जहां पत्थर नहीं, भावनाएं दिखाई देती हैं - क्योटो के “बौद्ध मंदिर”

Jitendra Kumar Sinha
0

 


जापान की सांस्कृतिक राजधानी कहे जाने वाले क्योटो में एक ऐसा बौद्ध मंदिर है, जहां पहुंचकर श्रद्धालुओं और पर्यटकों को एक अनोखा दृश्य देखने को मिलता है। Otagi Nenbutsu-ji मंदिर परिसर में पत्थर की करीब 1,200 राकान प्रतिमाएं स्थापित हैं। खास बात यह है कि इन प्रतिमाओं का चेहरा एक-दूसरे से बिल्कुल अलग नजर आता है। किसी के चेहरे पर मुस्कान है, कोई गंभीर दिखाई देता है तो कोई ऐसा लगता है जैसे गहरे ध्यान में लीन हो।



इन प्रतिमाओं को देखकर ऐसा महसूस होता है मानो पत्थर में इंसानी भावनाओं को कैद कर दिया गया हो। हर प्रतिमा का अलग चेहरा, अलग अंदाज, राकान प्रतिमाएं बौद्ध परंपरा में उन शिष्यों का प्रतिनिधित्व करती हैं जिन्होंने बुद्ध की शिक्षाओं को आगे बढ़ाया। लेकिन क्योटो के इस मंदिर की राकान प्रतिमाओं की सबसे बड़ी विशेषता उनकी विविधता है।



किसी प्रतिमा की आंखों में शांति दिखाई देती है तो किसी के चेहरे पर हल्की शरारत। कोई हंसता हुआ नजर आता है, कोई विचारमग्न है और किसी की मुद्रा ऐसी है जैसे वह किसी गहरी बात पर चिंतन कर रहा हो। यही विविधता इस परिसर को सामान्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान देती है। यहां आने वाला व्यक्ति केवल मूर्तियों को नहीं देखता, बल्कि उनके चेहरों में अपने आसपास के लोगों और कभी-कभी स्वयं के भाव भी तलाशने लगता है।



इन करीब 1,200 पत्थर की प्रतिमाओं का निर्माण मंदिर के पुनरुद्धार के दौरान 1980 के दशक में किया गया था। यह काम केवल पारंपरिक मूर्तिकारों तक सीमित नहीं रहा। बौद्ध मूर्तिकार निशिमुरा कोचो के प्रोत्साहन से आम लोगों ने भी प्रतिमाओं के निर्माण में भाग लिया। यही कारण है कि इन मूर्तियों में एक जैसी कलात्मक शैली के बजाय अलग-अलग व्यक्तित्व और भावनाएं दिखाई देती हैं। हर प्रतिमा मानो अपने निर्माता की कल्पना, अनुभव और संवेदना को अपने चेहरे पर लेकर खड़ी है।



इन प्रतिमाओं के निर्माण में आम लोगों की भागीदारी अपने आप में महत्वपूर्ण थी। किसी व्यक्ति ने पत्थर पर शांत चेहरा उकेरा तो किसी ने मुस्कान को जगह दी। किसी ने गंभीरता दिखाई तो किसी ने चेहरे पर हल्का हास्य रचा। इस तरह मंदिर परिसर में तैयार हुई प्रतिमाएं केवल धार्मिक प्रतीक नहीं रहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं की एक विशाल प्रदर्शनी बन गईं। पत्थर कठोर होता है, लेकिन कलाकार की कल्पना उसे संवेदनशील बना सकती है, इस मंदिर की राकान प्रतिमाएं इस बात का सुंदर उदाहरण हैं।



मंदिर परिसर में घूमते हुए अलग-अलग प्रतिमाओं को देखना अपने आप में एक अनुभव है। कुछ चेहरे इतने सहज लगते हैं कि उन्हें देखकर मुस्कान आ जाती है। कुछ प्रतिमाएं गंभीरता और शांति का एहसास कराती हैं। कई प्रतिमाओं की भंगिमा ऐसी है जैसे वे किसी संवाद में हों। कुछ हाथों की विशेष मुद्रा में हैं, जबकि कुछ ध्यान की अवस्था में दिखाई देती हैं। इस विविधता के कारण यहां आने वाले लोगों के लिए हर प्रतिमा एक नया आश्चर्य लेकर आती है।



ओतागी नेनबुत्सु-जी की राकान प्रतिमाएं जापानी कला और बौद्ध दर्शन के बीच एक सुंदर सेतु का काम करती हैं। बौद्ध दर्शन मनुष्य के भीतर मौजूद भावनाओं, विचारों और आत्मचिंतन को महत्व देता है। वहीं इन प्रतिमाओं के चेहरे जीवन के अलग-अलग मानवीय रंगों को सामने रखते हैं। यहां आध्यात्मिकता केवल गंभीरता में नहीं, बल्कि मुस्कान, सहजता और मानवीय स्वभाव में भी दिखाई देती है।



दुनिया के कई मंदिर अपनी विशाल इमारतों, प्राचीन मूर्तियों या स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध हैं। लेकिन क्योटो का यह मंदिर अपनी 1,200 अलग-अलग भाव-भंगिमाओं वाली राकान प्रतिमाओं के कारण अलग पहचान बनाता है। इन प्रतिमाओं को देखकर एक सवाल मन में उठता है कि क्या पत्थर भी मुस्कुरा सकता है? यहां इसका जवाब शायद हां में मिलता है। किसी चेहरे पर हंसी, किसी पर शांति और किसी पर गंभीरता देखकर लगता है कि ये प्रतिमाएं केवल पत्थर नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर छिपी भावनाओं का आईना हैं।



ओतागी नेनबुत्सु-जी की करीब 1,200 राकान प्रतिमाएं यह संदेश देती हैं कि आध्यात्मिकता का रास्ता केवल गंभीर चेहरों से होकर नहीं गुजरता। जीवन में खुशी, शांति, जिज्ञासा, हास्य, चिंतन और सहजता, सभी भावों का अपना महत्व है। शायद यही इस मंदिर की सबसे बड़ी खूबसूरती है। यहां पत्थर की प्रतिमाएं मौन हैं, लेकिन उनके चेहरे बहुत कुछ कहते हैं। हर चेहरा अलग है, हर भाव अलग है और हर प्रतिमा मानो अपनी एक कहानी लेकर खड़ी है। क्योटो का यह मंदिर इसलिए केवल बौद्ध आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि पत्थरों में दिखाई देती मानवीय भावनाओं की एक अद्भुत दुनिया भी है।


एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top