केरल के नाम को लेकर लंबे समय से चली आ रही चर्चा को अब नया मुकाम मिला है। लोकसभा ने केरल का आधिकारिक नाम बदलकर ‘केरलम्’ करने से संबंधित केरल (अल्टरेशन ऑफ नेम) बिल, 2026 को पारित कर दिया है। विधेयक के पारित होने के बाद संविधान की पहली अनुसूची में दर्ज राज्य के नाम में बदलाव का रास्ता साफ हो गया है। यह विधेयक केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने सदन में पेश किया।
केरल के नाम में बदलाव केवल सरकारी दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके लिए संविधान की पहली अनुसूची में संशोधन किया जाएगा। पहली अनुसूची में भारत के राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के नाम दर्ज हैं। विधेयक के कानून बनने के बाद इसमें ‘केरल’ की जगह ‘केरलम्’ दर्ज किया जाएगा। नाम में यह बदलाव संवैधानिक प्रक्रिया के तहत किया जाएगा। इसका मतलब है कि केंद्र सरकार के आधिकारिक दस्तावेजों, संवैधानिक संदर्भों और अन्य सरकारी अभिलेखों में राज्य का नया नाम इस्तेमाल किया जाएगा।
‘केरलम्’ शब्द का संबंध मलयालम भाषा और राज्य की स्थानीय भाषायी पहचान से जोड़ा जाता है। स्थानीय स्तर पर राज्य के लिए ‘केरलम्’ शब्द का इस्तेमाल पहले से ही प्रचलित है। इसलिए नाम परिवर्तन को राज्य की भाषायी और सांस्कृतिक पहचान से जोड़कर देखा जा रहा है। भारत में राज्यों के नाम केवल प्रशासनिक पहचान नहीं हैं, बल्कि वे वहां की भाषा, इतिहास, संस्कृति और सामाजिक विरासत से भी जुड़े होते हैं। ऐसे में ‘केरल’ से ‘केरलम्’ करने का फैसला राज्य की स्थानीय पहचान को संवैधानिक स्तर पर मान्यता देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
किसी राज्य का नाम बदलना सामान्य प्रशासनिक आदेश से संभव नहीं है। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद में विधेयक लाया जाता है। राष्ट्रपति की सिफारिश के बाद विधेयक संसद में पेश किया जाता है। संबंधित राज्य की विधानसभा से भी इस विषय पर राय मांगी जाती है। संसद के दोनों सदनों से विधेयक पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद नाम परिवर्तन प्रभावी होता है। इसलिए लोकसभा से विधेयक पारित होना इस प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है। आगे की संसदीय और संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ‘केरलम्’ आधिकारिक नाम के रूप में लागू हो सकेगा।
नाम परिवर्तन के बाद केंद्र और राज्य सरकार के विभिन्न आधिकारिक दस्तावेजों में भी बदलाव करना होगा। सरकारी वेबसाइटों, विभागीय रिकॉर्ड, अधिसूचनाओं, मानचित्रों, प्रशासनिक दस्तावेजों और अन्य आधिकारिक सामग्री में राज्य का नया नाम दर्ज किया जाएगा। हालांकि, इससे राज्य की भौगोलिक सीमाओं या प्रशासनिक ढांचे में कोई बदलाव नहीं होगा। यह मुख्य रूप से राज्य के आधिकारिक नाम में परिवर्तन होगा।
भारत की विविधता में राज्यों के नाम उनकी विशिष्ट पहचान को दर्शाते हैं। कई राज्यों के नाम समय-समय पर ऐतिहासिक, भाषायी या सांस्कृतिक कारणों से बदले गए हैं। इसी क्रम में केरल का नाम ‘केरलम्’ किया जाना भी स्थानीय भाषायी पहचान को महत्व देने वाला कदम माना जा रहा है। मलयालम भाषा में राज्य का नाम ‘കേരളം’ लिखा जाता है, जिसका हिंदी रूपांतरण ‘केरलम्’ किया जा सकता है। इसलिए प्रस्तावित नाम राज्य की स्थानीय भाषा में प्रचलित नाम के अधिक करीब माना जा रहा है।
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय द्वारा पेश किए गए इस विधेयक का लोकसभा से पारित होना नाम परिवर्तन की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण पड़ाव है। अब आगे की संवैधानिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद यह तय होगा कि ‘केरलम्’ नाम कब से आधिकारिक रूप से लागू होगा। ‘केरल’ से ‘केरलम्’ का यह बदलाव केवल एक शब्द का परिवर्तन नहीं है, बल्कि भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय पहचान को संवैधानिक स्वरूप देने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। राज्य के इतिहास और स्थानीय परंपराओं से जुड़े इस नाम को आधिकारिक पहचान मिलने के बाद केरल की पहचान का एक नया अध्याय शुरू होगा।

