कॉकरोच, जेनजी और दिमागी नक्सल के बीच बदलता राजनीतिक विमर्श

Jitendra Kumar Sinha
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आज का भारत केवल राजनीतिक घटनाओं का साक्षी नहीं है, बल्कि उन घटनाओं के इर्द-गिर्द निर्मित होते मिथकों, नैरेटिव और राजनीतिक विमर्शों का भी गवाह बन रहा है। किसी घटना का वास्तविक स्वरूप क्या है, उसके पीछे तथ्य कितने हैं और कल्पना कितनी, यह प्रश्न धीरे-धीरे पीछे छूटता जा रहा है। उसके स्थान पर एक नया प्रश्न खड़ा हो गया है कि कौन-सा नैरेटिव अधिक प्रभावशाली है? इसी संदर्भ में वर्तमान समय का एक विचित्र त्रिस्तरीय मिथक सामने आता दिखाई देता है- कॉकरोच, जेनजी और दिमागी नक्सल। ये तीनों शब्द अपने-अपने अर्थों और संदर्भों में अलग-अलग दिखाई देते हैं, लेकिन जब इन्हें मीडिया, सोशल मीडिया, न्यायालय, राजनीति और जनभावना के व्यापक परिदृश्य में देखा जाता है तो इनके बीच एक अजीब-सा संबंध दिखाई देने लगता है। कब कॉकरोच एक प्रतीक बन जाता है, कब जेनजी एक आंदोलन की संज्ञा से निकलकर राजनीतिक विमर्श बन जाता है और कब ‘दिमागी नक्सल’ जैसी अभिव्यक्ति किसी व्यक्ति या विचारधारा के बजाय पूरे वैचारिक समूह का परिचायक बना दी जाती है, यह तय करना आसान नहीं है और सबसे बड़ी विडंबना यह है कि मिथक जब बार-बार दोहराया जाता है तो वह कई बार तथ्य से भी अधिक प्रभावशाली हो जाता है।


लोकतंत्र में घटनाएं होती हैं, उन पर बहस होती है और फिर समाज किसी निष्कर्ष तक पहुंचता है। लेकिन डिजिटल युग में घटनाओं की यात्रा कुछ अलग हो गई है। अब घटना के साथ-साथ उसका वीडियो, उसका मीम, उसका हैशटैग, उसका राजनीतिक अर्थ और उसका विरोधी नैरेटिव भी जन्म लेता है। एक ही घटना को देखने के लिए दो अलग-अलग चश्मे सामने रख दिए जाते हैं। एक पक्ष कहता है कि यह परिवर्तन की शुरुआत है। दूसरा कहता है कि यह सुनियोजित अराजकता है। एक पक्ष इसे जनाक्रोश कहता है तो दूसरा इसे राजनीतिक प्रयोग। नतीजा यह होता है कि सत्य बीच में कहीं खड़ा रह जाता है और नैरेटिव दोनों ओर से उसे अपनी तरफ खींचने लगता है। कॉकरोच इसी प्रक्रिया का एक विचित्र प्रतीक बनकर उभरता है। एक मामूली जीव अचानक चर्चा के केंद्र में आ जाता है। उसके साथ राजनीतिक अर्थ जुड़ जाते हैं। सोशल मीडिया उसे अपने तरीके से व्याख्यायित करता है। मीडिया उसे अलग कोण से प्रस्तुत करता है और देखते ही देखते वह वास्तविक घटना से आगे निकलकर एक प्रतीकात्मक कथा का हिस्सा बन जाता है। यहीं से मिथक का जन्म होता है।


