अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में अब हिन्दी में भी होगी पढ़ाई

Jitendra Kumar Sinha
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राजस्थान में महात्मा गांधी राजकीय विद्यालयों के अंग्रेजी माध्यम को लेकर शिक्षा विभाग ने महत्वपूर्ण बदलाव किया है। विद्यार्थियों के बेहद कम नामांकन की समस्या से जूझ रहे इन विद्यालयों में अब अंग्रेजी के साथ हिन्दी माध्यम की कक्षाएं भी संचालित की जाएंगी। शिक्षा विभाग के इस निर्णय से उन अभिभावकों और विद्यार्थियों को राहत मिलने की उम्मीद है, जो अपने बच्चों को सरकारी स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं, लेकिन अंग्रेजी माध्यम के कारण प्रवेश लेने से हिचक रहे थे।


माध्यमिक शिक्षा निदेशक की ओर से जारी आदेश के अनुसार प्रदेश में 346 महात्मा गांधी राजकीय विद्यालय ऐसे चिन्हित किए गए हैं, जहां विद्यार्थियों का नामांकन अत्यंत कम है। इन विद्यालयों में छात्र संख्या बढ़ाने और उपलब्ध शैक्षणिक संसाधनों का बेहतर उपयोग करने के उद्देश्य से नई व्यवस्था लागू करने का निर्णय लिया गया है। शिक्षा विभाग ने माना कि केवल अंग्रेजी माध्यम होने के कारण कुछ क्षेत्रों में विद्यार्थियों और अभिभावकों की अपेक्षित रुचि नहीं बन पा रही है। खासकर ग्रामीण और छोटे कस्बों में कई परिवार अभी भी हिंदी माध्यम को अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए अधिक सहज और प्रभावी मानते हैं।


निदेशालय की ओर से संबंधित विद्यालयों से प्रस्ताव मांगे गए थे। प्राप्त प्रस्तावों के आधार पर फिलहाल 157 विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम के साथ हिन्दी माध्यम भी संचालित करने की अनुमति दी गई है। यानि अब इन स्कूलों में विद्यार्थियों को उनकी सुविधा और आवश्यकता के अनुसार माध्यम चुनने का अवसर मिलेगा। यह निर्णय केवल माध्यम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि कम नामांकन वाले सरकारी विद्यालयों को फिर से विद्यार्थियों से जोड़ने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। यदि हिंदी माध्यम शुरू होने से छात्र संख्या बढ़ती है तो विद्यालयों में उपलब्ध भवन, कक्षाओं, शिक्षकों और अन्य संसाधनों का भी बेहतर उपयोग हो सकेगा।


शिक्षा विभाग के आदेश में प्रदेश के विभिन्न जिलों के विद्यालयों को शामिल किया गया है। अजमेर जिले के पीसांगन, किशनगढ़ और अरांई ब्लॉक के विद्यालयों में भी अब अंग्रेजी के साथ हिन्दी माध्यम की पढ़ाई का रास्ता खुल गया है। इसी तरह भीलवाड़ा जिले के आसींद, मांडलगढ़ और सहाड़ा क्षेत्रों के विद्यालयों में भी यह व्यवस्था लागू होगी। उदयपुर जिले के वल्लभनगर और भिंडर क्षेत्र के विद्यालय भी सूची में शामिल हैं। इनमें विजयपुरा, रामेला और करकला जैसे विद्यालयों का उल्लेख किया गया है। इसके अलावा बाड़मेर, भरतपुर और बीकानेर जिले के कोलायत क्षेत्र के कई महात्मा गांधी अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों में भी हिन्दी माध्यम की कक्षाएं संचालित की जाएंगी।


शिक्षा के क्षेत्र में माध्यम का सवाल लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। एक ओर अंग्रेजी को रोजगार और उच्च शिक्षा के अवसरों से जोड़कर देखा जाता है, वहीं दूसरी ओर शुरुआती और बुनियादी शिक्षा अपनी मातृभाषा या सहज भाषा में होने के कई फायदे माने जाते हैं। ऐसे में एक ही सरकारी विद्यालय में दोनों माध्यम उपलब्ध होने से अभिभावकों को अपने बच्चों की क्षमता, रुचि और भविष्य की योजना के अनुरूप निर्णय लेने का विकल्प मिल सकता है। इससे उन परिवारों को भी सरकारी विद्यालयों की ओर आकर्षित किया जा सकता है, जो माध्यम के कारण निजी विद्यालयों को प्राथमिकता देते रहे हैं।


इस फैसले का सबसे बड़ा उद्देश्य कम नामांकन वाले विद्यालयों को सक्रिय और उपयोगी बनाए रखना है। किसी विद्यालय में छात्र संख्या लगातार कम रहने पर वहां उपलब्ध संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं हो पाता। कई बार विद्यालय का भवन, कक्षाएं और अन्य सुविधाएं होने के बावजूद विद्यार्थियों की कमी बनी रहती है। हिन्दी माध्यम शुरू होने से ऐसे विद्यालयों में स्थानीय विद्यार्थियों के लिए प्रवेश के नए अवसर पैदा होंगे। इससे सरकारी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।


राजस्थान सरकार का यह कदम इस बहस को भी नई दिशा देता है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा का मूल्यांकन केवल माध्यम के आधार पर नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता, संसाधनों और विद्यार्थियों के सीखने के स्तर के आधार पर होना चाहिए। अंग्रेजी और हिन्दी दोनों माध्यम एक ही परिसर में संचालित होने से विद्यार्थियों को विकल्प मिलेगा, लेकिन वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि दोनों माध्यमों में पर्याप्त शिक्षक, गुणवत्तापूर्ण पाठ्य सामग्री और प्रभावी शिक्षण व्यवस्था उपलब्ध हो। कुल मिलाकर, कम नामांकन से जूझ रहे 157 महात्मा गांधी राजकीय विद्यालयों में अंग्रेजी के साथ हिन्दी माध्यम शुरू करने का फैसला राजस्थान की सरकारी शिक्षा व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। यदि इससे विद्यालयों में छात्र संख्या बढ़ती है और अभिभावकों का भरोसा मजबूत होता है, तो यह मॉडल भविष्य में अन्य कम नामांकन वाले विद्यालयों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।


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