सीमापार अपराध और आर्थिक नेटवर्क की चुनौती है नेपाल सीमा

Jitendra Kumar Sinha
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भारत और नेपाल के बीच संबंध केवल दो पड़ोसी देशों के राजनयिक संबंधों तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सामाजिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक और आर्थिक रिश्ते हैं। सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोगों के बीच आवागमन और संपर्क सामान्य जीवन का हिस्सा रहा है। यही कारण है कि भारत-नेपाल सीमा को दुनिया की विशिष्ट अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में गिना जाता है। लेकिन जिस खुली सीमा ने दोनों देशों के लोगों के बीच रिश्तों को सहज बनाया है, उसी व्यवस्था का दुरुपयोग आपराधिक और राष्ट्रविरोधी नेटवर्क करने की कोशिश कर सकते हैं। भारत और नेपाल के बीच लगभग 1,751 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम से होकर गुजरती है। गृह मंत्रालय के अनुसार यह भारत की महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सीमाओं में शामिल है। यह सीमा पारंपरिक अर्थों में पूरी तरह बाड़ से घिरी सीमा जैसी नहीं है। इसलिए इसकी सुरक्षा का स्वरूप भी अलग है। यहां चुनौती केवल घुसपैठ रोकने की नहीं है, बल्कि वैध आवाजाही और अवैध गतिविधियों के बीच अंतर करने की है। यही वजह है कि नेपाल सीमा की संवेदनशीलता को समझने के लिए सुरक्षा के साथ-साथ अर्थव्यवस्था, स्थानीय सामाजिक तंत्र, व्यापार, तस्करी और वित्तीय अपराधों को भी समझना जरूरी है।


भारत-नेपाल सीमा की सबसे बड़ी विशेषता इसकी खुली प्रकृति है। दोनों देशों के बीच लोगों की आवाजाही का ऐतिहासिक और संस्थागत आधार है। भारत सरकार के दस्तावेजों में भी भारत-नेपाल सीमा को खुली सीमा के रूप में वर्णित किया गया है। गृह मंत्रालय ने अतीत में स्पष्ट किया है कि इस सीमा की खुली प्रकृति के कारण आतंकवादियों और अपराधियों द्वारा इसके दुरुपयोग को रोकना एक सुरक्षा चुनौती है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि खुली सीमा का अर्थ कानूनविहीन सीमा नहीं है। सीमा के आर-पार वैध व्यापार, रोजगार, पारिवारिक संपर्क और सामाजिक संबंधों के साथ-साथ कानूनों और सीमा प्रबंधन के प्रावधान भी लागू होते हैं। समस्या तब पैदा होती है जब इसी सहज आवागमन का इस्तेमाल किसी आपराधिक नेटवर्क द्वारा किया जाता है। किसी व्यक्ति का सामान्य आवागमन अपने आप में संदेह का आधार नहीं हो सकता है, लेकिन यदि उसके साथ अवैध धन, मादक पदार्थ, तस्करी, फर्जी दस्तावेज या संगठित अपराध का नेटवर्क जुड़ा हो तो मामला सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर हो जाता है। यही कारण है कि नेपाल सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था का मूल सिद्धांत सामान्य नागरिकों की आवाजाही को बाधित किए बिना संदिग्ध गतिविधियों की पहचान करना है।


नेपाल सीमा की भौगोलिक प्रकृति भी इसकी सुरक्षा को जटिल बनाती है। यह सीमा पांच राज्यों से जुड़ी है और प्रत्येक क्षेत्र की सामाजिक, आर्थिक तथा भौगोलिक परिस्थितियां अलग हैं। गृह मंत्रालय के अनुसार 1,751 किलोमीटर की सीमा उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम से लगती है। कहीं पहाड़ी क्षेत्र हैं, कहीं मैदानी इलाका है और कहीं घनी आबादी तथा व्यापारिक गतिविधियां सीमा के बेहद करीब हैं। बिहार में तो सीमा के दोनों ओर लंबे समय से सामाजिक और आर्थिक संपर्क कायम है। इस तरह की सीमा पर केवल चौकियां बढ़ा देना पर्याप्त नहीं होता है। सुरक्षा व्यवस्था में स्थानीय जानकारी, तकनीक, खुफिया सूचनाओं, पुलिस-प्रशासन के समन्वय और दोनों देशों की एजेंसियों के बीच सहयोग की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है।


भारत-नेपाल सीमा की सुरक्षा में सशस्त्र सीमा बल यानि एसएसबी की प्रमुख भूमिका है। एसएसबी को भारत-नेपाल सीमा के लिए लीड इंटेलिजेंस एजेंसी की जिम्मेदारी भी दी गई है। उसके आधिकारिक विवरण के अनुसार बल का दायित्व सीमापार अपराध, अनधिकृत प्रवेश या निकास, तस्करी और अन्य अवैध गतिविधियों को रोकना है। इससे स्पष्ट होता है कि सीमा सुरक्षा केवल हथियारबंद निगरानी तक सीमित नहीं है। एसएसबी को स्थानीय लोगों के साथ संपर्क बनाए रखने, सूचनाएं जुटाने और सीमापार अपराधों को रोकने की जिम्मेदारी भी निभानी होती है। नेपाल सीमा पर सुरक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सीमा के दोनों ओर रहने वाले सामान्य लोगों की गतिविधियों और संगठित अपराधियों की गतिविधियों में अंतर किया जाए।


