इक्कीसवीं सदी में सोशल मीडिया ने दुनिया को जिस तेजी से बदला है, उसकी कल्पना कुछ दशक पहले तक करना भी मुश्किल था। आज किसी गांव में बैठा व्यक्ति कुछ सेकंड में दुनिया के किसी दूसरे कोने में मौजूद व्यक्ति तक अपनी बात पहुंचा सकता है। किसी घटना का वीडियो कुछ मिनटों में करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है। सरकारें नागरिकों से सीधे संवाद कर सकती है, कारोबारी अपने उत्पादों का प्रचार कर सकते हैं, कलाकारों को अपना मंच मिल सकता है और आम नागरिक भी अपनी आवाज लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। लेकिन यही ताकत अब एक गंभीर चुनौती का रूप भी ले रही है।
सोशल मीडिया जितना लोकतांत्रिक संवाद का माध्यम बना है, उतना ही यह गलत सूचना, अफवाह, फर्जी सामग्री, छेड़छाड़ किए गए वीडियो और अब डीपफेक जैसी तकनीकों के कारण चिंता का विषय भी बन गया है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने तस्वीर, आवाज और वीडियो को इस स्तर तक बदलना संभव बना दिया है कि वास्तविक और नकली के बीच अंतर करना आम व्यक्ति के लिए बेहद कठिन हो गया है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में यह चुनौती और गंभीर हो जाती है। यहां करोड़ों लोग सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते हैं। राजनीतिक बहस से लेकर मनोरंजन, शिक्षा, व्यापार, सामाजिक अभियान और व्यक्तिगत संवाद तक, डिजिटल प्लेटफॉर्म रोजमर्रा की जिन्दगी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं। इसी बदलते डिजिटल परिदृश्य में केंद्र सरकार ने वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनी मेटा से डीपफेक सामग्री के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा है। सरकार और कंपनी के बीच हुई बैठकों के नतीजों की समीक्षा के बाद आगे के कदमों के लिए कानूनी राय लेने की बात भी सामने आई है।
यह घटनाक्रम केवल किसी एक कंपनी या किसी एक तकनीक का मामला नहीं है। यह उस बड़े सवाल की ओर इशारा करता है कि डिजिटल युग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिकों की सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए?
सोशल मीडिया को केवल समस्या के रूप में देखना वास्तविकता को अधूरा समझना होगा। इसके असंख्य सकारात्मक पक्ष हैं। फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म ने संचार की दुनिया को बदल दिया है। परिवार के सदस्य दूर रहने के बावजूद जुड़े रह सकते हैं। विद्यार्थी ऑनलाइन ज्ञान हासिल कर सकते हैं। छोटे व्यापारी बिना बड़े विज्ञापन बजट के अपने उत्पाद ग्राहकों तक पहुंचा सकते हैं। सामाजिक संगठनों को अभियान चलाने का मंच मिलता है।
किसी प्राकृतिक आपदा के समय सोशल मीडिया राहत और बचाव कार्य में भी उपयोगी साबित हो सकता है। रक्त की जरूरत, लापता व्यक्ति, आपात सहायता या स्थानीय प्रशासन की सूचना कुछ ही समय में बड़े समूह तक पहुंचाई जा सकती है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब इसी तंत्र का इस्तेमाल गलत सूचना फैलाने, लोगों को भ्रमित करने, किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा खराब करने, सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने या राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने के लिए किया जाता है। सोशल मीडिया की सबसे बड़ी विशेषता उसकी गति है और यही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकती है। एक गलत वीडियो को सत्यापित होने में कई घंटे लग सकते हैं, लेकिन उसे वायरल होने में कुछ सेकंड ही लगते हैं। यही अंतर डीपफेक के खतरे को और बड़ा बना देता है।
