भारतीय समाज में विवाह को सदियों से सबसे पवित्र और स्थायी सामाजिक संस्था माना गया है। विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का भी संबंध माना जाता है। किंतु बदलते सामाजिक परिवेश, शहरीकरण, शिक्षा, आर्थिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती भावना के कारण लिव-इन रिलेशनशिप भी समाज में अपनी जगह बना रहे हैं। यद्यपि यह व्यवस्था अभी भी व्यापक सामाजिक स्वीकृति प्राप्त नहीं कर सकी है, फिर भी न्यायपालिका ने समय-समय पर इसे कुछ कानूनी संरक्षण प्रदान किया है।
ऐसे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि यदि विवाह में रहने वाली महिला या पुरुष मानसिक अथवा शारीरिक क्रूरता का शिकार हो सकते हैं, तो क्या लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोग इससे अछूते हैं? स्पष्ट रूप से इसका उत्तर "नहीं" है। किसी रिश्ते का नाम बदल जाने से मानव व्यवहार नहीं बदल जाता है।
क्रूरता का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा नहीं है। मानसिक उत्पीड़न, आर्थिक नियंत्रण, भावनात्मक ब्लैकमेल, अपमान, धमकी, सामाजिक अलगाव और निरंतर भय का वातावरण भी क्रूरता के ही रूप हैं। यदि दो व्यक्ति बिना विवाह के साथ रह रहे हैं और उनमें से कोई एक दूसरे के साथ ऐसा व्यवहार करता है, तो पीड़ित के लिए पीड़ा उतनी ही वास्तविक होती है जितनी किसी वैवाहिक संबंध में। इसलिए यह मान लेना कि क्रूरता केवल पति-पत्नी के बीच ही संभव है, व्यवहारिक और सामाजिक दोनों दृष्टि से सही नहीं माना जा सकता।
हर संबंध का आधार विश्वास, सम्मान और समानता होता है। यदि इनमें से कोई तत्व समाप्त हो जाए तो रिश्ता विषाक्त बन सकता है। यह समस्या केवल विवाह या लिव-इन तक सीमित नहीं है। प्रेम संबंध, मित्रता, पारिवारिक संबंध और व्यावसायिक संबंधों में भी मानसिक उत्पीड़न देखने को मिलता है यानि समस्या संबंध की संरचना नहीं, बल्कि संबंधित व्यक्ति का व्यवहार है।
सामाजिक चर्चा में अक्सर महिलाओं पर होने वाली हिंसा प्रमुखता से सामने आती है और यह उचित भी है क्योंकि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा एक गंभीर सामाजिक समस्या है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि पुरुष कभी पीड़ित नहीं हो सकते। कुछ मामलों में पुरुष भी मानसिक उत्पीड़न, झूठे आरोप, आर्थिक दबाव अथवा भावनात्मक शोषण का सामना करते हैं। इसलिए न्याय और संवेदनशीलता का दृष्टिकोण लिंग-निरपेक्ष होना चाहिए। सभी महिलाओं या सभी पुरुषों पर सामान्यीकरण उचित नहीं है।
किसी एक या कुछ घटनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना कि "सभी महिलाएँ" या "सभी पुरुष" एक जैसे होते हैं, न तो न्यायसंगत है और न ही सामाजिक रूप से उचित। हर व्यक्ति का स्वभाव, संस्कार, परिस्थितियाँ और निर्णय अलग-अलग होते हैं। कुछ लोग संबंधों का सम्मान करते हैं, जबकि कुछ लोग उनका दुरुपयोग भी कर सकते हैं। यह अंतर व्यक्ति का है, पूरे वर्ग का नहीं।
भारतीय न्यायपालिका ने कई अवसरों पर यह स्पष्ट किया है कि यदि कोई जोड़ा लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहता है, तो कुछ परिस्थितियों में ऐसे संबंधों को कानूनी मान्यता और संरक्षण मिल सकता है। घरेलू हिंसा से संबंधित कानूनों के अंतर्गत भी कुछ मामलों में लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं को संरक्षण प्रदान किया गया है।
इसका उद्देश्य किसी विशेष व्यवस्था को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि पीड़ित व्यक्ति को न्याय उपलब्ध कराना है।
मानसिक उत्पीड़न का प्रभाव कई बार शारीरिक हिंसा से भी अधिक गंभीर होता है। आत्मविश्वास में कमी, अवसाद और चिंता, सामाजिक अलगाव, आत्मसम्मान का ह्रास, कार्यक्षमता में गिरावट, पारिवारिक और सामाजिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव। इसलिए मानसिक क्रूरता को हल्के में नहीं लिया जा सकता है।
