बिहार सरकार ने सेवानिवृत्त सरकारी कर्मियों के हित में एक महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। अब यदि कोई सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी किसी न्यायालय या अन्य सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अभियोजन पक्ष की ओर से गवाही देने के लिए उपस्थित होता है, तो उसे यात्रा भत्ता (टीए) और भोजन शुल्क (डेली अलाउंस) उसके अंतिम वेतनमान एवं वेतन स्तर के अनुसार निर्धारित अथवा पुनरीक्षित दर से प्रदान किया जाएगा।
इस संबंध में वित्त विभाग की सचिव (व्यय) रचना पाटिल ने विभिन्न विभागों एवं कार्यालयों द्वारा मांगे गए स्पष्टीकरण के बाद स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं।सरकारी सेवाओं से सेवानिवृत्त होने के बाद कई कर्मचारियों को अपने कार्यकाल से जुड़े मामलों में न्यायालय या जांच एजेंसियों के समक्ष गवाही देने के लिए बुलाया जाता है। ऐसे मामलों में यह प्रश्न अक्सर उठता था कि उन्हें यात्रा व्यय और अन्य भत्तों का भुगतान किस आधार पर किया जाए। विभिन्न विभागों में अलग-अलग तरीके अपनाए जाने के कारण भ्रम की स्थिति बनी रहती थी। अब वित्त विभाग के स्पष्ट निर्देशों से यह असमंजस समाप्त हो गया है और सभी विभागों को एक समान व्यवस्था का पालन करना होगा।
जारी निर्देश के अनुसार सेवानिवृत्त सरकारी कर्मचारी को यात्रा भत्ता तथा भोजन शुल्क उसी वेतन स्तर के अनुरूप मिलेगा, जिस वेतनमान पर वह सेवा से सेवानिवृत्त हुआ था। यदि संबंधित भत्तों की दरों में सरकार द्वारा बाद में संशोधन किया गया है, तो भुगतान पुनरीक्षित दरों के अनुसार किया जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि सेवानिवृत्त कर्मचारियों को वर्तमान नियमों के अनुरूप उचित भुगतान प्राप्त हो और उन्हें आर्थिक नुकसान न उठाना पड़े।
सरकारी सेवा के दौरान लिए गए निर्णयों, प्रशासनिक कार्यों या जांच से जुड़े मामलों में कई बार वर्षों बाद भी न्यायालय में गवाही की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे मामलों में कर्मचारी भले ही सेवानिवृत्त हो चुका हो, लेकिन उसका अनुभव और तथ्यात्मक जानकारी न्यायिक प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण होती है। इसलिए गवाही देना केवल कानूनी औपचारिकता नहीं, बल्कि सार्वजनिक दायित्व का भी हिस्सा माना जाता है। सरकार का यह निर्णय इस दायित्व के निर्वहन में होने वाले खर्च की भरपाई सुनिश्चित करता है।
वित्त विभाग ने स्पष्ट कर दिया है कि सभी विभाग, कार्यालय और अधीनस्थ संस्थान इस व्यवस्था का समान रूप से पालन करेंगे। यदि किसी सेवानिवृत्त कर्मचारी को अभियोजन की ओर से गवाही देने के लिए बुलाया जाता है, तो उसके यात्रा भत्ता और भोजन शुल्क के भुगतान में अनावश्यक देरी या अलग-अलग व्याख्या नहीं की जाएगी। इससे भुगतान प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और सरल बनेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय सेवानिवृत्त कर्मचारियों के सम्मान और अधिकारों की रक्षा करने वाला कदम है। कई बार दूर-दराज़ के न्यायालयों में उपस्थित होने के लिए उन्हें अपने खर्च पर यात्रा करनी पड़ती थी, जिससे आर्थिक बोझ बढ़ता था। अब निर्धारित नियमों के तहत मिलने वाला यात्रा भत्ता और भोजन शुल्क इस बोझ को कम करेगा। इससे कर्मचारी बिना किसी आर्थिक चिंता के न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग कर सकेंगे।
गवाहों की समय पर उपस्थिति किसी भी मुकदमे के निष्पक्ष और शीघ्र निस्तारण के लिए अत्यंत आवश्यक होती है। जब सेवानिवृत्त कर्मचारियों को उनके वैधानिक खर्च का उचित भुगतान मिलेगा, तो उनके लिए न्यायालय में उपस्थित होना अधिक सुविधाजनक होगा। इससे मुकदमों में अनावश्यक विलंब की संभावना भी कम होगी और न्यायिक प्रक्रिया अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ सकेगी।
वित्त विभाग का यह निर्णय केवल भत्तों के भुगतान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक पारदर्शिता और एकरूपता स्थापित करने का भी प्रयास है। स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी होने से विभागों के बीच अलग-अलग व्याख्या की संभावना समाप्त होगी और भुगतान संबंधी विवादों में कमी आएगी। यह व्यवस्था सेवानिवृत्त कर्मचारियों के प्रति सरकार की सकारात्मक सोच और उत्तरदायित्व को भी दर्शाती है।
सेवानिवृत्ति के बाद भी सरकारी कर्मचारी कई मामलों में न्यायिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण सहयोगी बने रहते हैं। ऐसे में उन्हें गवाही देने के दौरान होने वाले यात्रा और भोजन संबंधी खर्च की उचित प्रतिपूर्ति मिलना स्वाभाविक और न्यायसंगत है। बिहार सरकार के वित्त विभाग द्वारा जारी नए दिशा-निर्देश न केवल सेवानिवृत्त कर्मचारियों को आर्थिक राहत प्रदान करेंगे, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को भी अधिक प्रभावी और व्यवस्थित बनाने में सहायक सिद्ध होंगे। यह निर्णय प्रशासनिक स्पष्टता, कर्मचारी सम्मान और न्यायिक सहयोग, तीनों दृष्टियों से एक सकारात्मक पहल माना जा रहा है।