डीपफेक ऐसी डिजिटल सामग्री को कहा जाता है जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों की सहायता से किसी व्यक्ति के चेहरे, आवाज, हावभाव या पूरे वीडियो को इस तरह बदला जाता है कि वह देखने और सुनने में वास्तविक प्रतीत हो। कल्पना कीजिए कि किसी प्रसिद्ध व्यक्ति का चेहरा किसी दूसरे व्यक्ति के वीडियो पर लगा दिया जाए और उसकी आवाज भी उसी व्यक्ति जैसी बना दी जाए। देखने वाले को लगेगा कि वास्तव में वही व्यक्ति वह बात कह रहा है। यहीं से खतरा शुरू होता है। डीपफेक तकनीक का इस्तेमाल मनोरंजन, फिल्म निर्माण, डबिंग, शिक्षा या रचनात्मक प्रयोगों के लिए सकारात्मक रूप से भी किया जा सकता है। समस्या तकनीक के अस्तित्व में नहीं बल्कि उसके दुरुपयोग में है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित उपकरण पहले की तुलना में अधिक आसानी से उपलब्ध हैं। कुछ मामलों में सामान्य तकनीकी जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी तस्वीर या वीडियो में बदलाव कर सकता है। इससे एक ऐसी दुनिया बन रही है जहां आंखों से दिखाई देने वाली चीज भी हमेशा सच नहीं मानी जा सकती।
फर्जी खबरों का खतरा नया नहीं है। सोशल मीडिया से पहले भी अफवाहें और झूठी सूचनाएं मौजूद थी। लेकिन डीपफेक ने इस समस्या को एक नई तकनीकी शक्ति दे दी है। पहले किसी झूठे दावे के साथ एक तस्वीर या साधारण वीडियो लगाया जाता था। अब किसी व्यक्ति की ऐसी वीडियो बनाई जा सकती है जिसमें वह ऐसी बात कहता हुआ दिखाई दे जो उसने कभी कही ही नहीं। यानि झूठ को सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि दृश्य प्रमाण जैसा दिखने वाला रूप दिया जा सकता है। यही बात डीपफेक को पारंपरिक फर्जी खबरों से अधिक खतरनाक बनाती है। किसी व्यक्ति को यदि बताया जाए कि एक बयान फर्जी है तो वह जांच कर सकता है। लेकिन जब उसके सामने उस व्यक्ति का चेहरा, आवाज और होंठों की गति सहित पूरा वीडियो हो, तो उसे संदेह करना कठिन हो सकता है। डिजिटल युग में यह मनोवैज्ञानिक प्रभाव बेहद महत्वपूर्ण है।
भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में शामिल है। यहां इंटरनेट और स्मार्टफोन की पहुंच लगातार बढ़ी है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल महानगरों तक सीमित नहीं है। छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में भी लोग डिजिटल प्लेटफॉर्म का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करते हैं। यह डिजिटल विस्तार एक बड़ी उपलब्धि है। लेकिन इसके साथ डिजिटल साक्षरता की चुनौती भी मौजूद है। हर व्यक्ति यह नहीं जानता कि किसी वीडियो की सत्यता कैसे जांची जाए। हर उपयोगकर्ता यह समझने में सक्षम नहीं होता है कि किसी तस्वीर में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल हुआ है या नहीं। यही कारण है कि फर्जी सामग्री तेजी से लोगों के विश्वास को प्रभावित कर सकती है। भारत में भाषाई विविधता भी एक अतिरिक्त चुनौती है। हिन्दी, अंग्रेजी और प्रमुख भारतीय भाषाओं के अलावा अनेक क्षेत्रीय भाषाओं में सामग्री तैयार की जाती है। यदि डीपफेक सामग्री क्षेत्रीय भाषा में बनाई जाए और उसी सामाजिक संदर्भ को ध्यान में रखकर प्रसारित की जाए, तो उसका प्रभाव काफी व्यापक हो सकता है।