न्याय व्यवस्था का उद्देश्य किसी एक पक्ष का समर्थन करना नहीं है, बल्कि सत्य का पता लगाकर पीड़ित को न्याय देना है। यदि महिला पीड़ित है तो उसे सुरक्षा मिले। यदि पुरुष पीड़ित है तो उसकी भी शिकायत गंभीरता से सुनी जाए। यदि दोनों में से कोई भी झूठा आरोप लगाता है, तो कानून को उसके प्रति भी कठोर होना चाहिए। परिवार, मित्र और समाज को किसी भी विवाद में बिना तथ्य जाने निर्णय देने से बचना चाहिए। कई बार सामाजिक दबाव के कारण पीड़ित व्यक्ति अपनी बात कह ही नहीं पाता। समाज को व्यक्ति का पक्ष नहीं, सत्य का साथ देना चाहिए।
चाहे विवाह हो या लिव-इन, किसी भी संबंध की सफलता कुछ मूल सिद्धांतों पर निर्भर करती है। पारस्परिक सम्मान, ईमानदारी, विश्वास, संवाद, स्वतंत्रता का सम्मान, जिम्मेदारी, संवेदनशीलता, इन मूल्यों के बिना कोई भी संबंध लंबे समय तक स्वस्थ नहीं रह सकता है।
विवाह हो या लिव-इन रिलेशनशिप क्रूरता, शोषण या हिंसा किसी भी संबंध में संभव है। इसलिए यह कहना कि केवल वैवाहिक संबंधों में ही ऐसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, वास्तविकता का पूर्ण चित्र प्रस्तुत नहीं करता। साथ ही, किसी एक व्यक्ति के व्यवहार के आधार पर पूरे महिला या पुरुष वर्ग के बारे में निष्कर्ष निकालना भी उचित नहीं है। न्याय, संवेदनशीलता और सामाजिक संतुलन की मांग यही है कि प्रत्येक मामले का मूल्यांकन उसके तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर किया जाए। एक स्वस्थ समाज वही है जहाँ संबंध सम्मान पर आधारित हो, कानून निष्पक्ष हो और प्रत्येक पीड़ित, चाहे वह महिला हो या पुरुष, को समान रूप से न्याय और सुरक्षा प्राप्त हो।
भारतीय समाज में विवाह को लंबे समय से सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था माना जाता रहा है। पति-पत्नी का संबंध केवल कानूनी अनुबंध नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। वहीं पिछले कुछ दशकों में लिव-इन रिलेशनशिप भी एक सामाजिक वास्तविकता के रूप में उभरे हैं। विशेषकर महानगरों और शिक्षित युवा वर्ग में ऐसे संबंध पहले की तुलना में अधिक दिखाई देने लगे हैं। लिव-इन संबंधों के बढ़ने के साथ अनेक नए सामाजिक और कानूनी प्रश्न भी सामने आए हैं। इन्हीं में एक प्रश्न यह है कि क्या मानसिक या शारीरिक क्रूरता केवल वैवाहिक संबंधों तक सीमित है? यदि दो व्यक्ति बिना विवाह के साथ रह रहे हो, तो क्या उनमें उत्पीड़न, हिंसा, मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक नियंत्रण अथवा भावनात्मक शोषण नहीं हो सकता? इसका उत्तर स्पष्ट है कि किसी भी मानवीय संबंध में, यदि सम्मान, विश्वास और संवेदनशीलता समाप्त हो जाए, तो वहां उत्पीड़न की संभावना उत्पन्न हो सकती है। इसलिए किसी भी प्रकार की क्रूरता को केवल विवाह तक सीमित मानना वास्तविकता का संपूर्ण चित्र प्रस्तुत नहीं करता है।
अधिकांश लोग क्रूरता का अर्थ केवल मारपीट या शारीरिक हिंसा समझते हैं, जबकि आधुनिक मनोविज्ञान और न्यायशास्त्र इसकी परिभाषा कहीं अधिक व्यापक मानते हैं। क्रूरता के प्रमुख रूप हैं शारीरिक हिंसा, मानसिक प्रताड़ना, भावनात्मक नियंत्रण, आर्थिक शोषण, सामाजिक अलगाव, अपमानजनक व्यवहार, लगातार धमकी देना, निजी स्वतंत्रता पर नियंत्रण, चरित्र हनन, डिजिटल माध्यम से निगरानी और उत्पीड़न। इनमें से कोई भी व्यवहार विवाह और लिव-इन, दोनों प्रकार के संबंधों में हो सकता है। इसलिए रिश्ते की प्रकृति नहीं, व्यक्ति का चरित्र महत्वपूर्ण होता है
