लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसका संवाद है। संसद उसकी आत्मा है और सड़क उसकी आवाज। संसद में जनादेश बोलता है तो सड़क पर जनभावनाएँ। किंतु जब दोनों ही स्थान संवाद के बजाय टकराव, हठ और राजनीतिक प्रदर्शन का अखाड़ा बन जाएँ, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है।
दिल्ली और पटना में जो दृश्य देखने को मिले, वे किसी एक घटना की प्रतिक्रिया मात्र नहीं हैं। वे उस राजनीतिक संस्कृति का प्रतिबिंब हैं, जहाँ जनहित पीछे छूट गया है और राजनीतिक स्वार्थ आगे निकल आया है। यदि यही प्रवृत्ति जारी रही तो यह केवल दो शहरों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को प्रभावित करेगी।
आज ऐसा प्रतीत होता है मानो लोकतंत्र की अर्थी निकाली जा रही हो और उसे चार कंधे मिले हो। पहला कंधा सत्ता पक्ष का है, जो हर आलोचना को राजनीतिक षड्यंत्र मानकर आत्ममंथन से बचना चाहता है। दूसरा कंधा विपक्ष का है, जो हर संकट में समाधान से अधिक सत्ता परिवर्तन का अवसर तलाशता दिखाई देता है। तीसरा कंधा उन स्वयंभू समाजसेवियों और आंदोलनों का है, जो जनभावनाओं को दिशा देने के बजाय उन्हें अपने-अपने स्वार्थ और प्रचार का माध्यम बना लेते हैं। चौथा कंधा उस युवा वर्ग का है, जिसकी पीड़ा सबसे वास्तविक है, लेकिन जो बार-बार राजनीतिक प्रयोगों का सबसे आसान साधन बना दिया जाता है।
नीट परीक्षा में कथित प्रश्नपत्र लीक का मामला निश्चित रूप से गंभीर है। लाखों विद्यार्थियों की मेहनत, अभिभावकों का विश्वास और देश की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता दाँव पर लगी है। दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए और व्यवस्था में व्यापक सुधार भी आवश्यक हैं। लेकिन क्या यही पहली बार हुआ है? क्या इससे पहले देश में कभी परीक्षा घोटाले नहीं हुए? यदि हुए हैं तो तब राजनीतिक संवेदनशीलता कहाँ थी? और यदि आज इतनी संवेदनशीलता दिखाई जा रही है तो क्या उसका केंद्र वास्तव में छात्र हैं या राजनीतिक लाभ?
लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व सरकार से जवाब माँगना है, लेकिन केवल हंगामा करना नहीं। उसी प्रकार सरकार का दायित्व आलोचना को शत्रुता मानने के बजाय उसे सुधार का अवसर समझना है। दुर्भाग्य यह है कि आज दोनों पक्ष अपनी-अपनी राजनीतिक प्रतिष्ठा बचाने में इतने व्यस्त हैं कि युवाओं की चिंता पीछे छूटती जा रही है।
सबसे अधिक पीड़ादायक स्थिति तब बनती है जब युवाओं के आक्रोश को दिशा देने के नाम पर कुछ संगठन और समूह अपनी-अपनी वैचारिक या आर्थिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने लगते हैं। जिन छात्रों का भविष्य संकट में है, वही सबसे अधिक भीड़, प्रदर्शन और नारेबाजी का हिस्सा बना दिए जाते हैं। उनके हाथों में समाधान नहीं, बल्कि संघर्ष का झंडा थमा दिया जाता है।
लोकतंत्र किसी की हार या जीत का नाम नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है विश्वास, जवाबदेही, पारदर्शिता और संवाद। यदि संसद ठप हो, सड़क उग्र हो, संस्थाओं पर अविश्वास बढ़े और हर समस्या का समाधान केवल राजनीतिक टकराव में खोजा जाए, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
आज आवश्यकता किसी एक मंत्री के इस्तीफे या किसी एक दल की राजनीतिक विजय से कहीं अधिक व्यापक है। आवश्यकता है ऐसी परीक्षा प्रणाली की, जिस पर विद्यार्थी आँख बंद करके विश्वास कर सके, ऐसी राजनीति की, जिसमें सत्ता और विपक्ष दोनों राष्ट्रहित को दलहित से ऊपर रखें और ऐसे समाज की, जो युवाओं को राजनीतिक मोहरा नहीं, बल्कि राष्ट्र की सबसे बड़ी पूँजी माने।
लोकतंत्र की अर्थी अभी पूरी तरह नहीं उठी है। उसमें अभी भी प्राण है। किंतु यदि सत्ता अहंकार में, विपक्ष अवसरवाद में, स्वयंसेवी संगठन स्वार्थ में और युवा निराशा में डूबते रहे, तो इतिहास यह अवश्य लिखेगा कि लोकतंत्र को सबसे बड़ा खतरा उसके शत्रुओं से नहीं, बल्कि उसके तथाकथित संरक्षकों से मिला था।
समय का सबसे बड़ा प्रश्न आज भी वही है “लोकतंत्र को बचाने के लिए कंधा कौन देगा, और उसे उठाने वाला कौन होगा?”
