देश में समय-समय पर ऐसे शब्द और अवधारणाएं चर्चा में आती हैं, जो समाज के भीतर चल रही किसी बड़ी बहस की ओर संकेत करती हैं। “दिमागी नक्सली” भी ऐसा ही एक विवादास्पद और तीखा शब्द है। इसका इस्तेमाल आम तौर पर उन लोगों के लिए किया जाता है, जिन पर हिंसक उग्रवाद, अराजकता या राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों को प्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दिए बिना वैचारिक स्तर पर युवाओं को भ्रमित करने, व्यवस्था के प्रति अंधी नफरत पैदा करने या हिंसा को उचित ठहराने का आरोप लगाया जाता है। लेकिन इस विषय पर चर्चा करते समय एक बुनियादी सावधानी जरूरी है असहमति, सरकार की आलोचना, वैचारिक मतभेद और नक्सली या हिंसक उग्रवाद एक ही चीज नहीं हैं। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना नागरिक अधिकार है। इसलिए किसी व्यक्ति या समूह को केवल उसके राजनीतिक विचारों के कारण “दिमागी नक्सली” कहना उचित नहीं होगा। असल चुनौती उन विचारों और प्रचार-तंत्रों से है, जो युवाओं को लोकतांत्रिक बहस से निकालकर हिंसा, घृणा, विध्वंस और अराजकता की ओर धकेलते हैं।
भारत दुनिया के सबसे युवा देशों में शामिल है। देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। युवा ऊर्जा यदि शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, उद्यमिता, कृषि, उद्योग, खेल और सामाजिक सेवा में लगे तो वही ऊर्जा देश को नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। इसके विपरीत यदि युवाओं के भीतर लगातार यह भावना भरी जाए कि व्यवस्था में कोई सुधार संभव नहीं है, लोकतांत्रिक संस्थाएं बेकार हैं और परिवर्तन का एकमात्र रास्ता हिंसा या विध्वंस है, तो यह मानसिकता व्यक्ति और समाज दोनों के लिए नुकसानदेह हो सकती है।
युवा मन स्वभावतः प्रश्न करता है। वह अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना चाहता है और बदलाव की आकांक्षा रखता है। यही उसकी ताकत है। लेकिन इसी ऊर्जा को यदि तथ्यहीन प्रचार, आधी-अधूरी जानकारी और कट्टर वैचारिक प्रभाव दिशा देने लगे, तो रचनात्मक असंतोष विनाशकारी क्रोध में बदल सकता है। इसलिए सवाल युवाओं को चुप कराने का नहीं है, बल्कि उनके सवालों को सही दिशा देने का है।
आज विचारों का प्रसार केवल किताबों, अखबारों और सार्वजनिक सभाओं तक सीमित नहीं है। मोबाइल फोन के माध्यम से कोई भी संदेश कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। सोशल मीडिया ने लोकतांत्रिक संवाद को व्यापक बनाया है, लेकिन इसके साथ गलत सूचना, भ्रामक वीडियो, फर्जी उद्धरण, संपादित तस्वीरें और भावनात्मक प्रचार की चुनौती भी बढ़ी है। किसी घटना का दस सेकंड का वीडियो देखकर पूरा निष्कर्ष निकाल लेना, किसी वायरल पोस्ट को बिना सत्यापन के सच मान लेना या किसी समुदाय के प्रति नफरत फैलाने वाली सामग्री को लगातार देखना व्यक्ति की सोच को प्रभावित कर सकता है। इसलिए आज के युवा के लिए डिजिटल साक्षरता भी उतनी ही जरूरी है जितनी पारंपरिक शिक्षा। उसे यह सीखना होगा कि हर वायरल संदेश सच नहीं होता है और हर तीखा भाषण तथ्यपरक नहीं होता है।
यदि किसी समाज में कोई विध्वंसकारी विचार फैल रहा है, तो उसका मुकाबला केवल प्रतिबंध या दमन से नहीं किया जा सकता है। उसके सामने बेहतर विचार, बेहतर शिक्षा और बेहतर अवसर रखने होंगे। युवाओं को यह समझाना होगा कि गरीबी, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता या प्रशासनिक कमियों का समाधान लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करके नहीं, बल्कि उन्हें मजबूत करके किया जा सकता है। संसद, विधानसभाएं, न्यायपालिका, मीडिया, विश्वविद्यालय, स्थानीय निकाय और नागरिक समाज, ये सभी लोकतांत्रिक परिवर्तन के रास्ते हैं। यदि व्यवस्था में कमी है तो उसके खिलाफ आवाज उठाइए। यदि नीति गलत है तो उसका विरोध कीजिए। यदि प्रशासनिक लापरवाही है तो जवाब मांगिए। लेकिन हिंसा और विध्वंस को परिवर्तन का साधन मानना अंततः उसी समाज को कमजोर करता है, जिसके सुधार की बात की जाती है।