‘जेनजी’ शब्द मूलतः युवा पीढ़ी के संदर्भ में इस्तेमाल होता है। लेकिन जब किसी युवा आंदोलन को राजनीतिक और सामाजिक संदर्भों में देखा जाता है, तो उसके अर्थ तेजी से बदलने लगते हैं। नेपाल की जेनजी से जुड़े घटनाक्रमों को लेकर भारत में भी अलग-अलग तरह के विमर्श सामने आए। किसी ने इसे युवा असंतोष का संकेत माना, किसी ने डिजिटल पीढ़ी की बेचैनी का परिणाम बताया और किसी ने इसके भीतर व्यापक राजनीतिक संभावनाएं तलाशी। यहीं प्रश्न उठता है कि क्या किसी दूसरे देश में उभरा युवा आंदोलन भारत के सामाजिक-राजनीतिक मानस में उसी रूप में प्रवेश करता है, या भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया उसे अपने संदर्भों के अनुरूप नया अर्थ प्रदान करते हैं? मीडिया की भूमिका यहां अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। स्थापित मीडिया हो या गैर-स्थापित डिजिटल मीडिया, दोनों के पास जनता की चेतना को प्रभावित करने की शक्ति है। अंतर केवल माध्यम और प्रस्तुति का हो सकता है। एक समाचार चैनल किसी घटना को ब्रेकिंग न्यूज बनाता है तो सोशल मीडिया का कोई प्रभावशाली अकाउंट उसी घटना को कुछ सेकंड के वीडियो में बदल देता है। फिर दोनों मिलकर एक ऐसी कथा निर्मित कर सकते हैं, जिसमें मूल घटना पीछे और उसकी व्याख्या आगे आ जाती है। इसीलिए जेनजी केवल पीढ़ी का नाम नहीं रह जाती। वह एक राजनीतिक प्रतीक बन सकती है।


कॉकरोच का अपना कोई राजनीतिक एजेंडा नहीं होता। वह न चुनाव लड़ता है, न भाषण देता है और न किसी विचारधारा का समर्थन करता है। फिर भी जब किसी घटना के साथ उसका नाम जुड़ता है तो वह अचानक सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन सकता है। यही आधुनिक नैरेटिव की शक्ति है। एक प्रतीक की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वह अपने वास्तविक अर्थ से कहीं ज्यादा अर्थ ग्रहण कर सकता है। कॉकरोच का संदर्भ भी इसी दृष्टि से देखा जा सकता है। वह किसी घटना का छोटा-सा हिस्सा हो सकता है, लेकिन उसकी चर्चा पूरे घटनाक्रम पर छा सकती है। जब कोई विषय भारतीय न्यायिक संदर्भ से निकलकर अमेरिकी जमीन तक पहुंचता है और फिर विभिन्न माध्यमों के रास्ते भारत के अलग-अलग हिस्सों में चर्चा का विषय बनता है, तो यह केवल सूचना का प्रसार नहीं रहता। यह नैरेटिव का विस्तार बन जाता है। आज सूचना की यात्रा भौगोलिक सीमाओं से मुक्त है। अमेरिका में बैठा कोई व्यक्ति भारत की बहस को प्रभावित कर सकता है और भारत में चल रहा कोई विवाद कुछ ही मिनटों में दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में चर्चा का विषय बन सकता है। इसलिए अब सवाल यह नहीं है कि खबर कहां से शुरू हुई। सवाल यह है कि उस खबर को अर्थ किसने दिया?


‘नक्सल’ शब्द भारत के राजनीतिक और सुरक्षा विमर्श में लंबे समय से मौजूद है। लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ जैसी अभिव्यक्ति इसका एक अलग वैचारिक विस्तार प्रस्तुत करती है। यहां संघर्ष बंदूक का नहीं, विचार का बताया जाता है। जंगल का नहीं, दिमाग का बताया जाता है। लेकिन यही वह बिंदु है जहां बहस सबसे अधिक जटिल हो जाती है। किस विचार को राष्ट्रविरोधी कहा जाए? किस असहमति को वैचारिक विद्रोह माना जाए? आलोचना और षड्यंत्र के बीच सीमा कहां खींची जाए? लोकतंत्र में असहमति का स्थान अनिवार्य है। लेकिन लोकतंत्र को असहमति के नाम पर हिंसा, अराजकता और विघटन से भी बचाना होता है। समस्या तब पैदा होती है जब दोनों अवधारणाओं की सीमाएं धुंधली कर दी जाती हैं। यदि हर असहमति को नक्सलवाद कह दिया जाए तो लोकतांत्रिक बहस कमजोर होगी और यदि हर वैचारिक हिंसा को केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहकर छोड़ दिया जाए तो लोकतंत्र की सुरक्षा भी संकट में पड़ सकती है। यही वर्तमान विमर्श की सबसे बड़ी चुनौती है।


