बेंगलूरु स्टार्टअप के फैसले ने छेड़ी बड़ी बहस

Jitendra Kumar Sinha
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बेंगलूरु के एक स्टार्टअप के संस्थापक की ओर से उत्तर भारत के चार राज्यों, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश, के पुरुष उम्मीदवारों को नौकरी नहीं देने की घोषणा ने सोशल मीडिया पर तीखी बहस छेड़ दी है। मामला केवल एक कंपनी की भर्ती नीति तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसने रोजगार, क्षेत्रीय पहचान, व्यक्तिगत आचरण, महिला सुरक्षा और समान अवसर जैसे कई गंभीर सवालों को सामने ला दिया है। मीडिया में सामने आई जानकारी के अनुसार, ‘ए. स्पोर्ट्स वर्ल्ड’ के संस्थापक कार्तिक एसजी ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पूर्व कर्मचारी के कथित दुर्व्यवहार और महिला सुरक्षा से जुड़ी घटना का हवाला देते हुए कहा है कि कंपनी ने उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार और मध्य प्रदेश के उम्मीदवारों को नियुक्त नहीं करने का फैसला किया है। यह बयान सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने इस नीति को लेकर सवाल उठाए। विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी एक व्यक्ति के कथित आचरण के आधार पर क्या उसके राज्य, क्षेत्र या समुदाय से जुड़े अन्य लोगों को भी नौकरी के अवसर से वंचित किया जा सकता है? दूसरी ओर, महिला सुरक्षा को लेकर किसी नियोक्ता की चिंता को भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। इसलिए इस पूरे प्रकरण को भावनाओं के बजाय व्यक्ति बनाम पहचान के व्यापक प्रश्न के रूप में देखना जरूरी है।


मान लीजिए किसी कंपनी में काम करने वाला कोई कर्मचारी अनुशासनहीनता करता है, किसी महिला सहकर्मी के साथ दुर्व्यवहार करता है या कार्यस्थल की मर्यादा का उल्लंघन करता है। ऐसी स्थिति में कंपनी को कार्रवाई का पूरा अधिकार है। जांच, चेतावनी, निलंबन, सेवा समाप्ति या आवश्यकता पड़ने पर कानून के अनुसार शिकायत, ये सभी रास्ते उपलब्ध हो सकते हैं। लेकिन यदि उस कर्मचारी के व्यवहार का संबंध उसके व्यक्तिगत आचरण से है, तो उसका दायरा उसी व्यक्ति तक सीमित रहना चाहिए। किसी व्यक्ति की गलती को उसके पूरे राज्य के लोगों के चरित्र का प्रमाण मान लेना एक अलग प्रकार का निष्कर्ष होगा। बिहार का कोई युवक केवल इसलिए अनुशासनहीन नहीं हो सकता है क्योंकि वह बिहार से आता है। उत्तर प्रदेश का कोई उम्मीदवार केवल अपने गृह राज्य के कारण महिला सुरक्षा के लिए खतरा नहीं हो जाता है। इसी तरह राजस्थान या मध्य प्रदेश से आने वाला प्रत्येक पुरुष उम्मीदवार किसी दूसरे व्यक्ति के कथित व्यवहार के लिए जिम्मेदार नहीं हो सकता है। व्यक्ति का मूल्यांकन उसके व्यवहार से होना चाहिए, उसकी जन्मभूमि से नहीं। यही वह बिंदु है जिसे सोशल मीडिया पर आलोचना करने वाले अनेक लोगों ने उठाया है।


रोजगार की दुनिया में सामान्यतः किसी उम्मीदवार का मूल्यांकन उसकी शिक्षा, कौशल, अनुभव, कार्यक्षमता, संवाद क्षमता, पेशेवर व्यवहार और संबंधित नौकरी की आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है। किसी उम्मीदवार से पूछा जाता है कि उसने क्या पढ़ाई की है? उसे क्या काम आता है? उसका अनुभव कितना है? वह टीम में कैसे काम करता है? उसकी पेशेवर दक्षता क्या है? क्या वह कार्यस्थल की नीतियों का पालन करेगा? लेकिन यदि इन सवालों की जगह यह पूछ लिया जाए कि “आप किस राज्य से हैं?”, तो भर्ती की प्रक्रिया का केंद्र योग्यता से हटकर पहचान बन सकता है। यह केवल एक कंपनी के लिए समस्या नहीं है। यदि ऐसी सोच सामान्य होने लगे, तो देश के भीतर रोजगार की आवाजाही पर भी असर पड़ सकता है। भारत की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा ही इस बात पर टिका है कि लोग अपने गृह राज्य से दूसरे राज्यों में जाकर काम करते हैं। कोई बिहार से बेंगलूरु जाता है, कोई उत्तर प्रदेश से मुंबई, कोई राजस्थान से दिल्ली, कोई मध्य प्रदेश से पुणे और कोई कर्नाटक से हैदराबाद जाकर नौकरी करता है। भारत की आर्थिक गतिशीलता का आधार ही श्रम और प्रतिभा की आवाजाही है।


