शिक्षा का उद्देश्य केवल डिग्री हासिल करना और रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को जीवन की चुनौतियों का सामना करने के योग्य बनाना भी है। इसी सोच को आगे बढ़ाते हुए मध्य प्रदेश के सभी सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों में यूथ रेडक्रॉस का गठन और संचालन अनिवार्य कर दिया गया है। इस पहल के तहत विद्यार्थियों को पढ़ाई के साथ स्वास्थ्य, सुरक्षा, प्राथमिक उपचार और आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने का प्रशिक्षण दिया जाएगा। इसके लिए विद्यार्थियों से हर महीने महज पांच रुपये का अंशदान लिया जाएगा।
यह छोटी-सी राशि विद्यार्थियों के भीतर सेवा, सहयोग और सामाजिक जिम्मेदारी की बड़ी भावना विकसित करने का माध्यम बन सकती है। खास बात यह है कि इस पहल के माध्यम से युवाओं को केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय उन्हें जरूरतमंदों की सहायता करने और संकट के समय दूसरों के काम आने के लिए तैयार करने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है।
आज के समय में सड़क दुर्घटनाओं, अचानक होने वाली स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, प्राकृतिक आपदाओं और अन्य आपातकालीन परिस्थितियों में समय पर सहायता मिलना बेहद जरूरी है। कई बार घटनास्थल पर मौजूद लोग मदद करना चाहते हैं, लेकिन सही जानकारी और प्रशिक्षण के अभाव में वे समझ नहीं पाते कि क्या करें। ऐसे में प्राथमिक उपचार और सीपीआर जैसी जीवनरक्षक तकनीकों का ज्ञान किसी के लिए जीवनदान साबित हो सकता है।
यूथ रेडक्रॉस के माध्यम से विद्यार्थियों को इन परिस्थितियों के प्रति जागरूक करने की दिशा में काम किया जा सकता है। पांच रुपये का मासिक अंशदान विद्यार्थियों पर आर्थिक बोझ डाले बिना उन्हें एक सामूहिक सामाजिक पहल से जोड़ने का प्रतीक है। हालांकि, इस व्यवस्था की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि एकत्रित राशि का उपयोग किस प्रकार किया जाता है और प्रशिक्षण की गुणवत्ता कितनी प्रभावी रहती है।
सीपीआर यानी कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन एक महत्वपूर्ण आपातकालीन प्रक्रिया है। जब किसी व्यक्ति का हृदय रक्त पंप करना बंद कर देता है, तब प्रशिक्षित व्यक्ति द्वारा समय पर सीपीआर दिए जाने से उसके बचने की संभावना बढ़ सकती है। ऐसी स्थिति में एंबुलेंस या चिकित्सा सहायता पहुंचने तक सही कदम उठाना बेहद महत्वपूर्ण होता है।
कॉलेजों में सीपीआर का व्यावहारिक प्रशिक्षण विद्यार्थियों को यह समझने में मदद कर सकता है कि किसी व्यक्ति के अचानक बेहोश होकर सामान्य रूप से सांस नहीं लेने पर क्या करना चाहिए, आपातकालीन सहायता कैसे बुलानी चाहिए और प्रशिक्षित होने पर छाती को दबाने की प्रक्रिया किस प्रकार करनी चाहिए।
प्रशिक्षण में यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए कि सीपीआर जैसी प्रक्रिया सही तकनीक से करना जरूरी है। इसलिए केवल व्याख्यान पर्याप्त नहीं होंगे। विद्यार्थियों को विशेषज्ञों की देखरेख में अभ्यास करने का अवसर मिलना चाहिए, ताकि जरूरत पड़ने पर वे घबराने के बजाय उचित कदम उठा सके।
महिला सुरक्षा आज शिक्षा संस्थानों के लिए एक महत्वपूर्ण विषय है। कॉलेजों में यूथ रेडक्रॉस की गतिविधियों के माध्यम से छात्राओं को व्यक्तिगत सुरक्षा, संकट की स्थिति में सहायता मांगने, प्राथमिक उपचार और उपलब्ध आपातकालीन सेवाओं की जानकारी देने की संभावनाएं हैं।
नारी सुरक्षा से संबंधित प्रशिक्षण का उद्देश्य केवल संभावित खतरे से बचाव तक सीमित नहीं होना चाहिए। छात्राओं में आत्मविश्वास बढ़ाना, असुरक्षित परिस्थितियों को पहचानने की समझ विकसित करना और जरूरत पड़ने पर उचित सहायता प्राप्त करने के तरीके बताना भी जरूरी है। साथ ही, छात्रों को महिलाओं के प्रति सम्मानजनक व्यवहार, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाया जाना चाहिए।