आज की राजनीतिक परिस्थितियों को यदि प्रतीकात्मक भाषा में देखें तो ऐसा लगता है कि लाल किले के प्राचीर से उठी कोई वैचारिक लहर समाज के विभिन्न हिस्सों में पहुंचकर अपना प्रभाव पैदा कर रही है। लेकिन किसी भी बड़ी राजनीतिक लहर का प्रभाव एकतरफा नहीं होता। उसके सामने दूसरी शक्ति भी खड़ी होती है। यहीं समुद्र मंथन का रूपक प्रासंगिक हो जाता है। एक ओर मंदराचल है, दूसरी ओर वासुकी। दोनों पक्ष अपनी-अपनी शक्ति लगा रहे हैं। रस्सी खिंच रही है। समुद्र मथा जा रहा है। लक्ष्य अमृत है, लेकिन इतिहास बताता है कि मंथन से केवल अमृत ही नहीं निकलता है बल्कि विष भी निकलता है। आज का राजनीतिक और वैचारिक मंथन भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। हर पक्ष स्वयं को अमृत का पक्षधर और दूसरे को विष का स्रोत मानता है। लेकिन संभव है कि वास्तविकता इतनी सरल न हो। कहीं अमृत भी हो सकता है और विष भी। कहीं सुधार की संभावना हो सकती है तो कहीं विनाश की आशंका।


इन तीनों प्रतीकों को यदि एक साथ रखा जाए तो स्पष्ट होता है कि लड़ाई केवल व्यक्तियों, दलों या संस्थाओं की नहीं है। यह विचार बनाम विचार की लड़ाई है। लेकिन इससे भी आगे बढ़कर यह मिथक बनाम मिथक की लड़ाई बनती जा रही है। एक पक्ष अपना मिथक गढ़ता है। दूसरा पक्ष उसके विरुद्ध अपना मिथक गढ़ता है। पहला पक्ष अपने मिथक को प्रमाण मानता है। दूसरा पक्ष अपने मिथक को सत्य का अंतिम रूप बताता है। धीरे-धीरे वास्तविक तथ्य दोनों मिथकों के बीच दब जाते हैं। यही वह स्थिति है जिससे लोकतांत्रिक समाज को सावधान रहने की आवश्यकता है। क्योंकि मिथक की सबसे बड़ी ताकत यह नहीं कि वह सत्य है। उसकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि लोग उसे सत्य मानने लगते हैं।


मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। लेकिन डिजिटल युग में मीडिया की भूमिका और जटिल हो गई है। पहले समाचार माध्यम सूचना देते थे। अब वे सूचना के साथ उसकी व्याख्या, प्राथमिकता और भावनात्मक प्रस्तुति भी निर्धारित करते हैं। किस खबर को पहले पन्ने पर जगह मिलेगी, किस वीडियो को बार-बार दिखाया जाएगा, किस शब्द को शीर्षक बनाया जाएगा और किस मुद्दे पर बहस होगी, ये सभी निर्णय जनता के मानस को प्रभावित करते हैं। सोशल मीडिया ने इस शक्ति को और विकेंद्रीकृत कर दिया है। अब हर व्यक्ति संभावित प्रकाशक है। हर मोबाइल कैमरा संभावित न्यूजरूम है। हर पोस्ट संभावित राजनीतिक संदेश है। इस वातावरण में स्थापित और गैर-स्थापित मीडिया के बीच की सीमा भी कई बार धुंधली हो जाती है और तब सवाल उठता है कि क्या मीडिया नैरेटिव का पीछा कर रहा है या नैरेटिव मीडिया का?


