मध्यप्रदेश विधानसभा में यूसीसी विधेयक हुआ पारित

Jitendra Kumar Sinha
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मध्यप्रदेश विधानसभा ने समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड-यूसीसी) विधेयक को पारित कर राज्य की विधायी प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ दिया है। मंगलवार को सदन में इस विधेयक पर लंबी चर्चा हुई, जिसके दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक, हंगामा और नारेबाजी भी देखने को मिली। विपक्ष की ओर से कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने विधेयक में संशोधन का प्रस्ताव रखा, लेकिन सदन ने उसे अस्वीकार कर दिया। इसके बाद सरकार ने बहुमत के आधार पर विधेयक को पारित करा लिया। यह निर्णय केवल मध्यप्रदेश की राजनीति ही नहीं, बल्कि पूरे देश में समान नागरिक संहिता को लेकर चल रही बहस को भी नई दिशा देने वाला माना जा रहा है।


समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, गोद लेने, भरण-पोषण और पारिवारिक संपत्ति जैसे नागरिक मामलों में सभी नागरिकों के लिए एक समान कानून लागू करना है। वर्तमान में भारत में विभिन्न धार्मिक समुदायों के लिए अलग-अलग व्यक्तिगत (पर्सनल) कानून लागू है। संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 44 में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करने की सलाह दी गई है। हालांकि यह अनुच्छेद न्यायालय द्वारा बाध्यकारी नहीं है, बल्कि शासन के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में माना जाता है।


विधेयक पर चर्चा के दौरान सत्ता पक्ष ने इसे संविधान की भावना के अनुरूप बताते हुए कहा कि सभी नागरिकों को समान अधिकार और समान कानूनी व्यवस्था मिलनी चाहिए। सरकार का तर्क था कि अलग-अलग व्यक्तिगत कानूनों के कारण कई बार महिलाओं और कमजोर वर्गों के अधिकार प्रभावित होते हैं। एक समान कानून से न्याय व्यवस्था अधिक पारदर्शी और समान बनेगी। वहीं विपक्ष ने इस विधेयक पर कई सवाल उठाए। कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद ने संशोधन प्रस्ताव प्रस्तुत करते हुए कहा कि इस विषय पर व्यापक सामाजिक संवाद और विभिन्न समुदायों से परामर्श आवश्यक है। उनका संशोधन प्रस्ताव सदन में बहुमत नहीं जुटा सका और खारिज कर दिया गया। चर्चा के दौरान दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस हुई, जिससे सदन का माहौल कई बार गर्म हो गया। नारेबाजी और हंगामे के बावजूद कार्यवाही जारी रही और अंततः विधेयक पारित कर दिया गया।


राज्य सरकार का कहना है कि समान नागरिक संहिता महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सरकार के अनुसार विवाह, तलाक और उत्तराधिकार जैसे मामलों में समान कानून लागू होने से महिलाओं को अधिक कानूनी सुरक्षा और समान अवसर प्राप्त होंगे। सरकार का यह भी दावा है कि यह कानून धार्मिक आधार पर भेदभाव को समाप्त कर नागरिकों के बीच समानता की भावना को मजबूत करेगा।


समान नागरिक संहिता लंबे समय से राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय रही है। विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों, विधि विशेषज्ञों और धार्मिक प्रतिनिधियों के बीच इस मुद्दे पर अलग-अलग मत हैं। समर्थकों का मानना है कि यह संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को मजबूत करेगा, जबकि विरोध करने वाले पक्ष का कहना है कि व्यक्तिगत कानून धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े होते हैं, इसलिए किसी भी परिवर्तन से पहले व्यापक सहमति आवश्यक है। मध्यप्रदेश विधानसभा में विधेयक पारित होने के बाद देश के अन्य राज्यों में भी इस विषय पर चर्चा तेज होने की संभावना है।


विधानसभा से विधेयक पारित होने के बाद अब इसे संवैधानिक प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ाया जाएगा। आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने और अधिसूचना जारी होने के बाद ही इसके विभिन्न प्रावधान प्रभावी होंगे। इसके साथ ही सरकार को नियमावली तैयार करने तथा संबंधित प्रशासनिक व्यवस्थाएं विकसित करने की प्रक्रिया भी पूरी करनी होगी।


मध्यप्रदेश विधानसभा द्वारा समान नागरिक संहिता विधेयक पारित किया जाना राज्य की विधायी और राजनीतिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण घटना है। यह निर्णय समानता, न्याय और नागरिक अधिकारों से जुड़े व्यापक विमर्श को आगे बढ़ाने वाला माना जा रहा है। वहीं दूसरी ओर, इस विषय पर विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण भी सामने आ रहे हैं, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक विशेषता है। आने वाले समय में इस कानून के क्रियान्वयन, उसकी प्रभावशीलता और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव पर देशभर की निगाहें बनी रहेगी।



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