सोशल मीडिया पर फर्जी सामग्री का प्रभाव केवल व्यक्तिगत स्तर तक सीमित नहीं रहता है। यदि किसी चुनाव के दौरान किसी प्रमुख राजनीतिक नेता का फर्जी वीडियो वायरल हो जाए तो उसके राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं। यदि किसी उम्मीदवार के बारे में गलत वीडियो बड़े पैमाने पर फैल जाए तो मतदाताओं की धारणा प्रभावित हो सकती है। लोकतंत्र में चुनाव का आधार मतदाता का स्वतंत्र और सूचित निर्णय है। यदि मतदाता को जानबूझकर झूठी सामग्री दिखाकर भ्रमित किया जाता है तो यह केवल एक व्यक्ति के साथ धोखा नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास भी हो सकता है। इसीलिए डीपफेक का प्रश्न धीरे-धीरे राष्ट्रीय सुरक्षा, चुनावी पारदर्शिता और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता से जुड़ता जा रहा है।
मेटा दुनिया की प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों में से एक है और उसके प्लेटफॉर्म पर बड़ी संख्या में भारतीय उपयोगकर्ता मौजूद हैं। भारत सरकार का मेटा से डीपफेक के खिलाफ कार्रवाई करने को कहना इस बात का संकेत है कि सरकार केवल उपयोगकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराकर समस्या का समाधान नहीं देख रही है। सरकार प्लेटफॉर्म कंपनियों की जिम्मेदारी पर भी जोर दे रही है। यह सवाल स्वाभाविक है कि यदि किसी प्लेटफॉर्म पर बड़े पैमाने पर फर्जी सामग्री फैल रही है तो उस प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए? क्या कंपनी को ऐसी सामग्री पहचानने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित प्रणाली विकसित करनी चाहिए? क्या संदिग्ध सामग्री को तेजी से हटाने की व्यवस्था होनी चाहिए? क्या उपयोगकर्ताओं को चेतावनी दी जानी चाहिए? क्या किसी डीपफेक वीडियो पर स्पष्ट लेबल होना चाहिए? क्या चुनावी समय में विशेष निगरानी की जरूरत है? इन सवालों का उत्तर आसान नहीं है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का कहना होता है कि वे उपयोगकर्ताओं को अभिव्यक्ति का मंच प्रदान करते हैं। दूसरी तरफ सरकारों की जिम्मेदारी नागरिकों की सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था सुनिश्चित करना है। इन दोनों के बीच संतुलन बनाना मुश्किल है। यदि सरकार प्लेटफॉर्म से बहुत अधिक सामग्री हटाने को कहती है तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठ सकते हैं। यदि सरकार बिल्कुल हस्तक्षेप नहीं करती तो गलत सूचना और डीपफेक के प्रसार से नागरिकों को नुकसान हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि कार्रवाई के लिए स्पष्ट, पारदर्शी और कानूनी प्रक्रिया हो। किस सामग्री को हटाया जाएगा? किस आधार पर उसे डीपफेक माना जाएगा? कौन इसकी जांच करेगा? उपयोगकर्ता को अपील का अधिकार मिलेगा या नहीं? इन सवालों की स्पष्ट व्यवस्था लोकतांत्रिक डिजिटल शासन के लिए आवश्यक है।