राष्ट्र-निर्माण की चर्चा में यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि देशभक्ति का अर्थ सरकार की हर नीति का समर्थन करना नहीं है। देश नागरिकों से बनता है, और नागरिकों को अपनी सरकार से सवाल पूछने का अधिकार है। लोकतंत्र में असहमति कोई अपराध नहीं है, बल्कि स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा है। एक जिम्मेदार नागरिक वह है जो देश से प्रेम करते हुए उसकी कमियों पर भी सवाल उठाता है और सुधार का रास्ता सुझाता है। इसलिए युवाओं को दो अतियों से बचाना होगा, एक ओर अंध-समर्थन और दूसरी ओर अंध-विरोध। देश को अंधभक्ति नहीं, जागरूक नागरिक चाहिए।
भारत ने लंबे समय तक वामपंथी उग्रवाद और नक्सली हिंसा की चुनौती का सामना किया है। कई क्षेत्रों में हिंसा ने आम नागरिकों, सुरक्षाबलों और विकास कार्यों को प्रभावित किया है। हिंसक उग्रवाद का स्पष्ट विरोध होना चाहिए। लोकतांत्रिक व्यवस्था में हथियार उठाकर नागरिकों या सुरक्षा बलों पर हमला करने को राजनीतिक असहमति का सामान्य रूप नहीं माना जा सकता है। लेकिन इसी के साथ वैचारिक बहस को भी हिंसक उग्रवाद के बराबर नहीं रखा जाना चाहिए। किसी विश्वविद्यालय के छात्र का किसी आर्थिक नीति से असहमत होना, किसी लेखक का सरकार की आलोचना करना या किसी नागरिक का सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना अपने आप में नक्सली गतिविधि नहीं है। यही अंतर लोकतांत्रिक समाज को बनाए रखता है।
भारत आज विज्ञान, डिजिटल तकनीक, अंतरिक्ष, स्टार्टअप, विनिर्माण, बुनियादी ढांचे और शिक्षा के क्षेत्र में बड़े परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में युवाओं के सामने अवसरों का एक विशाल संसार है। उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि देश बदलने के लिए केवल नारों की जरूरत नहीं है, बल्कि कौशल और मेहनत की जरूरत है। एक युवा वैज्ञानिक नई तकनीक विकसित करके राष्ट्र की सेवा कर सकता है। एक डॉक्टर दूरदराज के क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचा सकता है। एक शिक्षक हजारों बच्चों का भविष्य बदल सकता है। एक उद्यमी रोजगार पैदा कर सकता है। एक पत्रकार सत्ता से सवाल पूछ सकता है। एक किसान आधुनिक तकनीक से उत्पादन बढ़ा सकता है। एक इंजीनियर बेहतर सड़क, पुल और ऊर्जा व्यवस्था बना सकता है। यानि राष्ट्र-निर्माण के रास्ते अनगिनत हैं।
युवाओं को केवल उपदेश देकर भटकाव से नहीं बचाया जा सकता है। उनकी वास्तविक समस्याओं को भी समझना होगा। बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं की अनिश्चितता, शिक्षा की गुणवत्ता, आर्थिक असमानता, अवसरों की कमी और सामाजिक भेदभाव जैसी समस्याएं युवा मन में निराशा पैदा कर सकती हैं। निराश युवा आसानी से ऐसे विचारों के प्रभाव में आ सकता है, जो उसकी व्यक्तिगत पीड़ा को किसी व्यापक व्यवस्था के खिलाफ क्रोध में बदल देते हैं। इसलिए राष्ट्र-निर्माण की रणनीति में रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल विकास, मानसिक मजबूती, खेल और उद्यमिता को प्रमुख स्थान देना होगा। जिस युवा के हाथ में अवसर होगा, उसे विध्वंस का रास्ता आकर्षित करने की संभावना कम होगी।
युवा केवल सोशल मीडिया से प्रभावित नहीं होते हैं। परिवार, मित्र, शिक्षक और समाज भी उनके विचारों को आकार देते हैं। परिवारों को बच्चों से संवाद करना होगा। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि “यह मत देखो” या “उससे बात मत करो।” इसके बजाय उन्हें यह समझाना होगा कि कोई विचार सही या गलत क्यों है। स्कूल और कॉलेजों में संविधान, लोकतंत्र, नागरिक अधिकार, कर्तव्य, इतिहास और मीडिया साक्षरता को व्यवहारिक तरीके से पढ़ाना जरूरी है। युवाओं को बहस करने दीजिए। प्रश्न पूछने दीजिए। असहमति व्यक्त करने दीजिए। लेकिन साथ ही उन्हें तथ्य जांचने, तर्क करने और दूसरे दृष्टिकोण को समझने की क्षमता भी दीजिए।
