दवा किसी व्यक्ति के लिए केवल एक उत्पाद नहीं होती, बल्कि उसके जीवन और स्वास्थ्य से जुड़ी उम्मीद होती है। मरीज जब चिकित्सक की सलाह पर कोई दवा खरीदता है तो उसके मन में यह विश्वास होता है कि जो गोली, कैप्सूल, सिरप या इंजेक्शन वह ले रहा है, वह निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुरूप होगा। ऐसे में दवाओं के नमूनों का गुणवत्ता परीक्षण में असफल होना केवल नियामकीय कार्रवाई का विषय नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और उपभोक्ता विश्वास से जुड़ा गंभीर सवाल भी है। अगस्त महीने में देशभर में दवाओं के नमूनों की गई जांच में 220 नमूने गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरे। इनमें सबसे चिंताजनक तथ्य यह रहा कि दिल्ली से लिया गया एक नमूना नकली दवा का पाया गया। स्वास्थ्य मंत्रालय से जुड़े सूत्रों के अनुसार, केंद्रीय और राज्य स्तर की प्रयोगशालाओं में किए गए परीक्षणों के बाद संबंधित कंपनियों को दवाओं के प्रभावित बैच को तत्काल बाजार से हटाने के निर्देश दिए गए हैं।
दवाओं की गुणवत्ता की निगरानी के लिए देश में केंद्रीय और राज्य स्तर पर नियमित जांच की व्यवस्था है। अगस्त में केंद्रीय दवा प्रयोगशालाओं में किए गए परीक्षण में 29 नमूने खराब गुणवत्ता के पाए गए। वहीं राज्यों की प्रयोगशालाओं में हुई जांच में 191 नमूने निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप नहीं मिले। यह आंकड़ा अपने आप में इस बात की ओर संकेत करता है कि दवा निर्माण से लेकर बाजार तक उनकी गुणवत्ता पर लगातार निगरानी बनाए रखना आवश्यक है। दवाओं की गुणवत्ता में किसी भी प्रकार की कमी मरीज के उपचार को प्रभावित कर सकती है।
खराब गुणवत्ता और नकली दवा के बीच अंतर समझना जरूरी है। किसी दवा का नमूना निर्धारित मानकों के अनुरूप न मिलने का कारण उसकी संरचना, प्रभावशीलता, शुद्धता या निर्माण से संबंधित अन्य कमियां हो सकती हैं। इसके विपरीत नकली दवा वह है जिसे वास्तविक उत्पाद के नाम या पहचान का गलत इस्तेमाल करके बाजार में उतारा गया हो। दिल्ली से लिए गए एक नमूने के नकली पाए जाने की जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि नकली दवा केवल गुणवत्ता का प्रश्न नहीं है, बल्कि मरीज की सुरक्षा के लिए सीधा खतरा बन सकती है। यदि किसी व्यक्ति को बीमारी के उपचार के लिए ऐसी दवा मिल जाए जिसमें अपेक्षित सक्रिय तत्व ही न हो या जिसकी पहचान गलत तरीके से प्रस्तुत की गई हो, तो उपचार प्रभावित हो सकता है।
गुणवत्ता परीक्षण में नमूनों के असफल होने के बाद संबंधित दवा कंपनियों को प्रभावित बैचों को बाजार से तत्काल हटाने के लिए कहा गया है। यह कदम इसलिए जरूरी है ताकि खराब गुणवत्ता वाली दवाएं आगे मरीजों तक न पहुंचे। दवा निर्माण कंपनियों की जिम्मेदारी केवल उत्पादन तक सीमित नहीं हो सकती। उन्हें यह सुनिश्चित करना होता है कि निर्माण प्रक्रिया, कच्चे माल, पैकेजिंग, भंडारण और वितरण के प्रत्येक चरण में निर्धारित मानकों का पालन हो। वहीं नियामक एजेंसियों की भूमिका यह सुनिश्चित करने की है कि नियमों का उल्लंघन होने पर समय रहते कार्रवाई हो।
दवा उद्योग का आधार ही विश्वास है। मरीज दवा की गुणवत्ता स्वयं प्रयोगशाला में जाकर जांच नहीं सकता। वह डॉक्टर, फार्मासिस्ट, निर्माता और नियामक व्यवस्था पर भरोसा करता है। इसलिए दवाओं की नियमित और पारदर्शी जांच इस भरोसे को बनाए रखने के लिए बेहद आवश्यक है। 220 नमूनों का गुणवत्ता परीक्षण में असफल होना यह बताता है कि निगरानी व्यवस्था को लगातार सक्रिय रखने की आवश्यकता है। साथ ही यह भी जरूरी है कि जांच के परिणाम सामने आने के बाद कार्रवाई केवल संबंधित बैच को बाजार से हटाने तक सीमित न रहे, बल्कि जहां आवश्यक हो वहां निर्माण प्रक्रिया और गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था की भी जांच की जाए।
दवा की गुणवत्ता का सीधा संबंध मानव जीवन से है। इसलिए दवा निर्माण में छोटी-सी लापरवाही भी बड़ी समस्या पैदा कर सकती है। सरकार, नियामक संस्थाओं, दवा कंपनियों, वितरकों और मेडिकल स्टोर संचालकों, सभी की साझा जिम्मेदारी है कि मरीजों तक सुरक्षित और मानक दवाएं ही पहुंचे। अगस्त की जांच में सामने आए 220 खराब गुणवत्ता वाले नमूने और दिल्ली में मिला नकली दवा का नमूना एक स्पष्ट संदेश देते हैं- दवा की गुणवत्ता से किसी भी स्तर पर समझौता नहीं किया जा सकता। नियमित जांच, त्वरित कार्रवाई, प्रभावी निगरानी और पारदर्शी सूचना व्यवस्था के माध्यम से ही दवा बाजार में जनता का भरोसा कायम रखा जा सकता है। आखिरकार दवा का उद्देश्य जीवन को सुरक्षित करना है और इस उद्देश्य की पहली शर्त उसकी गुणवत्ता और विश्वसनीयता ही है।