बेंगलूरु लंबे समय से भारत के प्रमुख तकनीकी और स्टार्टअप केंद्रों में गिना जाता है। यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से युवा शिक्षा और रोजगार के लिए आते हैं। आईटी कंपनियों से लेकर स्टार्टअप, ई-कॉमर्स, वित्तीय सेवाओं और अनुसंधान संस्थानों तक, बेंगलूरु की कार्य संस्कृति में विभिन्न राज्यों से आए लोगों की भागीदारी रही है। यही भारतीय महानगरों की विशेषता भी है। किसी शहर की आर्थिक शक्ति केवल वहां पैदा हुए लोगों से नहीं बनती है। दूसरे शहरों और राज्यों से आने वाले डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, तकनीकी विशेषज्ञ, श्रमिक, उद्यमी और सेवा क्षेत्र के कर्मचारी भी उसमें योगदान देते हैं। इसलिए किसी विशेष क्षेत्र से आने वाले लोगों के बारे में सामूहिक धारणा बनाना अंततः उसी महानगरीय व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है, जो विविध प्रतिभाओं से मजबूत होती है।


इस पूरे विवाद में महिला सुरक्षा का प्रश्न सबसे महत्वपूर्ण है। कार्यस्थल पर महिलाओं को सुरक्षित वातावरण मिलना चाहिए। यह किसी भी संस्था की मूल जिम्मेदारियों में शामिल है। यदि किसी कर्मचारी के विरुद्ध दुर्व्यवहार की शिकायत आती है, तो उसे गंभीरता से लेना आवश्यक है। कंपनी को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शिकायत दर्ज कराने की स्पष्ट व्यवस्था हो, शिकायतकर्ता को प्रताड़ना का भय न हो, मामले की निष्पक्ष जांच हो, कार्यस्थल पर आचार संहिता स्पष्ट हो, कर्मचारियों को नियमित रूप से संवेदनशीलता और व्यवहार संबंधी प्रशिक्षण मिले, दोष सिद्ध होने पर नियमों के अनुसार कार्रवाई हो और जरूरत पड़ने पर कानून प्रवर्तन एजेंसियों से संपर्क किया जाए। लेकिन महिला सुरक्षा का सबसे प्रभावी रास्ता राज्यवार बहिष्कार नहीं, बल्कि मजबूत संस्थागत व्यवस्था है। क्योंकि किसी भी राज्य, शहर या समुदाय में अच्छे और बुरे दोनों तरह के लोग हो सकते हैं। किसी क्षेत्र का पता व्यक्ति के चरित्र का प्रमाणपत्र नहीं होता है।


सामाजिक जीवन में एक सामान्य सिद्धांत है कि व्यक्ति अपने कर्म के लिए जिम्मेदार होता है। यदि कोई व्यक्ति अपराध करता है तो कानून उस व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई करता है। कानून यह नहीं कहता कि उसके गांव, जिले या राज्य के सभी लोगों को दोषी माना जाए। इसी प्रकार किसी कार्यालय में एक कर्मचारी नियम तोड़ता है तो उस कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई होती है। पूरी टीम को दोषी नहीं माना जाता है। इसी तर्क को रोजगार पर भी लागू किया जा सकता है। यदि किसी पूर्व कर्मचारी के खिलाफ गंभीर शिकायत है, तो उस मामले की जांच होनी चाहिए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ उचित कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन उससे यह निष्कर्ष निकालना कि उसी राज्य के सभी पुरुष उम्मीदवार संभावित रूप से अनुपयुक्त हैं, एक अलग प्रकार का सामान्यीकरण होगा। यही कारण है कि सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा कि भर्ती का आधार योग्यता और आचरण होना चाहिए, जन्मस्थान नहीं।


इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कुछ सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने तर्क दिया है कि अपराध और दुर्व्यवहार किसी एक राज्य की विशेषता नहीं हैं। यदि किसी एक व्यक्ति के कथित व्यवहार के कारण उसके राज्य के लोगों को नौकरी से बाहर किया जाए, तो यही तर्क आगे बढ़ाते हुए किसी भी राज्य के लोगों को किसी घटना के आधार पर बाहर किया जा सकता है। यहीं से सवाल और गंभीर हो जाता है। यदि किसी एक राज्य के व्यक्ति ने गलती की तो क्या उस राज्य के लाखों लोगों को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? और यदि किसी दूसरे राज्य में ऐसी ही घटना सामने आए तो क्या वहां के लोगों पर भी समान प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए? यदि हर घटना के बाद किसी पूरे क्षेत्र को दोषी मानने की प्रवृत्ति बढ़ती गई, तो देश में रोजगार और सामाजिक संबंधों का क्या स्वरूप होगा? ये सवाल केवल इस मामले से जुड़े नहीं हैं। ये उस मानसिकता से जुड़े हैं जिसमें व्यक्ति की पहचान उसके व्यक्तिगत गुणों से पहले उसके भौगोलिक परिचय से तय होने लगती है।


स्टार्टअप केवल एक कंपनी नहीं होता है। उसका संस्थापक संगठन की संस्कृति का निर्माण करता है। बड़ी कंपनियों में मानव संसाधन विभाग, कानूनी सलाहकार और निर्धारित प्रक्रियाएं होती हैं। छोटे स्टार्टअप में संस्थापक का व्यक्तिगत निर्णय कई बार पूरी संस्था की नीति बन जाता है। इसलिए संस्थापकों से अपेक्षा होती है कि वे कठिन परिस्थितियों में भी नीतिगत फैसले सावधानी से लें। यदि किसी कर्मचारी से जुड़ी गंभीर घटना हुई है, तो उसके बाद कंपनी को तत्काल सुरक्षा उपाय मजबूत करने चाहिए। भर्ती प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित किया जा सकता है। संदर्भ जांच, पृष्ठभूमि सत्यापन, पेशेवर संदर्भ, व्यवहार संबंधी प्रश्न और स्पष्ट कार्यस्थल नीति अपनाई जा सकती है। लेकिन किसी बड़े समूह को केवल उसके भौगोलिक मूल के आधार पर बाहर करना व्यापक सवाल पैदा करता है।


किसी कंपनी को अपने कर्मचारियों की सुरक्षा और कार्यस्थल की संस्कृति को लेकर चिंता है तो उसके पास कई व्यावहारिक विकल्प हैं। उदाहरण के लिए पिछली कंपनी में उम्मीदवार का कार्य व्यवहार कैसा था, इसकी जानकारी ली जा सकती है। उम्मीदवार के पिछले रोजगार का सत्यापन किया जा सकता है। ज्वाइनिंग के समय कर्मचारी से कंपनी की आचार संहिता स्वीकार कराई जा सकती है। सभी कर्मचारियों के लिए अनिवार्य कार्यस्थल व्यवहार प्रशिक्षण कराया जा सकता है। महिलाओं और अन्य कर्मचारियों के लिए सुरक्षित और गोपनीय शिकायत प्रणाली बनाई जा सकती है। दुर्व्यवहार की स्थिति में स्पष्ट और समान नियम लागू किए जा सकते हैं। इन उपायों में एक महत्वपूर्ण बात समान है कि इनका केंद्र व्यक्ति का व्यवहार है, उसकी जन्मभूमि नहीं।


भारत में क्षेत्रीय पहचान बहुत मजबूत है। लोग अपनी भाषा, भोजन, संस्कृति और परंपराओं पर गर्व करते हैं। यह विविधता भारतीय समाज की विशेषता है। लेकिन यही पहचान यदि रोजगार या सामाजिक संबंधों में पूर्वाग्रह का आधार बन जाए तो समस्या पैदा हो सकती है। “वह बिहारी है”, “वह यूपी का है”, “वह राजस्थानी है” या “वह मध्य प्रदेश से है”, इन परिचयों से व्यक्ति की पूरी प्रकृति तय नहीं की जा सकती है। एक ही राज्य में अलग-अलग विचार, संस्कार, शिक्षा, सामाजिक पृष्ठभूमि और व्यवहार वाले करोड़ों लोग रहते हैं। भौगोलिक पहचान व्यक्ति का परिचय हो सकती है, चरित्र का प्रमाण नहीं।