सरकार द्वारा बैठकों के नतीजों की समीक्षा के बाद आगे की कार्रवाई को लेकर कानूनी राय लेने की बात इस विषय की संवेदनशीलता को दर्शाती है। किसी डिजिटल सामग्री को हटाने का आदेश केवल तकनीकी निर्णय नहीं है। इसके साथ नागरिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता, प्रतिष्ठा और कानूनी दायित्व जुड़े होते हैं। इसलिए किसी व्यापक कार्रवाई से पहले कानूनी स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है। भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म के संचालन को लेकर नियामकीय ढांचा पहले से विकसित हो रहा है। लेकिन कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डीपफेक की तकनीक इतनी तेजी से बदल रही है कि कानूनों और तकनीकी वास्तविकता के बीच अंतर पैदा होना स्वाभाविक है। आज जो तकनीक नई है, संभव है कुछ वर्षों बाद वह सामान्य बन जाए। इसलिए कानून को केवल वर्तमान तकनीक के आधार पर नहीं बल्कि भविष्य की संभावनाओं को ध्यान में रखकर तैयार करना होगा।
डीपफेक के खिलाफ कार्रवाई की मांग के बीच सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का है। लोकतंत्र में सरकार की आलोचना करने, किसी नीति पर सवाल उठाने या किसी राजनीतिक विचार का समर्थन करने का अधिकार नागरिकों को होना चाहिए। लेकिन किसी व्यक्ति की नकली वीडियो बनाकर उसे वास्तविक बताना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर आसानी से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। यहां फर्क करना जरूरी है। रचनात्मक व्यंग्य, पैरोडी, फिल्मी प्रयोग और जानबूझकर धोखा देने वाला डीपफेक एक ही चीज नहीं हैं। यदि कोई व्यक्ति किसी नेता का व्यंग्यात्मक वीडियो बनाता है और साफ तौर पर बताता है कि यह पैरोडी है, तो उसकी प्रकृति अलग है। लेकिन यदि वही वीडियो इस तरह फैलाया जाए कि लोग उसे वास्तविक बयान समझें, तो समस्या पैदा होती है। इसलिए नियमन को तकनीक के साथ-साथ इरादे और संदर्भ को भी समझना होगा।
डीपफेक का एक बड़ा खतरा व्यक्तिगत निजता से जुड़ा है। किसी व्यक्ति की तस्वीर या वीडियो को उसकी अनुमति के बिना किसी अन्य संदर्भ में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान हो सकता है। महिलाओं और सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के मामले में यह जोखिम और गंभीर हो सकता है। किसी व्यक्ति का चेहरा किसी आपत्तिजनक सामग्री में जोड़कर उसे सोशल मीडिया पर फैलाना डिजिटल उत्पीड़न का गंभीर रूप बन सकता है। यहां तकनीक केवल झूठ नहीं पैदा करती, बल्कि किसी व्यक्ति की सामाजिक और व्यक्तिगत जिंदगी को सीधे प्रभावित कर सकती है।
इस समस्या को केवल राजनीति या सामाजिक विवाद तक सीमित देखना सही नहीं होगा। डीपफेक का इस्तेमाल वित्तीय धोखाधड़ी के लिए भी किया जा सकता है। किसी कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी की नकली आवाज या वीडियो बनाकर कर्मचारियों को निर्देश दिया जा सकता है। किसी कारोबारी की फर्जी घोषणा बाजार में भ्रम पैदा कर सकती है। निवेशकों को गलत जानकारी देकर आर्थिक नुकसान पहुंचाया जा सकता है। ब्रांड की छवि खराब की जा सकती है। किसी कंपनी के प्रमुख के नाम से फर्जी बयान जारी कर बाजार में अस्थिरता पैदा की जा सकती है। इसलिए आने वाले समय में डीपफेक साइबर सुरक्षा का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।