कोई भी संबंध अपने आप अच्छा या बुरा नहीं होता है। उसे अच्छा या बुरा बनाते हैं उसमें रहने वाले व्यक्ति। यदि कोई व्यक्ति सम्मानपूर्वक व्यवहार करता है तो विवाह भी सुखद होगा और लिव-इन भी। यदि किसी का स्वभाव नियंत्रित करने वाला, हिंसक या अपमानजनक है, तो वह किसी भी संबंध में वही व्यवहार दोहरा सकता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ अक्सर कहते हैं कि संबंध की सफलता उसके कानूनी स्वरूप से अधिक उसमें शामिल लोगों के व्यक्तित्व और व्यवहार पर निर्भर करती है।
मानसिक क्रूरता सबसे खतरनाक क्यों मानी जाती है। मानसिक हिंसा दिखाई नहीं देती, लेकिन उसके प्रभाव वर्षों तक बने रह सकते हैं। लगातार अपमानित किया जाना, हर निर्णय पर नियंत्रण रखना, मित्रों और परिवार से दूर करना, मोबाइल की निगरानी करना, झूठे आरोप लगाना, सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाना, ये सब मानसिक उत्पीड़न के रूप हैं। कई बार ऐसे पीड़ित अवसाद, चिंता, आत्मविश्वास की कमी और सामाजिक अलगाव का शिकार हो जाते हैं। लिव-इन संबंधों में रहने वाले लोगों के बीच भी वही मानवीय भावनाएँ होती हैं जो विवाह में होती हैं। अपेक्षाएँ, अधिकार की भावना, ईर्ष्या, असुरक्षा, आर्थिक मतभेद, भविष्य की चिंता, परिवार का दबाव, इन्हीं कारणों से विवाद उत्पन्न हो सकते हैं।
भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों में महिलाओं के विरुद्ध हिंसा एक गंभीर सामाजिक समस्या है और इस पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि पुरुष कभी पीड़ित नहीं होते। कुछ मामलों में पुरुष भी मानसिक प्रताड़ना, आर्थिक दबाव, झूठे आरोप अथवा भावनात्मक शोषण का सामना करते हैं। इसी प्रकार कुछ मामलों में महिलाएँ भी गंभीर हिंसा और नियंत्रण का शिकार होती हैं। इसलिए न्याय का आधार व्यक्ति का लिंग नहीं, बल्कि उपलब्ध तथ्य और प्रमाण होने चाहिए। किसी एक घटना के आधार पर यह कहना कि सभी महिलाएँ या सभी पुरुष एक जैसे होते हैं, सामाजिक दृष्टि से उचित नहीं है। हर व्यक्ति अलग होता है। कुछ लोग अत्यंत संवेदनशील और जिम्मेदार होते हैं। कुछ लोग स्वार्थी या हिंसक भी हो सकते हैं। यह अंतर व्यक्ति का है, पूरे वर्ग का नहीं। इसी कारण किसी भी सामाजिक विमर्श में संतुलित भाषा का प्रयोग आवश्यक माना जाता है।
कानून किसी विशेष वर्ग का पक्ष लेने के लिए नहीं बनाए जाते हैं। उनका उद्देश्य पीड़ित की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करना होता है। यदि किसी मामले में महिला पीड़ित है तो उसे संरक्षण मिलना चाहिए। यदि किसी मामले में पुरुष पीड़ित है, तो उसकी शिकायत भी निष्पक्ष रूप से सुनी जानी चाहिए। यदि कोई झूठा आरोप लगाता है, तो कानून को उसके विरुद्ध भी उचित कार्रवाई करनी चाहिए। आज समाज पहले की तुलना में अधिक खुला हुआ है। युवाओं के बीच व्यक्तिगत स्वतंत्रता का महत्व बढ़ा है। इसके साथ जिम्मेदारियाँ भी बढ़ी हैं। किसी भी संबंध में प्रवेश करने से पहले दोनों पक्षों को अपने अधिकारों और जिम्मेदारियों की स्पष्ट समझ होनी चाहिए। किसी भी स्वस्थ संबंध के लिए कुछ मूल सिद्धांत आवश्यक हैं- पारस्परिक सम्मान, विश्वास, खुला संवाद, पारदर्शिता, समानता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता का सम्मान, विवादों का शांतिपूर्ण समाधान, यदि ये तत्व मौजूद हो तो अधिकांश समस्याओं से बचा जा सकता है।
विवाह हो या लिव-इन रिलेशनशिप, दोनों में शामिल व्यक्ति सबसे महत्वपूर्ण होते हैं। किसी भी प्रकार की क्रूरता, हिंसा या उत्पीड़न को केवल वैवाहिक संबंधों तक सीमित मानना उचित नहीं है। दूसरी ओर, किसी एक या कुछ घटनाओं के आधार पर पूरे महिला या पुरुष वर्ग के बारे में निष्कर्ष निकालना भी न्यायसंगत नहीं है। एक परिपक्व समाज वही है जो प्रत्येक मामले को उसके तथ्यों के आधार पर देखे, पीड़ित को निष्पक्ष न्याय दे और संबंधों में सम्मान, समानता तथा जिम्मेदारी की संस्कृति को बढ़ावा दे। यही दृष्टिकोण न्याय, सामाजिक संतुलन और मानवीय गरिमा, तीनों के लिए आवश्यक है।

