कर्नाटक में वंदे मातरम् पर फैसला - कांग्रेस के विचारधारा पर रहेंगे कायम

Jitendra Kumar Sinha
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वंदे मातरम् के गायन को लेकर देश में जारी राजनीतिक और वैचारिक बहस के बीच कर्नाटक ने भी अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बुधवार को कहा कि राज्य के सरकारी कार्यक्रमों में अब राष्ट्रगीत वंदे मातरम् के शुरुआती दो छंद ही गाये जायेंगे। उन्होंने साफ कहा कि वह कांग्रेस की विचारधारा में विश्वास रखते हैं और इस फैसले पर कायम रहेंगे। यह बयान ऐसे समय आया है, जब वंदे मातरम् के पूर्ण गायन और उसके चयनित छंदों को लेकर राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। कर्नाटक सरकार का फैसला इस बहस को और व्यापक बना सकता है।


डीके शिवकुमार ने कहा कि सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के शुरुआती दो छंदों को ही गाने की व्यवस्था लागू की जाएगी। उनका कहना है कि इस विषय पर उनका रुख स्पष्ट है और वह कांग्रेस की विचारधारा के अनुरूप निर्णय पर कायम रहेंगे। मुख्यमंत्री का यह बयान केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि राजनीतिक दृष्टिकोण की अभिव्यक्ति के रूप में भी देखा जा रहा है। कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है और पार्टी नेतृत्व द्वारा लिए गए निर्णयों के अनुरूप राज्य के सरकारी आयोजनों में भी इसका असर दिखाई देगा।


कांग्रेस कार्यसमिति ने 19 अगस्त को वंदे मातरम् के गायन को लेकर महत्वपूर्ण फैसला किया था। पार्टी ने तय किया था कि कांग्रेस के सभी कार्यक्रमों में वंदे मातरम् के छह छंदों में से शुरुआती दो छंद ही गाये जाएंगे। कांग्रेस के इस निर्णय के बाद पार्टी के विभिन्न नेताओं की ओर से इसकी व्याख्या सामने आई। कर्नाटक के मुख्यमंत्री का बयान इसी निर्णय के अनुरूप माना जा रहा है। इससे यह संकेत भी मिलता है कि पार्टी का केंद्रीय फैसला राज्यों में आयोजित उसके कार्यक्रमों और उससे जुड़े सरकारी आयोजनों की राजनीति को प्रभावित कर रहा है।


वंदे मातरम् भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ गीत है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की रचना ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोगों में राष्ट्रीय चेतना और देशभक्ति की भावना को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। समय के साथ वंदे मातरम् देश की राष्ट्रीय भावना का एक महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया। इसके शुरुआती छंदों का सार्वजनिक कार्यक्रमों में गायन लंबे समय से होता रहा है। इसलिए इसके गायन के स्वरूप को लेकर होने वाली बहस स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और सामाजिक चर्चा का विषय बन जाती है।


वंदे मातरम् के छह छंदों में से केवल शुरुआती दो छंद गाने का निर्णय एक तरफ जहां कांग्रेस की वर्तमान राजनीतिक रणनीति और विचारधारा से जोड़ा जा रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके आलोचक सवाल उठा सकते हैं कि राष्ट्रीय महत्व की रचना को सीमित रूप में क्यों प्रस्तुत किया जाए। इसके समर्थकों का तर्क हो सकता है कि सार्वजनिक और सरकारी कार्यक्रमों के लिए पहले से प्रचलित और व्यापक रूप से स्वीकार्य अंशों को ही रखा जाना अधिक उपयुक्त है। दूसरी ओर, पूर्ण रचना के समर्थक इसे साहित्यिक और ऐतिहासिक विरासत के व्यापक सम्मान से जोड़ते हैं।


डीके शिवकुमार का बयान इस मामले में इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि उन्होंने इसे व्यक्तिगत पसंद के बजाय कांग्रेस की विचारधारा से जोड़कर देखा है। उनका यह कहना कि वह फैसले पर कायम रहेंगे, बताता है कि पार्टी के निर्णय को लेकर कर्नाटक सरकार फिलहाल किसी बदलाव के मूड में नहीं है। यह मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक मंचों पर भी चर्चा का विषय बन सकता है। भाजपा और कांग्रेस के बीच राष्ट्रीय प्रतीकों, राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक विरासत को लेकर पहले से ही राजनीतिक मतभेद रहे हैं। ऐसे में वंदे मातरम् के गायन का स्वरूप भी व्यापक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनना तय माना जा सकता है।


कर्नाटक में सरकारी कार्यक्रमों के दौरान वंदे मातरम् के केवल शुरुआती दो छंद गाने का फैसला भले ही देखने में सीमित प्रशासनिक निर्णय लगे, लेकिन इसके राजनीतिक और सांस्कृतिक मायने व्यापक हैं। एक ओर कांग्रेस इसे अपनी विचारधारा और संगठनात्मक निर्णय के अनुरूप कदम बता रही है, तो दूसरी ओर इस फैसले को लेकर राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान का प्रश्न उठ सकता है। फिलहाल मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कांग्रेस की विचारधारा में विश्वास जताते हुए फैसले पर कायम रहने की बात कही है। ऐसे में कर्नाटक में वंदे मातरम् के गायन का यह निर्णय आने वाले दिनों में केवल सरकारी कार्यक्रमों तक सीमित न रहकर राजनीतिक बहस का महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकता है।


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