर उसे नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी होती है, दूसरी ओर कानून-व्यवस्था भी बनाए रखनी होती है। यदि पुलिस समय रहते हस्तक्षेप न करे और हिंसा फैल जाए, तो उसकी आलोचना होती है, यदि वह बल प्रयोग करे, तो भी उसके निर्णय पर प्रश्न उठते हैं। इसलिए प्रत्येक कार्रवाई की वैधता इस बात पर निर्भर करती है कि परिस्थितियाँ क्या थी, बल प्रयोग कितना आवश्यक था और क्या उससे पहले संवाद तथा अन्य शांतिपूर्ण उपायों का पूरा प्रयास किया गया था।
विरोध प्रदर्शनों की एक बड़ी चुनौती यह भी है कि उनमें शामिल प्रत्येक व्यक्ति समान उद्देश्य लेकर नहीं आता है। प्रारंभिक आयोजकों की मंशा शांतिपूर्ण हो सकती है, लेकिन जैसे-जैसे भीड़ बढ़ती है, विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक अथवा अवसरवादी तत्व उसमें शामिल हो जाते हैं। कई बार ऐसे लोग आंदोलन का उपयोग अपने अलग एजेंडे के लिए करने लगते हैं। परिणामस्वरूप आंदोलन का स्वरूप बदल जाता है और नेतृत्व भीड़ पर अपना नियंत्रण खो बैठता है। इतिहास गवाह है कि अनेक आंदोलनों में हिंसा की शुरुआत उन्हीं परिस्थितियों में हुई जब नेतृत्व और भीड़ के बीच संवाद समाप्त हो गया।
ऐसे समय में सबसे अधिक नुकसान उन लोगों को होता है जो केवल अपनी बात रखने के उद्देश्य से आंदोलन में शामिल हुए थे। वे न तो हिंसा चाहते हैं और न ही कानून तोड़ना, लेकिन भीड़ का हिस्सा बनने के कारण वे भी पुलिस कार्रवाई, गिरफ्तारी या लंबी कानूनी प्रक्रिया का सामना करने को विवश हो जाते हैं। कई निर्दोष लोग वर्षों तक अदालतों के चक्कर लगाते रहते हैं, जबकि वास्तविक उपद्रवी अक्सर भीड़ का लाभ उठाकर निकल जाते हैं।
लोकतंत्र में सबसे बड़ी चुनौती यही है कि विरोध का अधिकार सुरक्षित रहे, लेकिन अराजकता को वैधता न मिले। यदि हर आंदोलन हिंसक होने लगे, तो सरकारें कठोर होती जाएँगी और यदि हर सरकारी कार्रवाई को दमन कहकर खारिज कर दिया जाए, तो कानून का शासन कमजोर पड़ जाएगा। दोनों ही स्थितियाँ लोकतंत्र के लिए घातक हैं।
महात्मा गांधी ने सत्याग्रह को केवल विरोध का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मानुशासन का मार्ग माना था। उनके लिए आंदोलन की सफलता भीड़ की संख्या से नहीं, बल्कि उसके नैतिक बल से तय होती थी। गांधीजी का मानना था कि आंदोलनकारी स्वयं कानून का सम्मान करेगा, हिंसा से दूर रहेगा और अपने आचरण से समाज का विश्वास अर्जित करेगा। यही कारण है कि उनके नेतृत्व में हुए अधिकांश आंदोलनों ने विश्व का ध्यान आकर्षित किया और नैतिक शक्ति के आधार पर सत्ता को झुकने के लिए विवश किया।
आज जब आधुनिक आंदोलनों की तुलना गांधीवादी आंदोलनों से की जाती है, तो सबसे बड़ा अंतर अनुशासन और नेतृत्व का दिखाई देता है। सोशल मीडिया के युग में भीड़ कुछ ही घंटों में इकट्ठी हो जाती है, लेकिन उसका कोई स्पष्ट नेतृत्व या उत्तरदायित्व नहीं होता है। ऐसी स्थिति में अफवाहें, उत्तेजना और उकसावे की राजनीति तेजी से फैलती है, जिससे शांतिपूर्ण विरोध भी हिंसक मोड़ ले सकता है।
लोकतंत्र को बचाने के लिए केवल सरकार की संवेदनशीलता पर्याप्त नहीं है। उतनी ही आवश्यकता जिम्मेदार नागरिक समाज, अनुशासित नेतृत्व, पारदर्शी प्रशासन और कानून के प्रति सम्मान की भी है। लोकतंत्र संवाद से चलता है, टकराव से नहीं। विरोध उसकी आत्मा है, लेकिन हिंसा उसका सबसे बड़ा शत्रु।
हालिया घटनाएँ एक बार फिर यही संकेत देती हैं कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में विरोध और व्यवस्था के बीच संतुलन बनाए रखना आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होगा। प्रश्न केवल इतना नहीं है कि पुलिस ने क्या किया या प्रदर्शनकारियों ने क्या किया; प्रश्न यह भी है कि क्या हमारा लोकतांत्रिक समाज ऐसी संस्कृति विकसित कर पा रहा है जहाँ असहमति बिना हिंसा के प्रभावी ढंग से व्यक्त की जा सके। यदि इसका उत्तर "हाँ" नहीं है, तो यह केवल सरकार या विपक्ष की नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक समाज की सामूहिक चिंता का विषय है।