इस विवाद में बिहार का नाम विशेष रूप से चर्चा में आया है। देश के अलग-अलग हिस्सों में बिहार के लाखों लोग शिक्षा, व्यवसाय और रोजगार से जुड़े हैं। बिहार के युवाओं ने प्रशासन, न्यायपालिका, शिक्षा, चिकित्सा, इंजीनियरिंग, आईटी, सेना, बैंकिंग, कारोबार और अन्य क्षेत्रों में अपनी जगह बनाई है। इसी तरह उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश से भी बड़ी संख्या में लोग देश के विभिन्न हिस्सों में काम करते हैं। किसी राज्य के युवाओं के लिए यह स्वाभाविक रूप से असहज स्थिति हो सकती है यदि उन्हें केवल उनके गृह राज्य के कारण किसी अवसर से बाहर किया जाए। रोजगार पाने वाला युवा पहले उम्मीदवार होता है, उसके बाद किसी राज्य का निवासी।


यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी और नीतिगत अंतर समझना जरूरी है। निजी कंपनियों को अपने संगठन के लिए भर्ती मानदंड और आंतरिक नीतियां बनाने की काफी स्वतंत्रता होती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हर प्रकार का भेदभाव स्वतः उचित या कानूनी हो जाता है। रोजगार संबंधी नियम, श्रम कानून, अनुबंध, कंपनी की नीतियां और परिस्थितियों के आधार पर किसी विशेष मामले का कानूनी मूल्यांकन अलग हो सकता है। इसलिए सोशल मीडिया पर किसी घटना को देखकर सीधे यह निष्कर्ष निकालना कि संबंधित नीति निश्चित रूप से कानूनन वैध या अवैध है, सावधानी के बिना उचित नहीं होगा। इस विवाद का नैतिक और सामाजिक प्रश्न हालांकि अलग है कि क्या किसी उम्मीदवार की व्यक्तिगत योग्यता और आचरण की जगह उसका राज्य प्राथमिक चयन मानदंड होना चाहिए? यही वह प्रश्न है जिस पर व्यापक बहस चल रही है।


किसी कंपनी के लिए कर्मचारी सुरक्षा और संस्थागत भरोसा बेहद महत्वपूर्ण हैं। लेकिन भरोसा केवल प्रतिबंधों से नहीं बनता है। भरोसा तब बनता है जब कर्मचारियों को लगता है कि शिकायत सुनी जाएगी। जांच निष्पक्ष होगी। दोषी के खिलाफ कार्रवाई होगी। निर्दोष को परेशान नहीं किया जाएगा और नियम सबके लिए समान होंगे। यदि कोई कंपनी महिला सुरक्षा के प्रति गंभीर है, तो उसे ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिसमें महिला कर्मचारी सुरक्षित महसूस करें और पुरुष कर्मचारियों को भी स्पष्ट रूप से पता हो कि कार्यस्थल पर स्वीकार्य और अस्वीकार्य व्यवहार क्या है।


सोशल मीडिया का दौर ऐसा है जिसमें किसी संस्थापक का एक बयान कुछ ही घंटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए सार्वजनिक मंच पर कही गई बातों का प्रभाव भी व्यापक हो सकता है। एक ओर संस्थापक को अपने अनुभव और चिंता व्यक्त करने का अधिकार है। दूसरी ओर उस बयान के सामाजिक प्रभाव पर सवाल उठाना भी स्वाभाविक है। विशेषकर तब, जब बात रोजगार और किसी बड़े क्षेत्र की आबादी से संबंधित हो। ऐसे मामलों में सबसे उपयोगी रास्ता यही है कि हम आरोप और प्रतिक्रिया के बीच तथ्यों को अलग-अलग देखें। यदि पूर्व कर्मचारी से जुड़ी कोई घटना हुई है तो उसके तथ्य क्या हैं? क्या शिकायत हुई थी? क्या जांच हुई? क्या कार्रवाई हुई? कंपनी की सुरक्षा नीति क्या है? और भर्ती नीति किस आधार पर बनाई गई? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक बहस को भावनात्मक आरोप-प्रत्यारोप से निकालकर तथ्यात्मक विमर्श की ओर ले जा सकते हैं।


