भागलपुर के नाथनगर स्थित मसकन बरारी में तैयार वृद्धाश्रम पिछले करीब पांच महीनों से विभागीय पेच में फंसा हुआ है। भवन तैयार है, सरकार का निर्देश भी जारी हो चुका है, लेकिन इसके बावजूद वृद्धाश्रम को समाज कल्याण विभाग के हवाले करने की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब बुजुर्गों के लिए जरूरी आधारभूत ढांचा तैयार है, तो आखिर उसे उपयोग में लाने में इतनी देरी क्यों हो रही है? सरकार की ओर से एक अप्रैल को ही निर्देश जारी किया गया था कि तैयार वृद्धाश्रम को समाज कल्याण विभाग को सौंपा जाए। इसके बाद उम्मीद थी कि विभागीय प्रक्रिया तेजी से पूरी होगी और वृद्धाश्रम में जरूरतमंद बुजुर्गों को आश्रय मिल सकेगा। लेकिन नगर निगम और संबंधित विभाग के बीच समन्वय की कमी के कारण हैंडओवर की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
वृद्धाश्रम का निर्माण इस उद्देश्य से किया गया है कि ऐसे बुजुर्गों को सुरक्षित और सम्मानजनक वातावरण उपलब्ध कराया जा सके, जिनके पास रहने या देखभाल की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। उम्र बढ़ने के साथ अकेलेपन, आर्थिक परेशानी और पारिवारिक सहारे की कमी जैसी समस्याएं कई बुजुर्गों के सामने आती हैं। ऐसे में सरकारी वृद्धाश्रम उनके लिए केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण का माध्यम बन सकते हैं। लेकिन मसकन बरारी का वृद्धाश्रम तैयार होने के बावजूद उपयोग में नहीं आ पा रहा है। भवन खाली पड़ा रहने से एक ओर सरकारी संसाधन का अपेक्षित लाभ लोगों को नहीं मिल रहा, वहीं दूसरी ओर जरूरतमंद बुजुर्गों को आश्रय के लिए इंतजार करना पड़ रहा है।
इस मामले में सबसे बड़ी समस्या नगर निगम और समाज कल्याण विभाग के बीच तालमेल की कमी को माना जा रहा है। सरकारी योजनाओं में भवन निर्माण के बाद उसे संबंधित विभाग को सौंपना और फिर वहां आवश्यक मानव संसाधन, फर्नीचर, भोजन, सुरक्षा तथा अन्य सुविधाओं की व्यवस्था करना सामान्य प्रक्रिया है। मसकन बरारी के वृद्धाश्रम के मामले में यही प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो सकी। पांच महीने का समय बीत जाने के बाद भी यदि हैंडओवर नहीं हुआ है, तो यह प्रशासनिक समन्वय की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है।
सरकारी कार्यालयों में कागजी प्रक्रिया आवश्यक है, क्योंकि इससे संपत्ति, जिम्मेदारी और संचालन से जुड़े अधिकार स्पष्ट होते हैं। लेकिन जब यही प्रक्रिया अत्यधिक लंबी हो जाए, तो उसका सीधा असर योजना के लाभार्थियों पर पड़ता है। वृद्धाश्रम जैसी सामाजिक कल्याण की योजना में देरी का अर्थ केवल एक भवन का बंद रहना नहीं है। इसका मतलब है कि जिन बुजुर्गों के लिए यह सुविधा तैयार की गई, उन्हें उसका लाभ नहीं मिल पा रहा है। इसलिए जरूरी है कि संबंधित विभाग आपसी समन्वय स्थापित कर लंबित औपचारिकताओं को शीघ्र पूरा करें।
भागलपुर में तैयार यह वृद्धाश्रम अब प्रशासनिक निर्णय और त्वरित कार्रवाई की प्रतीक्षा कर रहा है। सरकार की मंशा यदि बुजुर्गों को सम्मानजनक जीवन और सुरक्षित आश्रय उपलब्ध कराने की है, तो तैयार भवन को महीनों तक बंद रखना उस उद्देश्य को कमजोर करता है। जरूरत इस बात की है कि नगर निगम और समाज कल्याण विभाग जिम्मेदारी तय करते हुए हैंडओवर की प्रक्रिया जल्द पूरी करें। इसके बाद वृद्धाश्रम में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराकर इसे नियमित रूप से संचालित किया जाए। बुजुर्गों के लिए बनाया गया आश्रय कागजों में नहीं, जमीन पर काम आना चाहिए। पांच महीने का इंतजार अब खत्म होना चाहिए, ताकि मसकन बरारी का यह वृद्धाश्रम वास्तव में उन लोगों के लिए सहारे का घर बन सके, जिनके जीवन के इस पड़ाव पर सबसे अधिक जरूरत सुरक्षा, सम्मान और अपनत्व की है।

