पानी और जमीन दोनों की दुनिया में जीवित रहने वाली मछली है - “अफ्रीकन लंगफिश”

Jitendra Kumar Sinha
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प्रकृति में अनेक ऐसे जीव हैं, जिनकी विशेषताएँ वैज्ञानिकों और प्रकृति प्रेमियों को समान रूप से आश्चर्यचकित करती हैं। अफ्रीका की नदियों, झीलों और दलदली क्षेत्रों में पाई जाने वाली अफ्रीकन लंगफिश ऐसी ही एक अद्भुत मछली है। यह सामान्य मछलियों की तरह केवल गलफड़ों से ही नहीं, बल्कि फेफड़ों की सहायता से भी सांस ले सकती है। यही कारण है कि पानी समाप्त होने पर भी यह लंबे समय तक जीवित रहने में सक्षम रहती है। इसकी यह अनूठी क्षमता इसे पृथ्वी के सबसे असाधारण जीवों में स्थान दिलाती है।


अफ्रीकन लंगफिश (African Lungfish) अफ्रीका के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों की मीठे पानी की मछली है। यह मुख्य रूप से नाइजीरिया, सूडान, केन्या, तंजानिया, युगांडा, कांगो और दक्षिणी अफ्रीका के कई देशों की नदियों और दलदली क्षेत्रों में पाई जाती है। यह मछली करोड़ों वर्षों से पृथ्वी पर मौजूद है। वैज्ञानिक इसे "जीवित जीवाश्म" (Living Fossil) भी कहते हैं, क्योंकि इसकी संरचना और जीवनशैली प्राचीन काल के जीवों से काफी मिलती-जुलती है। माना जाता है कि यह उन जीवों में से है, जिनके अध्ययन से यह समझने में मदद मिलती है कि जल में रहने वाले जीव धीरे-धीरे भूमि पर रहने वाले जीवों में कैसे विकसित हुए।


अधिकांश मछलियां केवल गलफड़ों के माध्यम से पानी में घुली ऑक्सीजन ग्रहण करती हैं। लेकिन अफ्रीकन लंगफिश के शरीर में विकसित फेफड़े भी होते हैं। जब पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है या तालाब सूखने लगता है, तब यह पानी की सतह पर आकर हवा में मौजूद ऑक्सीजन को अपने फेफड़ों के माध्यम से ग्रहण करती है। इस कारण यह ऐसे वातावरण में भी जीवित रह सकती है, जहां सामान्य मछलियां कुछ ही समय में मर जाती हैं। यही विशेषता इसे अन्य मछलियों से पूरी तरह अलग बनाती है।


अफ्रीकन लंगफिश की सबसे अनोखी विशेषता उसकी एस्टिवेशन (Aestivation) अर्थात ग्रीष्म-निद्रा की क्षमता है। जब सूखे के कारण जलाशय पूरी तरह सूखने लगते हैं, तब यह मछली अपने मजबूत शरीर की सहायता से मिट्टी में गहराई तक बिल बना लेती है। इसके बाद अपने शरीर से विशेष प्रकार का बलगम (म्यूकस) निकालकर अपने चारों ओर एक सुरक्षात्मक खोल बना लेती है। इस अवस्था में इसका शरीर अत्यंत धीमी गति से कार्य करता है। हृदय की धड़कन, ऊर्जा की खपत और चयापचय (मेटाबॉलिज्म) काफी कम हो जाता है। यह अपने शरीर में संचित ऊर्जा का उपयोग करके महीनों, बल्कि कुछ परिस्थितियों में कई वर्षों तक जीवित रह सकती है। जैसे ही वर्षा होती है और जलाशय फिर भर जाते हैं, यह सुरक्षात्मक खोल टूट जाता है और लंगफिश सामान्य जीवन में लौट आती है।


अफ्रीकन लंगफिश सर्वाहारी (Omnivorous) होती है। इसका भोजन परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है। यह छोटी मछलियां, घोंघे, केंचुए, कीट, झींगे, जलीय जीव, मेंढक तथा कभी-कभी पौधों के भाग भी खाती है। इसका शरीर लंबा और सांप जैसा दिखाई देता है, जबकि इसके पंख पतले और धागे जैसे होते हैं, जिनकी सहायता से यह पानी के भीतर धीरे-धीरे आगे बढ़ती है। यह सामान्यतः शांत स्वभाव की होती है, लेकिन भोजन की तलाश में सक्रिय रहती है।


अफ्रीकन लंगफिश विकासवाद (Evolution) के अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि करोड़ों वर्ष पहले जल से भूमि पर आने वाले कशेरुकी जीवों के विकास को समझने में इस मछली का अध्ययन उपयोगी साबित होता है। इसके फेफड़ों की संरचना, सांस लेने की प्रणाली और एस्टिवेशन के दौरान शरीर में होने वाले जैविक परिवर्तन चिकित्सा विज्ञान और जैव प्रौद्योगिकी के लिए भी महत्वपूर्ण शोध का विषय हैं। वैज्ञानिक यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि लंबे समय तक निष्क्रिय रहने की इसकी क्षमता भविष्य में मानव चिकित्सा, अंग संरक्षण और अंतरिक्ष यात्राओं में किस प्रकार उपयोगी हो सकती है।


अफ्रीकन लंगफिश अपने पारिस्थितिकी तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह छोटे जलीय जीवों की संख्या को नियंत्रित रखती है और स्वयं भी बड़े पक्षियों, मगरमच्छों तथा अन्य शिकारी जीवों का भोजन बनती है। हालांकि वर्तमान में इसकी कुछ प्रजातियों पर अत्यधिक शिकार, जल प्रदूषण, दलदली क्षेत्रों के नष्ट होने और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए इसके प्राकृतिक आवासों का संरक्षण आवश्यक माना जा रहा है।


अफ्रीकन लंगफिश प्रकृति की अद्भुत अनुकूलन क्षमता का शानदार उदाहरण है। गलफड़ों और फेफड़ों दोनों से सांस लेने की क्षमता, सूखे के दौरान मिट्टी में सुरक्षित होकर महीनों या वर्षों तक जीवित रहने की कला तथा वर्षा होने पर पुनः सक्रिय हो जाना इसे दुनिया की सबसे अनोखी मछलियों में शामिल करता है। यह केवल एक जलीय जीव नहीं, बल्कि पृथ्वी पर जीवन के विकास, पर्यावरणीय अनुकूलन और जैव विविधता की असाधारण कहानी का जीवंत प्रतीक है। इसका संरक्षण न केवल एक दुर्लभ प्रजाति की रक्षा करेगा, बल्कि भविष्य के वैज्ञानिक अनुसंधानों के लिए भी अमूल्य अवसर प्रदान करेगा।


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