भारत में एक राज्य से दूसरे राज्य जाकर काम करना कोई नई बात नहीं है। सदियों से लोग व्यापार, शिक्षा, रोजगार और जीवन के बेहतर अवसरों के लिए स्थान बदलते रहे हैं। आज बेंगलूरु में बिहार का युवक काम कर रहा है, मुंबई में उत्तर प्रदेश का, दिल्ली में राजस्थान का, पुणे में मध्य प्रदेश का और पटना में देश के दूसरे हिस्सों से आए लोग काम कर रहे हैं। यही भारत की सामाजिक और आर्थिक संरचना है। यदि किसी व्यक्ति के व्यक्तिगत आचरण को उसके पूरे क्षेत्र की पहचान बना दिया जाए, तो इससे आपसी अविश्वास बढ़ सकता है। इसलिए जरूरी है कि क्षेत्रीय पहचान सम्मान का विषय रहे, रोजगार में पूर्वाग्रह का आधार न बने।


भारतीय परंपरा में व्यक्ति के मूल्यांकन को उसके कर्म से जोड़कर देखने की गहरी परंपरा रही है। आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्था भी नागरिकों को व्यक्तिगत अधिकारों और समान अवसर की दृष्टि से देखने का सिद्धांत सामने रखती है। इसका अर्थ यह नहीं कि कंपनियां कर्मचारियों के व्यवहार की जांच न करें। इसके विपरीत, जांच और अनुशासन व्यवस्था जितनी मजबूत होगी, कार्यस्थल उतना ही सुरक्षित होगा। लेकिन जांच का केंद्र होना चाहिए ‘व्यक्ति का आचरण’। न कि उसका जन्मस्थान। यदि कोई व्यक्ति गलत व्यवहार करता है तो उसे उसके कर्म के लिए जवाबदेह बनाना चाहिए। यदि कोई उम्मीदवार योग्य, अनुशासित और पेशेवर है तो केवल उसके राज्य के आधार पर उसके अवसर को सीमित करना एक अलग सवाल खड़ा करता है।


इस विवाद को केवल “बेंगलूरु बनाम उत्तर भारत” या “दक्षिण बनाम उत्तर” के रूप में देखना उचित नहीं होगा। ऐसा करना मूल मुद्दे को और क्षेत्रीय बना देगा। असल सवाल इससे कहीं बड़ा है, कार्यस्थल को सुरक्षित कैसे बनाया जाए और साथ ही योग्य उम्मीदवारों के लिए अवसर भी निष्पक्ष कैसे रखे जाएं? दोनों लक्ष्य एक-दूसरे के विरोधी नहीं है। सुरक्षित कार्यस्थल चाहिए।  महिलाओं का सम्मान चाहिए।  दुर्व्यवहार पर कठोर कार्रवाई चाहिए। साथ ही योग्य उम्मीदवारों के लिए अवसर भी चाहिए। इन सबको एक साथ हासिल करने का रास्ता मजबूत संस्थागत व्यवस्था में है।


बेंगलूरु के इस स्टार्टअप से जुड़ा विवाद एक सोशल मीडिया पोस्ट से शुरू हुआ हो, लेकिन इससे उठे सवाल कहीं बड़े हैं। यह सवाल केवल चार राज्यों के युवाओं का नहीं है। यह सवाल उस भारत का है जिसमें करोड़ों लोग अपने जन्मस्थान से बाहर जाकर रोजगार और भविष्य तलाशते हैं। किसी कर्मचारी के कथित दुर्व्यवहार को गंभीरता से लेना जरूरी है। महिला सुरक्षा से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। लेकिन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यक्तिगत आचरण, संदर्भ जांच, स्पष्ट नियम, प्रशिक्षण और प्रभावी शिकायत व्यवस्था जैसे उपाय अधिक सीधे तौर पर उसी समस्या को संबोधित करते हैं। किसी व्यक्ति के गलत व्यवहार की जवाबदेही उसी व्यक्ति की होनी चाहिए। क्योंकि यदि किसी एक व्यक्ति की गलती का बोझ उसके पूरे राज्य के लोगों पर डाल दिया जाए, तो न्याय का सिद्धांत ही कमजोर पड़ सकता है। रोजगार का दरवाजा खुला रहे, लेकिन कार्यस्थल की मर्यादा भी कायम रहे, यही संतुलन आधुनिक भारत की जरूरत है। बेंगलूरु हो या पटना, मुंबई हो या जयपुर, भोपाल हो या लखनऊ हर शहर में योग्य युवाओं को अपनी प्रतिभा के आधार पर आगे बढ़ने का अवसर मिलना चाहिए और हर कार्यस्थल पर हर कर्मचारी को सुरक्षित एवं सम्मानजनक वातावरण मिलना चाहिए। आखिरकार किसी उम्मीदवार का सबसे बड़ा परिचय उसका राज्य नहीं, उसकी योग्यता, उसका आचरण और उसके कर्म है।


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