त्रिस्तरीय मिथक की सबसे खतरनाक अवस्था वह है जब वह इतना जटिल हो जाए कि उसकी कोई निश्चित व्याख्या संभव न रहे। एक घटना के दस वीडियो हो। दस वीडियो की दस व्याख्याएं हो। हर व्याख्या के पीछे दस विशेषज्ञ हो। हर विशेषज्ञ के पीछे अलग राजनीतिक दृष्टिकोण हो और हर दृष्टिकोण के समर्थन में सोशल मीडिया की हजारों पोस्ट हो। तब सामान्य नागरिक के सामने प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि सच क्या है? बल्कि प्रश्न यह हो जाता है कि किसे सच माना जाए? यहीं से मिथक रहस्य बनता है और रहस्य पहेली।


इन घटनाओं की सबसे गंभीर चिंता यह नहीं कि आज कौन-सा नैरेटिव मजबूत है। चिंता यह है कि इन नैरेटिवों की गति आगे किस दिशा में जाएगी। यदि राजनीतिक मतभेद विचारों तक सीमित रहें तो लोकतंत्र मजबूत होता है। यदि विचार मतभेद से संवाद पैदा करें तो समाज आगे बढ़ता है। लेकिन यदि विचार से शत्रुता, शत्रुता से अविश्वास और अविश्वास से सामाजिक विभाजन पैदा होने लगे तो स्थिति चिंताजनक हो जाती है। मिथकों की लड़ाई तब खतरनाक हो जाती है जब लोग तथ्यों की जांच करना बंद कर देते हैं और अपने-अपने मिथकों के सैनिक बन जाते हैं। तब हर विरोधी झूठा लगता है और अपना पक्ष ही पूर्ण सत्य। यही मानसिकता लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करती है।


आज का भारत एक बड़े वैचारिक मंथन के दौर से गुजर रहा है। कॉकरोच, जेनजी और दिमागी नक्स जैसे शब्द इस मंथन के अलग-अलग प्रतीक हो सकते हैं। इनके पीछे वास्तविक घटनाएं होंगी, राजनीतिक व्याख्याएं होगी, मीडिया की भूमिका होगी और सोशल मीडिया की अपनी गति होगी। लेकिन अंतिम प्रश्न वही रहेगा कि इस मंथन से निकलेगा क्या? क्या इससे लोकतांत्रिक चेतना का अमृत निकलेगा? क्या इससे नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझने का अवसर मिलेगा? क्या इससे मीडिया की भूमिका पर गंभीर आत्ममंथन होगा? क्या इससे असहमति और राष्ट्रहित के बीच संतुलन तलाशा जाएगा? या फिर इससे अविश्वास, कटुता, विभाजन और वैचारिक विष निकलेगा? इसका उत्तर आज किसी के पास नहीं है। इतना अवश्य है कि यह कोई मामूली मजाक नहीं है। यह विचारों की लड़ाई है, नैरेटिव की लड़ाई है और अंततः समाज की सामूहिक चेतना की लड़ाई है। 


मिथक बनते हैं, टूटते हैं और फिर नए मिथक जन्म लेते हैं। लेकिन राष्ट्र का भविष्य मिथकों से नहीं, तथ्यों, विवेक और संवाद से तय होता है। इसलिए इस समय सबसे जरूरी है कि हम न कॉकरोच को केवल कॉकरोच मानकर रुके, न जेनजी को केवल एक पीढ़ी का नाम समझें और न ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों को बिना विवेक के अंतिम सत्य मान लें। हर प्रतीक के पीछे एक संदर्भ है। हर नैरेटिव के पीछे एक उद्देश्य हो सकता है। हर राजनीतिक विमर्श के पीछे एक दृष्टिकोण हो सकता है और हर मिथक के पीछे कहीं न कहीं एक अधूरा सत्य भी छिपा हो सकता है। जरूरत उस अधूरे सत्य को खोजने की है। क्योंकि जब समाज सवाल पूछना बंद कर देता है, तब मिथक शासन करने लगते हैं और जब समाज सवाल पूछता रहता है, तब मिथक चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हो, अंततः उन्हें तथ्यों के सामने अपनी परीक्षा देनी पड़ती है। मंदराचल घूम रहा है, वासुकी तन रही है, समुद्र मथा जा रहा है। अब देखना केवल यह है कि इतिहास की इस करवट से अमृत निकलता है या विष।


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