इस तरह की गतिविधियां कॉलेज परिसरों में सुरक्षित और सहयोगपूर्ण वातावरण बनाने में योगदान दे सकती हैं। हालांकि, नारी सुरक्षा से जुड़े किसी विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम की रूपरेखा और उसके अनिवार्य विषयों की जानकारी आधिकारिक दिशा-निर्देशों से स्पष्ट होना आवश्यक है।
यूथ रेडक्रॉस का उद्देश्य युवाओं को मानवीय सेवा और जनकल्याण की भावना से जोड़ना है। कॉलेजों में इसकी गतिविधियों को प्रभावी बनाया जाए तो विद्यार्थियों को रक्तदान के प्रति जागरूकता, स्वच्छता, स्वास्थ्य संबंधी सावधानियों, प्राथमिक उपचार और जरूरतमंद लोगों की सहायता जैसे विषयों से भी जोड़ा जा सकता है। इसके अलावा, बाढ़, आग, भूकंप और अन्य आपदाओं के समय राहत एवं बचाव कार्यों के बारे में बुनियादी जानकारी देना उपयोगी होगा। विद्यार्थियों को यह भी सिखाया जा सकता है कि आपदा के दौरान अफवाहों से कैसे बचें, सुरक्षित स्थान तक कैसे पहुंचें और प्रशासन तथा राहतकर्मियों के साथ सहयोग किस प्रकार करे।
ऐसी गतिविधियों से विद्यार्थियों में नेतृत्व क्षमता, अनुशासन, टीम भावना और मानवीय संवेदनशीलता विकसित हो सकती है। कॉलेज जीवन में सीखा गया यह व्यवहार भविष्य में भी उनके व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन का हिस्सा बन सकता है।
यूथ रेडक्रॉस का गठन अनिवार्य करना एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम है, लेकिन केवल समितियां बना देने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा। इसके लिए प्रत्येक कॉलेज में जिम्मेदार समन्वयक, प्रशिक्षित विशेषज्ञ और नियमित गतिविधियों की व्यवस्था जरूरी है।
प्रशिक्षण का वार्षिक कैलेंडर बनाया जाना चाहिए। विद्यार्थियों को नियमित अभ्यास कराया जाए और जरूरत पड़ने पर स्थानीय अस्पतालों, रेडक्रॉस इकाइयों, आपदा प्रबंधन विशेषज्ञों तथा अन्य संबंधित संस्थाओं का सहयोग लिया जाए। प्रशिक्षण पूरा करने वाले विद्यार्थियों की प्रगति का मूल्यांकन भी किया जाना चाहिए।
इसके साथ ही, हर महीने विद्यार्थियों से लिए जाने वाले पांच रुपये के अंशदान का पारदर्शी हिसाब रखना जरूरी होगा। राशि के संग्रह, उपयोग और उससे संचालित गतिविधियों की जानकारी विद्यार्थियों तथा संबंधित संस्थानों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इससे योजना के प्रति विश्वास बढ़ेगा और विद्यार्थियों को अपने योगदान का वास्तविक लाभ भी दिखाई देगा।
आज की शिक्षा व्यवस्था में कौशल विकास और रोजगार की तैयारी पर पर्याप्त चर्चा होती है, लेकिन जीवन बचाने वाले कौशलों का महत्व भी उतना ही है। एक विद्यार्थी परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त कर सकता है, लेकिन किसी दुर्घटना के समय उसकी छोटी-सी मदद भी किसी परिवार के लिए अमूल्य साबित हो सकती है।
मध्य प्रदेश के सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों तथा कॉलेजों में यूथ रेडक्रॉस का अनिवार्य गठन इसी दिशा में एक अवसर प्रदान करता है। पांच रुपये का मासिक अंशदान अपने आप में छोटा है, लेकिन इससे जुड़ा उद्देश्य व्यापक है। जरूरत इस बात की है कि इसे औपचारिकता के बजाय व्यावहारिक प्रशिक्षण और सामाजिक सेवा का सशक्त माध्यम बनाया जाए।
यदि कॉलेजों में विद्यार्थियों को सीपीआर, प्राथमिक उपचार, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा संबंधी विषयों का नियमित एवं गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षण मिलता है, तो वे केवल शिक्षित युवा नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक भी बनेंगे। अंततः शिक्षा की सार्थकता केवल ज्ञान अर्जित करने में नहीं, बल्कि उस ज्ञान का उपयोग किसी की जान बचाने, किसी संकटग्रस्त व्यक्ति की सहायता करने और समाज को बेहतर बनाने में है।

