रणनीतिकार से नेता बनने का कठिन सफर

Jitendra Kumar Sinha
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भारतीय राजनीति में कई ऐसे लोग हुए हैं जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर बड़ी राजनीतिक सफलताएं हासिल की, लेकिन जब वे स्वयं चुनावी मैदान में उतरे तो उन्हें उतनी सफलता नहीं मिली। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि रणनीति बनाना और जनसमर्थन अर्जित करना दो अलग-अलग कौशल हैं।


प्रशांत किशोर वर्षों तक देश के सबसे चर्चित चुनावी रणनीतिकार रहे हैं। उन्होंने विभिन्न दलों के लिए चुनावी अभियानों का संचालन किया और कई राज्यों में अपनी रणनीतिक क्षमता का परिचय दिया। लेकिन अब परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी हैं। अब उन्हें किसी दूसरे नेता की छवि नहीं बनानी है, बल्कि स्वयं को जनता के बीच विश्वसनीय विकल्प के रूप में स्थापित करना है। जनता अब उनके भाषण, उनके विचार, उनके संगठन और उनके नेतृत्व की क्षमता का मूल्यांकन करेगी।


लोकतंत्र में चुनाव केवल आंकड़ों और सर्वेक्षणों से नहीं जीते जाते। मतदाता उम्मीदवार के व्यवहार, उपलब्धता, संघर्ष, सामाजिक जुड़ाव और विश्वसनीयता को भी महत्व देता है। यही वह क्षेत्र है जहाँ प्रशांत किशोर की वास्तविक परीक्षा होगी।


बिहार के मतदाता लंबे समय से ऐसे नेताओं को देखते आए हैं जो वर्षों तक उनके बीच सक्रिय रहे हैं। ऐसे में किसी नए राजनीतिक विकल्प को स्वीकार करने के लिए केवल बेहतर भाषण या बेहतर रणनीति पर्याप्त नहीं होती है। जनता यह भी देखती है कि संकट के समय कौन उसके साथ खड़ा रहा।


प्रशांत किशोर के नेतृत्व में बनी जन सुराज ने बिहार में वैकल्पिक राजनीति का दावा किया है। पार्टी का कहना है कि वह जाति और पारंपरिक सत्ता संघर्ष से ऊपर उठकर विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुशासन की राजनीति करना चाहती है। यह विचार आकर्षक अवश्य है, लेकिन इसे चुनावी सफलता में बदलना आसान नहीं है।


बिहार की राजनीति में दशकों से जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व, बूथ प्रबंधन और संगठनात्मक नेटवर्क निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। ऐसे में किसी नई पार्टी के लिए इन सभी मोर्चों पर एक साथ प्रभावी होना कठिन चुनौती है।


यह प्रश्न केवल बांकीपुर तक सीमित नहीं है। यदि जन सुराज इस चुनाव में उल्लेखनीय प्रदर्शन करती है, तो यह संदेश जाएगा कि बिहार का एक वर्ग पारंपरिक राजनीति से अलग विकल्प तलाश रहा है। लेकिन यदि प्रदर्शन उम्मीदों से कमजोर रहता है, तो आलोचक इसे यह कहकर प्रचारित करेंगे कि केवल विचार और अभियान से चुनाव नहीं जीते जाते। इस प्रकार यह उपचुनाव जन सुराज की राजनीतिक विश्वसनीयता का पहला बड़ा पैमाना बन गया है।


भारतीय जनता पार्टी लंबे समय से बांकीपुर को अपने मजबूत शहरी गढ़ के रूप में देखती रही है। इसलिए इस सीट पर किसी भी प्रकार की चुनौती को पार्टी हल्के में नहीं ले सकती। भाजपा के लिए यह चुनाव तीन स्तरों पर महत्वपूर्ण है। पहला- संगठन की सक्रियता की परीक्षा। दूसरा- शहरी मतदाता के विश्वास की परीक्षा। तीसरा- विपक्ष और नए राजनीतिक दलों के सामने अपनी ताकत प्रदर्शित करने का अवसर।


यदि पार्टी यह सीट बड़े अंतर से जीतती है तो यह संदेश जाएगा कि उसका संगठन अभी भी पूरी तरह मजबूत है। यदि मुकाबला कड़ा होता है तो विपक्ष इसे मनोवैज्ञानिक बढ़त के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करेगा।


