राजगीर के 'सप्तऋषि कुंड' पर संकट, निकल रही है पतली धार

Jitendra Kumar Sinha
0



बिहार के ऐतिहासिक और आध्यात्मिक गौरव का प्रतीक माने जाने वाले राजगीर के गर्मजल कुंड इस समय अपने अस्तित्व के सबसे गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। सदियों से निरंतर बहने वाले ये प्राकृतिक जलस्रोत, जो देश-विदेश के पर्यटकों और श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र रहे हैं, अब धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गए हैं।


राजगीर की पहचान माने जाने वाले कई प्रमुख कुंड अब सिर्फ इतिहास के पन्नों तक सिमट कर रह गए हैं। गंगा-यमुना, अनंत ऋषि, व्यास, मारकण्डेय ऋषि और गोदावरी जैसे अत्यंत पवित्र माने जाने वाले कुंडों के जलस्रोत पहले ही पूरी तरह सूख चुके हैं। अब इसी संकट की जद में यहां का सबसे प्रसिद्ध 'सप्तऋषि कुंड' भी आ गया है, जो अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ रहा है।


इस कुंड के अंतर्गत आने वाले भारद्वाज मुनि, गौतम मुनि और जमदग्नि मुनि के झरनों से पानी की धार इतनी पतली हो गई है कि स्थानीय लोग और यहां आने वाले श्रद्धालु इसकी तुलना 'आरओ (RO) वॉटर फिल्टर' से गिरने वाले पानी की पतली धार से कर रहे हैं।


भूगर्भ शास्त्रियों और स्थानीय जानकारों के अनुसार, इस संकट के पीछे कई बड़े कारण जिम्मेदार हैं। अंधाधुंध जल दोहन- राजगीर और उसके आसपास के इलाकों में तेजी से हुए शहरीकरण और होटलों के निर्माण के कारण भूजल (Groundwater) का अत्यधिक दोहन हुआ है।


पहाड़ियों से छेड़छाड़- जलस्रोतों के प्राकृतिक रास्तों (Aquifers) में अवरोध पैदा होना या पहाड़ों के जलग्रहण क्षेत्रों में निर्माण कार्य होना।


जलवायु परिवर्तन-  कम बारिश और लगातार गिरते वाटर लेवल के कारण इन प्राकृतिक झरनों को रिचार्ज होने का मौका नहीं मिल पा रहा है।


धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, राजगीर के इन कुंडों में स्नान करने से न सिर्फ पुण्य मिलता है, बल्कि इनके औषधीय गुणों (सल्फर की मौजूदगी) के कारण चर्म रोग भी ठीक होते हैं। हर तीन साल पर लगने वाले ऐतिहासिक 'मलमास मेले' में देश भर से लाखों श्रद्धालु यहां केवल इन कुंडों में पवित्र स्नान के लिए आते हैं।


अगर प्रशासन और पर्यावरणविदों द्वारा जल्द ही इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, तो राजगीर का यह अनमोल प्राकृतिक और सांस्कृतिक इतिहास हमेशा के लिए समाप्त हो जाएगा।



एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top