नई संस्था ने दो दिन में बदला वृद्धाश्रम का माहौल

Jitendra Kumar Sinha
0

 


उम्र का आखिरी पड़ाव अक्सर सहारे, सम्मान और अपनत्व की मांग करता है। ऐसे समय में यदि किसी बुजुर्ग को अपने ही कमरे में बंद रहना पड़े तो यह केवल व्यवस्था की कमी नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के लिए भी गंभीर सवाल खड़ा करता है। सासाराम के अदमापुर स्थित राजकीय वृद्धाश्रम से सामने आई ऐसी ही तस्वीर ने व्यवस्था और समाज, दोनों का ध्यान आकर्षित किया है। हालांकि, नई संस्था को संचालन की जिम्मेदारी मिलने के महज दो दिनों में यहां रहने वाले बुजुर्गों की दिनचर्या में बदलाव दिखाई देने लगा है। सामाजिक सुरक्षा कोषांग के सहायक निदेशक नीजू कुमार राम के अनुसार, अदमापुर राजकीय वृद्धाश्रम में फिलहाल 30 वृद्ध महिला और पुरुष रह रहे हैं। नई संस्था द्वारा संचालन संभालने के बाद बुजुर्गों की जरूरतों, उनकी सुविधाओं और दैनिक गतिविधियों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है।


वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों ने पूर्व की व्यवस्था को लेकर कई बातें बताई। उनका कहना है कि जो लोग चलने-फिरने में असमर्थ थे, उन्हें पहले कमरे में बंद कर दिया जाता था। ऐसे बुजुर्गों के लिए कमरे से बाहर निकलना, दूसरे लोगों से मिलना-जुलना या परिसर में समय बिताना मुश्किल था। बुजुर्गों की यह बात व्यवस्था की संवेदनशीलता पर सवाल खड़े करती है। शारीरिक रूप से कमजोर होना किसी व्यक्ति को सामाजिक जीवन से अलग कर देने का कारण नहीं हो सकता। उम्रदराज व्यक्ति को भले ही चलने में सहायता की आवश्यकता हो, लेकिन उसे बातचीत, सम्मान, मनोरंजन और अपनेपन की उतनी ही जरूरत होती है जितनी किसी अन्य इंसान को।


नई संस्था के संचालन में आने के बाद वृद्धाश्रम की दिनचर्या में बदलाव की शुरुआत हुई है। महज दो दिनों में बुजुर्गों को पहले की तुलना में अधिक सक्रिय वातावरण मिलने लगा है। उनके साथ बातचीत, उनकी आवश्यकताओं को समझने और उनकी सुविधाओं पर ध्यान देने की प्रक्रिया शुरू हुई है। किसी वृद्धाश्रम की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि वहां कितने लोगों को भोजन और रहने की जगह मिल रही है। असली कसौटी यह है कि वहां रहने वाले बुजुर्ग स्वयं को कितना सुरक्षित, सम्मानित और परिवार जैसा महसूस करते हैं।


बुजुर्गों के लिए बनाए गए आश्रय गृहों का उद्देश्य केवल छत उपलब्ध कराना नहीं है। जीवन के अंतिम पड़ाव में पहुंच चुके लोगों के लिए भावनात्मक सहारा भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कई बुजुर्ग अपने परिवार से दूर होते हैं, कुछ अकेले रह जाते हैं और कुछ परिस्थितियों के कारण वृद्धाश्रम में जीवन बिताने को मजबूर होते हैं। ऐसे में वृद्धाश्रम उनके लिए दूसरा घर बन सकता है, बशर्ते वहां रहने वाले लोगों को बोझ नहीं, बल्कि सम्मान के योग्य नागरिक समझा जाए। चलने-फिरने में असमर्थ बुजुर्गों को अतिरिक्त देखभाल की जरूरत होती है। उनके लिए सहायक उपकरण, समय पर चिकित्सा सुविधा, नियमित स्वास्थ्य जांच और प्रशिक्षित देखभालकर्मियों की व्यवस्था जरूरी है।


अदमापुर वृद्धाश्रम की घटना एक महत्वपूर्ण संदेश देती है कि संवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था और बेहतर संचालन से बुजुर्गों के जीवन में बड़ा बदलाव लाया जा सकता है। यदि केवल दो दिनों में दिनचर्या में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देने लगे हैं, तो निरंतर निगरानी और जिम्मेदार संचालन से यहां रहने वाले बुजुर्गों को और बेहतर वातावरण दिया जा सकता है। सामाजिक सुरक्षा कोषांग और संस्था की जिम्मेदारी अब केवल व्यवस्था चलाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। बुजुर्गों की शिकायतों को सुनना, उनकी जरूरतों का नियमित आकलन करना और यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि भविष्य में कोई असमर्थ व्यक्ति केवल इसलिए कमरे में बंद न रहे क्योंकि वह अपने पैरों पर चलने में सक्षम नहीं है।


किसी भी समाज की संवेदनशीलता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करता है। जिन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा परिवार और समाज के लिए दिया, उनके बुढ़ापे को उपेक्षा और बंद कमरों में नहीं, बल्कि सम्मान, सुरक्षा और आत्मीयता के बीच गुजरना चाहिए। अदमापुर राजकीय वृद्धाश्रम में शुरू हुआ बदलाव इसलिए महज प्रशासनिक परिवर्तन नहीं माना जाना चाहिए। यह उस सोच में बदलाव का अवसर है, जिसमें बुजुर्गों को उनकी कमजोरियों से नहीं, बल्कि उनके अनुभव और गरिमा से देखा जाए। दो दिनों की यह शुरुआत यदि स्थायी व्यवस्था में बदलती है, तो सासाराम का यह वृद्धाश्रम वास्तव में उन बुजुर्गों के लिए “आश्रय” से आगे बढ़कर “अपना घर” बन सकता है।


एक टिप्पणी भेजें

0टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें (0)

#buttons=(Ok, Go it!) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Ok, Go it!
To Top