बांकीपुर का नाम आते ही नितिन नवीन की पहचान स्वतः जुड़ जाती है। वर्षों तक इस क्षेत्र में सक्रिय रहने के कारण उन्होंने अपना एक अलग जनाधार तैयार किया। अब यह चुनाव यह भी बताएगा कि किसी क्षेत्र में व्यक्तिगत नेतृत्व कितना प्रभाव छोड़ता है। क्या मतदाता उस राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाना चाहेंगे? या वे किसी नए विकल्प की ओर आकर्षित होंगे? इन प्रश्नों का उत्तर चुनाव परिणाम के साथ स्पष्ट होगा।


बांकीपुर उपचुनाव में सबसे अधिक असमंजस यदि किसी पक्ष में दिखाई देता है तो वह विपक्ष है। उसके सामने कई विकल्प हैं- क्या वह पूरी ताकत से चुनाव लड़े? क्या वह प्रशांत किशोर को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाए? क्या भाजपा विरोधी वोटों का विभाजन रोका जाए? या फिर त्रिकोणीय मुकाबले में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखी जाए? यही दुविधा विपक्ष की रणनीति को जटिल बना रही है।


भारतीय चुनावों का अनुभव बताता है कि जब किसी क्षेत्र में विपक्षी मत कई हिस्सों में बंट जाते हैं, तो अक्सर संगठित दल को लाभ मिलता है। यदि भाजपा, जन सुराज और विपक्ष अलग-अलग लड़ते हैं, तो परिणाम पूरी तरह स्थानीय समीकरणों पर निर्भर करेगा। लेकिन यदि किसी प्रकार का अप्रत्यक्ष समझौता होता है, तो मुकाबला और रोचक हो सकता है। हालांकि अभी तक ऐसी कोई स्पष्ट तस्वीर सामने नहीं आई है।


बिहार की राजनीति लंबे समय तक जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। हाल के वर्षों में विकास, रोजगार, शिक्षा और बुनियादी सुविधाएँ भी प्रमुख मुद्दे बनकर उभरे हैं। बांकीपुर जैसे शहरी क्षेत्र में यह परिवर्तन और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। यहाँ मतदाता सड़क, ट्रैफिक, जलनिकासी, पार्किंग, स्वच्छता, बिजली, इंटरनेट और रोजगार जैसे मुद्दों पर भी मतदान करता है। इसलिए इस चुनाव में केवल जातीय गणित पर्याप्त नहीं होगा।


बिहार की आबादी का बड़ा हिस्सा युवा है। यह वर्ग पहले की तुलना में अधिक शिक्षित, तकनीक से जुड़ा और सूचनाओं तक पहुँच रखने वाला है। युवा मतदाता अब केवल भावनात्मक नारों से प्रभावित नहीं होता। वह रोजगार, प्रतियोगी परीक्षाओं, उद्योग, स्टार्टअप, डिजिटल सुविधाओं और बेहतर जीवन स्तर जैसे मुद्दों पर भी सवाल पूछता है। इसी कारण सभी राजनीतिक दल अपने चुनाव अभियान में युवाओं को केंद्र में रख रहे हैं।


आज चुनावी राजनीति का बड़ा हिस्सा डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी लड़ा जा रहा है। फेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हाट्सऐप जैसे माध्यम चुनावी प्रचार का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। प्रशांत किशोर की टीम डिजिटल अभियान चलाने में अनुभवी मानी जाती है। दूसरी ओर भाजपा का आईटी नेटवर्क भी लंबे समय से सक्रिय और संगठित रहा है। इसलिए यह चुनाव डिजिटल प्रचार की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


चुनाव केवल रैलियों से नहीं जीते जाते हैं। अंतिम सफलता बूथ स्तर के संगठन पर निर्भर करती है। मतदाता को मतदान केंद्र तक पहुँचाना, कार्यकर्ताओं का समन्वय, स्थानीय संपर्क और मतदान दिवस की रणनीति, ये सभी कारक परिणाम को प्रभावित करते हैं। यही कारण है कि अनुभवी राजनीतिक दल इस स्तर पर विशेष ध्यान देते हैं। नई पार्टियों के लिए यही सबसे कठिन चुनौती होती है।


बिहार की राजनीति अब एक संक्रमण काल से गुजर रही है। पुराने राजनीतिक समीकरण पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं, लेकिन नए मुद्दे लगातार उभर रहे हैं। शिक्षा, पलायन, निवेश, रोजगार, स्वास्थ्य और शहरी विकास अब चुनावी विमर्श का हिस्सा बन चुके हैं। यदि कोई राजनीतिक दल इन मुद्दों पर जनता का विश्वास जीतने में सफल होता है, तो आने वाले वर्षों में बिहार की राजनीति की दिशा बदल सकती है।



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