देश का 80वां स्वतंत्रता दिवस इस बार कई मायनों में ऐतिहासिक बन गया। नई दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मौजूदगी में पहली बार ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंदों का सामूहिक गायन हुआ। राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर आयोजित इस विशेष कार्यक्रम ने स्वतंत्रता दिवस समारोह को एक अलग ही गरिमा और भावनात्मक ऊंचाई प्रदान की। लाल किले की प्राचीर पर राष्ट्रीय ध्वज के साथ ‘वंदे मातरम्’ की भव्य सजावट की गई थी। फूलों से तैयार इस विशेष सज्जा के केंद्र में तिरंगा और उसके दोनों ओर हिन्दी में ‘वंदे मातरम्’ लिखा गया था। पूरा वातावरण देशभक्ति और राष्ट्रभावना से ओतप्रोत नजर आया।
इस बार समारोह की सबसे खास बात यह रही कि ‘वंदे मातरम्’ के केवल लोकप्रिय शुरुआती अंश का गायन नहीं हुआ, बल्कि इसके सभी छह छंदों को प्रस्तुत किया गया। इसके बाद राष्ट्रगान का गायन हुआ। राष्ट्रीय गीत के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर यह आयोजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना गया। ‘वंदे मातरम्’ भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान देशवासियों में राष्ट्रीय चेतना जगाने वाले प्रमुख गीतों में रहा है। स्वतंत्रता संग्राम के दौर में इस गीत ने लोगों के भीतर मातृभूमि के प्रति समर्पण और स्वाधीनता की भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
समारोह में शामिल होने वाले अतिथियों के लिए जारी कार्यक्रम पुस्तिकाओं में भी इस आयोजन की विशेषता स्पष्ट दिखाई दी। पुस्तिकाओं में समारोह का विस्तृत विवरण देने के साथ-साथ ‘वंदे मातरम्’ के सभी छह छंदों को शामिल किया गया था। इस पहल का उद्देश्य राष्ट्रीय गीत के संपूर्ण स्वरूप से लोगों को परिचित कराना और इसके ऐतिहासिक महत्व को सामने लाना रहा। इससे समारोह केवल एक औपचारिक सरकारी कार्यक्रम न रहकर राष्ट्रीय स्मृति और सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा विशेष अवसर बन गया।
स्वतंत्रता दिवस समारोह में आकाश से हुई पुष्पवर्षा ने भी दृश्य को बेहद आकर्षक बना दिया। ध्वजारोहण के बाद दो एमआई-17 हेलीकॉप्टरों ने समारोह स्थल पर फूलों की वर्षा की। इनमें से एक हेलीकॉप्टर राष्ट्रीय ध्वज लेकर उड़ान भर रहा था, जबकि दूसरे पर ‘वंदे मातरम्’ अंकित ध्वज दिखाई दिया। आसमान में तिरंगे और ‘वंदे मातरम्’ के ध्वज के साथ हुई पुष्पवर्षा ने लाल किले के ऐतिहासिक परिसर में देशभक्ति का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किया।
‘वंदे मातरम्’ केवल एक गीत नहीं है, बल्कि भारतीय राष्ट्रीय चेतना के इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय है। इसके शब्दों में मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, सम्मान और समर्पण की भावना दिखाई देती है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष कर रहे भारतीयों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना। समय के साथ ‘वंदे मातरम्’ भारतीय लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक जीवन में भी अपनी विशिष्ट पहचान कायम करता रहा। स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर इसके सभी छंदों का गायन इसी ऐतिहासिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रयास माना जा सकता है।
लाल किला भारतीय स्वतंत्रता की स्मृतियों से गहराई से जुड़ा हुआ है। हर वर्ष यहां से प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन देश की दिशा और भविष्य की प्राथमिकताओं का संदेश देता है। ऐसे में इसी ऐतिहासिक स्थल पर ‘वंदे मातरम्’ के सभी छंदों का गायन इस वर्ष के समारोह को और यादगार बना गया। तिरंगे की शान, राष्ट्रगान की गरिमा, ‘वंदे मातरम्’ की गूंज और आसमान से बरसते फूलों ने मिलकर स्वतंत्रता दिवस समारोह को भावनात्मक और ऐतिहासिक स्वरूप दिया। यह आयोजन केवल आजादी का उत्सव नहीं था, बल्कि उन मूल्यों और भावनाओं को याद करने का अवसर भी था, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष को शक्ति प्रदान की। इस तरह लाल किले से गूंजा ‘वंदे मातरम्’ देश की स्वतंत्रता यात्रा, सांस्कृतिक विरासत और राष्ट्रीय एकता की भावना का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आया।