राजनीतिक संचार में सोशल मीडिया की भूमिका लगातार बढ़ रही है। नेताओं के भाषण, रैलियां, बयान और छोटी-छोटी वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर तेजी से फैलती हैं। राजनीतिक दल अपने समर्थकों तक पहुंचने के लिए डिजिटल माध्यम का इस्तेमाल करते हैं। ऐसे माहौल में डीपफेक किसी नेता के बयान को बदलकर उसकी राजनीतिक छवि प्रभावित कर सकता है। मान लीजिए किसी नेता ने किसी मुद्दे पर एक बात कही, लेकिन डीपफेक के जरिए उसका वीडियो बदलकर बिल्कुल विपरीत बात दिखा दी गई। वीडियो वायरल हो गया। विवाद शुरू हो गया। बाद में यह साबित हो गया कि वीडियो नकली था। लेकिन तब तक राजनीतिक नुकसान हो चुका होगा। यही सोशल मीडिया की सबसे बड़ी समस्या है, सुधार अक्सर झूठ से धीमी गति से चलता है।
सोशल मीडिया की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा ध्यान यानि अटेंशन पर आधारित है। जिस सामग्री को ज्यादा लोग देखते हैं, साझा करते हैं, टिप्पणी करते हैं या उस पर प्रतिक्रिया देते हैं, उसे अधिक दृश्यता मिल सकती है। इस कारण सनसनीखेज सामग्री को बढ़त मिल सकती है। डीपफेक भी इसी वातावरण का फायदा उठा सकता है। एक सामान्य वीडियो शायद कुछ हजार लोगों तक पहुंचे, लेकिन किसी बड़े नेता, अभिनेता या प्रसिद्ध व्यक्ति का सनसनीखेज नकली वीडियो लाखों लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकता है। इसलिए समस्या केवल यह नहीं है कि डीपफेक बनाया जा सकता है। समस्या यह भी है कि वायरल होने वाली डिजिटल अर्थव्यवस्था नकली सामग्री को अतिरिक्त गति दे सकती है।
खुले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामग्री की निगरानी किसी हद तक संभव हो सकती है। लेकिन मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर स्थिति अलग है। किसी संदेश को निजी चैट, समूह और फिर दूसरे समूहों में भेजा जा सकता है। एक फर्जी वीडियो मूल स्रोत से दूर जाकर पूरी तरह अलग संदर्भ में पहुंच सकता है। उपयोगकर्ता को यह पता भी नहीं रहता कि वीडियो पहली बार कहां से आया था। यही कारण है कि डिजिटल साक्षरता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि उपयोगकर्ता हर वीडियो को तुरंत सच न माने और साझा करने से पहले उसकी पुष्टि करे तो फर्जी सामग्री की पहुंच काफी कम की जा सकती है। दिलचस्प बात यह है कि जिस कृत्रिम बुद्धिमत्ता तकनीक से डीपफेक तैयार किया जा सकता है, उसी तकनीक का इस्तेमाल उसे पहचानने के लिए भी किया जा सकता है। एआई आधारित सिस्टम वीडियो के फ्रेम, चेहरे की गतिविधि, आवाज की तरंग, होंठों की गति और अन्य डिजिटल संकेतों का विश्लेषण कर संदिग्ध सामग्री पहचानने का प्रयास कर सकते हैं। लेकिन यह भी कोई पूर्ण समाधान नहीं है। डीपफेक बनाने वाली तकनीक लगातार बेहतर हो रही है। पहचानने वाली तकनीक को भी लगातार विकसित करना पड़ता है। यह एक प्रकार की तकनीकी दौड़ है। एक तरफ नकली सामग्री बनाने वाले उपकरण बेहतर होते जाएंगे, दूसरी तरफ उन्हें पहचानने वाले उपकरणों को भी बेहतर होना होगा।
यह समझना भी जरूरी है कि एआई से बनी हर सामग्री गलत या खतरनाक नहीं होती है। आज विज्ञापन, फिल्म, शिक्षा, डिजाइन, अनुवाद और मनोरंजन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल हो रहा है। एआई की सहायता से किसी ऐतिहासिक घटना का दृश्यात्मक पुनर्निर्माण किया जा सकता है। किसी पुराने भाषण को नई भाषा में प्रस्तुत किया जा सकता है। फिल्मों में विशेष प्रभाव पैदा किए जा सकते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब उपयोगकर्ता को यह नहीं बताया जाता कि सामग्री कृत्रिम रूप से तैयार की गई है और उसे वास्तविक घटना के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसलिए भविष्य में एआई सामग्री की पहचान और लेबलिंग महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। विशेषज्ञ स्तर पर एक समाधान डिजिटल वॉटरमार्किंग और कंटेंट प्रोवेनेंस से जुड़ा है। यदि किसी एआई आधारित उपकरण से बनाई गई सामग्री में तकनीकी स्तर पर यह जानकारी दर्ज हो कि सामग्री कृत्रिम रूप से तैयार की गई है, तो प्लेटफॉर्म उसे पहचानने में अधिक सक्षम हो सकते हैं। यह व्यवस्था पूर्ण समाधान नहीं है, क्योंकि डिजिटल सामग्री में बाद में बदलाव किया जा सकता है। फिर भी यह डिजिटल पारदर्शिता की दिशा में उपयोगी कदम हो सकता है। भविष्य में संभव है कि कैमरा, मोबाइल और एआई उपकरणों से तैयार सामग्री के साथ उसके स्रोत और निर्माण प्रक्रिया की जानकारी भी जुड़ी हो।
मेटा जैसी बड़ी कंपनियों के पास विशाल तकनीकी संसाधन हैं। उनके पास करोड़ों-अरबों पोस्ट, फोटो और वीडियो को संसाधित करने की क्षमता है। लेकिन इतने बड़े पैमाने पर सामग्री की निगरानी भी आसान नहीं है। हर सामग्री की मानवीय जांच करना संभव नहीं है। इसलिए कंपनियों को एआई आधारित मॉडरेशन, विशेषज्ञ टीम, स्थानीय भाषा विशेषज्ञ और शिकायत निवारण प्रणाली को मजबूत करना होगा। भारत जैसे देश में केवल अंग्रेजी भाषा पर आधारित मॉडरेशन पर्याप्त नहीं हो सकता है। भारतीय भाषाओं और स्थानीय सामाजिक संदर्भों को समझने वाली प्रणालियों की जरूरत होगी।
भारत में इंटरनेट उपयोगकर्ता केवल अंग्रेजी में सामग्री नहीं देखते हैं। हिन्दी, भोजपुरी, मैथिली, बंगाली, तमिल, तेलुगु, मराठी, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, पंजाबी और अन्य भाषाओं में विशाल डिजिटल समुदाय मौजूद हैं। यदि डीपफेक की पहचान करने वाली प्रणाली किसी भाषा की बारीकियों को नहीं समझती तो गलत सामग्री की पहचान कठिन हो सकती है। विशेषकर आवाज आधारित डीपफेक में भाषा और उच्चारण महत्वपूर्ण हैं। किसी व्यक्ति की आवाज की नकल यदि उसकी स्थानीय बोली में की जाए तो आम उपयोगकर्ता के लिए उसे पहचानना और भी कठिन हो सकता है।
इसलिए भारत में डिजिटल सुरक्षा का अर्थ बहुभाषी डिजिटल सुरक्षा भी है। सिर्फ सरकार और कंपनियां जिम्मेदार नहीं
डीपफेक की समस्या का समाधान केवल सरकार और तकनीकी कंपनियां नहीं कर सकती।
सोशल मीडिया पर कोई वीडियो देखने के बाद तुरंत उसे साझा करना आसान है। लेकिन साझा करने से पहले कुछ सवाल पूछे जा सकते हैं, क्या वीडियो का मूल स्रोत पता है? क्या किसी विश्वसनीय समाचार माध्यम ने इसकी पुष्टि की है? क्या वीडियो का संदर्भ पूरा है? क्या आवाज और होंठों की गति स्वाभाविक लग रही है? क्या वीडियो को काट-छांटकर प्रस्तुत किया गया है? क्या यही घटना किसी आधिकारिक स्रोत पर उपलब्ध है? इन सवालों से कई फर्जी दावों को रोका जा सकता है। साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में अक्सर कहा जाता है कि तकनीकी सुरक्षा की पहली दीवार उपयोगकर्ता की जागरूकता होती है। डीपफेक के मामले में भी यही बात लागू होती है। यदि कोई व्यक्ति बिना जांचे किसी वीडियो को आगे नहीं भेजता है, तो उसका प्रसार कम हो सकता है। स्कूलों और कॉलेजों में डिजिटल साक्षरता को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जा सकता है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष जागरूकता अभियान चलाए जा सकते हैं, क्योंकि वे कई बार सोशल मीडिया पर प्राप्त संदेशों को विश्वसनीय मान लेते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में भी डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों की जरूरत है।