किसी भी प्रकार के चरमपंथ का स्थायी समाधान मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं और न्यायपूर्ण विकास है। जहां नागरिकों को अपनी बात रखने का मंच मिलता है, जहां न्याय की उम्मीद रहती है और जहां विकास के अवसर उपलब्ध होते हैं, वहां हिंसक विचारधाराओं के लिए जगह कम होती है। इसलिए “दिमागी नक्सली” जैसे शब्दों की बहस को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित करने के बजाय हमें व्यापक सवाल पूछना चाहिए कि क्या हमारे युवाओं को पर्याप्त अवसर मिल रहे हैं? क्या वे सोशल मीडिया की सूचनाओं की सत्यता जांचना जानते हैं? क्या उन्हें संविधान और लोकतंत्र की समझ है? क्या उनके पास अपनी शिकायत व्यक्त करने के शांतिपूर्ण रास्ते हैं? क्या शिक्षा उन्हें केवल नौकरी के लिए तैयार कर रही है या जिम्मेदार नागरिक भी बना रही है? इन प्रश्नों के उत्तर भविष्य की दिशा तय करेंगे।
एक परिपक्व लोकतंत्र की पहचान यही है कि वह हिंसा और असहमति के बीच स्पष्ट अंतर कर सके। हिंसा, आतंक, हथियारबंद विद्रोह और निर्दोष नागरिकों को निशाना बनाने वाली गतिविधियों के खिलाफ कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई आवश्यक है। लेकिन सरकार की आलोचना, वैचारिक मतभेद, शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सामाजिक प्रश्न उठाने को उसी नजर से देखना लोकतंत्र को कमजोर कर सकता है। इसलिए भाषा और आरोपों में भी जिम्मेदारी आवश्यक है। किसी व्यक्ति को “दिमागी नक्सली” कह देना आसान है; लेकिन यह साबित करना कि वह वास्तव में हिंसक उग्रवाद को बढ़ावा दे रहा है, एक गंभीर दावा है। ऐसे मामलों में तथ्य, कानून और प्रमाण सर्वोपरि होने चाहिए।
भारत के युवाओं को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं है कि उन्हें किन रास्तों से बचना है। उन्हें यह भी बताना होगा कि उन्हें किस दिशा में जाना है। उन्हें ऐसा भारत दिखाई देना चाहिए जहां मेहनत का सम्मान हो, प्रतिभा को अवसर मिले, कानून सबके लिए समान हो, भ्रष्टाचार कम हो, शिक्षा बेहतर हो, रोजगार बढ़े और सामाजिक सद्भाव मजबूत हो। जब युवा अपने भविष्य को लेकर आश्वस्त होता है, तब वह विनाश की विचारधारा से दूर रहता है। राष्ट्र-निर्माण कोई सरकारी कार्यक्रम मात्र नहीं है। यह करोड़ों नागरिकों की सामूहिक जिम्मेदारी है।
“दिमागी नक्सलियों” पर हो रही चर्चा का सबसे बड़ा अर्थ यही होना चाहिए कि समाज अपने युवाओं के वैचारिक भविष्य को लेकर गंभीर है। यदि कहीं हिंसा, अराजकता या विध्वंस को वैचारिक समर्थन देने वाली प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं, तो उनका तथ्य और कानून के आधार पर मुकाबला होना चाहिए। लेकिन इस लड़ाई को व्यापक राजनीतिक लेबलिंग में बदलना समाधान नहीं है। युवाओं को डराकर नहीं, समझाकर जोड़ा जा सकता है। उन्हें चुप कराकर नहीं, संवाद के जरिए मजबूत किया जा सकता है। उन्हें केवल विरोध से नहीं, सकारात्मक विकल्प देकर आगे बढ़ाया जा सकता है।
भारत का युवा केवल देश का भविष्य नहीं है, वर्तमान की सबसे बड़ी शक्ति भी है। उसकी ऊर्जा यदि ज्ञान, विज्ञान, उद्यम, रोजगार, सामाजिक सेवा और लोकतांत्रिक भागीदारी में लगेगी तो भारत की विकास यात्रा और तेज होगी। इसलिए आज आवश्यकता ऐसे वातावरण की है जिसमें युवा हर विचार को तर्क की कसौटी पर परखें, हर सूचना की सत्यता जांचें, हिंसा और घृणा को अस्वीकार करें, लेकिन लोकतांत्रिक असहमति के अधिकार को भी मजबूती से समझें। राष्ट्र-निर्माण का रास्ता बंदूक, भय और विध्वंस से नहीं, बल्कि संविधान, शिक्षा, संवाद, रोजगार, विज्ञान, परिश्रम और सामाजिक सद्भाव से होकर गुजरता है। यही वह दिशा है जिसमें देश के युवाओं को आगे बढ़ाना होगा, ताकि उनकी मुट्ठी में पत्थर नहीं, ज्ञान और कौशल हो, उनके मन में घृणा नहीं, राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी हो और उनकी आंखों में विध्वंस का सपना नहीं, एक विकसित, शांतिपूर्ण और मजबूत भारत का सपना हो।

