जेल के नियम तोड़ने वाले कैदियों के लिए बदला अनुशासन का तरीका

Jitendra Kumar Sinha
0


 

बिहार की जेलों में अनुशासन बनाए रखने की व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। जेल के अंदर नियम तोड़ने वाले कैदियों को अब हथकड़ी या डंडा-बेड़ी लगाने जैसे पुराने दंड नहीं दिए जाएंगे। राज्य सरकार के नये जेल मैनुअल में शारीरिक दंड के बजाय कैदियों के अधिकारों और जेल से मिलने वाली सुविधाओं में कटौती को अनुशासनात्मक कार्रवाई का आधार बनाया गया है। इसका उद्देश्य जेलों में व्यवस्था कायम रखने के साथ-साथ कैदियों के मानवीय अधिकारों की रक्षा करना भी है।



नये प्रावधानों के अनुसार यदि कोई कैदी जेल में मारपीट, अव्यवस्था, तोड़फोड़ या अन्य अनुशासनहीन गतिविधियों में शामिल होता है, तो अपराध की गंभीरता के आधार पर उसके खिलाफ अलग-अलग दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है। इनमें कैंटीन की सुविधा बंद करना, मनोरंजन की सुविधाओं पर रोक लगाना और परिजनों से मुलाकात सीमित करना शामिल है। कैदी को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती की अवधि भी निर्धारित की गई है। कैंटीन और मनोरंजन जैसी सुविधाएं अधिकतम एक महीने तक बंद की जा सकती हैं। इसी तरह कुछ परिस्थितियों में एक महीने से अधिक अवधि तक वकील को छोड़कर अन्य आगंतुकों से मिलने पर भी रोक लगाई जा सकती है।


नये जेल मैनुअल में कैदियों के अर्जित परिहार यानी जेल की सजा में मिलने वाली छूट को लेकर भी कड़े प्रावधान किए गए हैं। अनुशासन तोड़ने वाले कैदी का तीन महीने तक का अर्जित परिहार जब्त किया जा सकता है। साथ ही अगले तीन महीने तक परिहार देने पर रोक लगाई जा सकती है। गंभीर अनुशासनहीनता की स्थिति में कैदी को एक वर्ष तक पैरोल की सुविधा से भी वंचित किया जा सकता है। इस तरह जेल के अंदर अच्छे आचरण को कैदी की सजा में मिलने वाली सुविधाओं से सीधे जोड़ दिया गया है।


जेल प्रशासन को अनुशासन भंग करने वाले कैदी को सामान्य बंदियों से अलग रखने का अधिकार भी दिया गया है। नये प्रावधानों के तहत निर्धारित परिस्थितियों में पृथक कारावास की सुविधा का इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि यह कार्रवाई भी नियमों और निर्धारित अवधि के तहत ही की जाएगी। इस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे कैदियों को दूसरे बंदियों को प्रभावित करने या जेल की सामान्य व्यवस्था में बाधा डालने से रोकना है। साथ ही शारीरिक दंड के स्थान पर नियंत्रित और नियमबद्ध अनुशासनात्मक व्यवस्था विकसित करना है।


यदि कोई कैदी बार-बार जेल अनुशासन तोड़ता है, तो मामला केवल जेल प्रशासन तक सीमित नहीं रहेगा। जेल अधीक्षक ऐसे मामलों की सूचना सक्षम न्यायिक दंडाधिकारी को देंगे। इसके बाद संबंधित मामले की सुनवाई न्यायिक स्तर पर की जा सकेगी। यदि सुनवाई के दौरान आरोप साबित हो जाता है, तो दोषी व्यक्ति के खिलाफ कानून के तहत अतिरिक्त कार्रवाई हो सकती है। इसमें तीन वर्ष तक की जेल की सजा का प्रावधान भी बताया गया है। इससे जेल के भीतर बार-बार अनुशासनहीनता करने वालों पर कानूनी शिकंजा और मजबूत होगा।


नये जेल मैनुअल में जेल अधीक्षक को कारा परिसर में अनुशासन बनाए रखने के लिए पूरी तरह जिम्मेदार बनाया गया है। इसका अर्थ है कि जेल में सुरक्षा, व्यवस्था और बंदियों के आचरण की निगरानी में अधीक्षक की भूमिका और महत्वपूर्ण होगी। जेल प्रशासन को अब यह सुनिश्चित करना होगा कि अनुशासन बनाए रखने के लिए कार्रवाई नियमों के अनुरूप हो और कैदियों के साथ अमानवीय व्यवहार की स्थिति पैदा न हो।


जेल का उद्देश्य केवल बंदियों को सजा देना नहीं, बल्कि उन्हें सुधार का अवसर देना भी माना जाता है। ऐसे में हथकड़ी और डंडा-बेड़ी जैसे शारीरिक दंड के स्थान पर सुविधाओं पर नियंत्रित रोक, परिहार की जब्ती और पैरोल पर प्रतिबंध जैसे उपायों को अपनाना जेल सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव माना जा सकता है। नये नियमों की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि अनुशासन तोड़ने पर कैदी को शारीरिक यातना देने के बजाय उसके व्यवहार से जुड़ी सुविधाओं को प्रभावित किया जाएगा। इससे एक ओर जेल की व्यवस्था मजबूत करने की कोशिश होगी, वहीं दूसरी ओर कैदियों के मानवीय गरिमा और अधिकारों को भी महत्व मिलेगा।


एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top