मुख्यधारा मीडिया के सामने भी नई चुनौती है। किसी वायरल वीडियो को समाचार के रूप में प्रसारित करने से पहले उसकी सत्यता जांचना जरूरी है। यदि मीडिया बिना सत्यापन के डीपफेक प्रसारित करता है तो नकली सामग्री को वैधता मिल सकती है। इसलिए समाचार संस्थानों को डिजिटल फोरेंसिक क्षमता बढ़ानी होगी। वीडियो का मूल स्रोत, समय, संदर्भ और डिजिटल संकेतों की जांच महत्वपूर्ण होगी। भविष्य की पत्रकारिता में केवल रिपोर्टिंग नहीं, बल्कि डिजिटल सत्यापन पत्रकारिता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। डीपफेक केवल नेताओं और अभिनेताओं को प्रभावित नहीं करता है। पत्रकार भी इसका शिकार हो सकते हैं। किसी पत्रकार की नकली वीडियो बनाकर यह दिखाया जा सकता है कि उसने कोई गलत बयान दिया है। किसी समाचार एंकर की आवाज की नकल करके फर्जी खबर प्रसारित की जा सकती है। इससे पत्रकार की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। इसलिए मीडिया संस्थानों को भी अपने नाम, आवाज और दृश्य पहचान के दुरुपयोग की निगरानी करनी होगी।
डीपफेक से जुड़े मामलों में न्यायपालिका के सामने भी कठिन सवाल आ सकते हैं। यदि कोई वीडियो प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है तो उसकी प्रामाणिकता कैसे साबित होगी? क्या डिजिटल फोरेंसिक जांच आवश्यक होगी? किस संस्था की रिपोर्ट को विश्वसनीय माना जाएगा? क्या किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाले डीपफेक के लिए अलग दंड व्यवस्था की जरूरत होगी? इन प्रश्नों पर आने वाले वर्षों में कानूनी व्यवस्था को विस्तार से विचार करना होगा। डिजिटल प्रमाण की विश्वसनीयता का संकट एक समय तस्वीर को प्रमाण माना जाता था। फिर वीडियो को अधिक विश्वसनीय प्रमाण समझा जाने लगा। लेकिन डीपफेक के बाद यह धारणा कमजोर हो सकती है। यदि वीडियो भी आसानी से बदला जा सकता है तो डिजिटल प्रमाण की जांच के लिए अतिरिक्त तकनीकी मानकों की जरूरत होगी।
इससे न्यायिक प्रक्रिया में डिजिटल फोरेंसिक विशेषज्ञों की भूमिका बढ़ सकती है।
सोशल मीडिया ने दुनिया को अभूतपूर्व रूप से जोड़ा है। इसने संचार को तेज किया, जानकारी को लोकतांत्रिक बनाया और आम नागरिक को अपनी बात कहने की ताकत दी। लेकिन उसी सोशल मीडिया की दुनिया अब गलत सूचना, डीपफेक और कृत्रिम रूप से तैयार की गई भ्रामक सामग्री की चुनौती से भी जूझ रही है। भारत के लिए यह चुनौती इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां डिजिटल प्लेटफॉर्म का विस्तार बहुत तेजी से हुआ है। करोड़ों लोग सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं और डिजिटल सामग्री का प्रभाव राजनीति, समाज, व्यापार और व्यक्तिगत जीवन तक दिखाई देता है। केंद्र सरकार का मेटा से डीपफेक के खिलाफ कार्रवाई करने को कहना इसी बढ़ती चिंता का संकेत है। सरकार और कंपनी के बीच हुई बैठकों के परिणामों की समीक्षा तथा आगे की कार्रवाई के लिए कानूनी राय लेने की बात यह बताती है कि अब डीपफेक को केवल तकनीकी समस्या मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। लेकिन समाधान केवल सामग्री हटाने में नहीं है। जरूरत है एक ऐसी समग्र व्यवस्था की जिसमें कानून स्पष्ट हो, तकनीक सक्षम हो, प्लेटफॉर्म जवाबदेह हों, मीडिया सतर्क हो और नागरिक डिजिटल रूप से जागरूक हो।