खुली सीमा का दुरुपयोग केवल वित्तीय अपराधों तक सीमित नहीं है। तस्करी और मादक पदार्थों की आवाजाही भी सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती रही है। गृह मंत्रालय के एक आधिकारिक अध्ययन में भारत-नेपाल सीमा की खुली और अपेक्षाकृत पारगम्य प्रकृति को मादक पदार्थों की सीमापार तस्करी के लिए चुनौती बताया गया है। इसमें रुपईडीहा-नेपालगंज जैसे व्यापार एवं आवागमन मार्गों का उल्लेख भी मिलता है। मादक पदार्थों की तस्करी और अवैध धन का संबंध भी कई मामलों में सामने आता है। किसी संगठित नेटवर्क के लिए केवल सामान को एक देश से दूसरे देश पहुंचाना ही उद्देश्य नहीं होता; उसके पीछे धन का संग्रह, भुगतान, निवेश और धन को वैध दिखाने की प्रक्रिया भी हो सकती है। यहीं से सीमा सुरक्षा और वित्तीय निगरानी एक-दूसरे से जुड़ जाती है।


हवाला का मूल उद्देश्य औपचारिक बैंकिंग प्रणाली से बाहर धन का हस्तांतरण करना होता है। जब इसका इस्तेमाल वैध व्यापार या पारिवारिक जरूरतों के बजाय अपराध से अर्जित धन को एक स्थान से दूसरे स्थान पहुंचाने के लिए किया जाता है, तो यह गंभीर वित्तीय अपराध का रूप ले सकता है। सीमावर्ती क्षेत्रों में बड़ी मात्रा में नकदी का असामान्य आवागमन, संदिग्ध खातों के बीच लेन-देन, ऐसे कारोबार जिनका वास्तविक आर्थिक आधार स्पष्ट नहीं हो और अलग-अलग व्यक्तियों के बीच असामान्य वित्तीय संबंध, ये सभी संकेत जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। हालांकि, केवल अचानक किसी व्यक्ति के खाते में बड़ी रकम आने या किसी क्षेत्र में आर्थिक गतिविधि बढ़ने से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि वह गतिविधि अवैध है। इसके लिए दस्तावेज, लेन-देन का स्रोत, कारोबारी गतिविधि और संबंधित व्यक्तियों के बीच संबंधों की जांच आवश्यक होती है। यही फर्क खुफिया निगरानी और सामान्य धारणा के बीच है।


आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था में अपराधियों का पीछा केवल सीमा पर नहीं किया जाता है। धन जिस रास्ते से चलता है, उसकी निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो गई है। यदि किसी आपराधिक नेटवर्क के पास धन का मजबूत स्रोत है, तो वह परिवहन, संचार, लोगों की भर्ती, तस्करी और दूसरे गैरकानूनी कार्यों को जारी रख सकता है। इसके विपरीत, धन के स्रोत और प्रवाह पर चोट करने से पूरे नेटवर्क की क्षमता प्रभावित हो सकती है। इसी कारण वित्तीय खुफिया जानकारी और बैंकिंग लेन-देन से जुड़ी सूचनाएं सुरक्षा तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी हैं। सीमा क्षेत्र में अचानक बढ़े बड़े वित्तीय लेन-देन को भी इसी व्यापक संदर्भ में देखा जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हर बड़ा लेन-देन संदिग्ध है। लेकिन जब वित्तीय गतिविधि के साथ संदिग्ध व्यक्तियों, फर्जी कारोबार, तस्करी या अन्य अपराधों के संकेत भी मिलते हैं, तब जांच का दायरा बढ़ सकता है।


अघोषित आय या ऐसे धन के मामले में जिसका स्रोत संतोषजनक रूप से स्पष्ट नहीं किया जा सकता, आयकर कानून में अलग-अलग प्रावधान है। आयकर अधिनियम की धारा 69A के तहत यदि किसी व्यक्ति के पास धन, बुलियन, आभूषण या अन्य मूल्यवान वस्तु पाई जाती है और वह उसकी प्रकृति एवं स्रोत की संतोषजनक व्याख्या नहीं कर पाता, तो निर्धारित परिस्थितियों में उसे उस वित्तीय वर्ष की आय माना जा सकता है। इसी तरह धारा 132 तलाशी और जब्ती की कानूनी व्यवस्था से संबंधित है। कानून में निर्धारित शर्तों के तहत अघोषित आय या संपत्ति से संबंधित सामग्री की तलाशी और जब्ती की कार्रवाई की जा सकती है। इसका अर्थ यह है कि सीमावर्ती क्षेत्र में यदि किसी वित्तीय गतिविधि के बारे में वैधानिक जांच की जरूरत पैदा होती है, तो मामला केवल सीमा सुरक्षा बल की कार्रवाई तक सीमित नहीं रहता है। परिस्थितियों के अनुसार, आयकर विभाग और अन्य वित्तीय जांच एजेंसियां भी अपनी-अपनी कानूनी शक्तियों के तहत कार्रवाई कर सकती हैं।


धन शोधन यानि मनी लॉन्ड्रिंग का मामला तब अलग रूप लेता है जब धन किसी निर्धारित अपराध से प्राप्त आय यानि ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ से जुड़ा हो। प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार उसका प्रमुख दायित्व विदेशी मुद्रा प्रबंधन और धन शोधन विरोधी कानूनों को लागू करना है। एजेंसी पीएमएलए के तहत अपराध से प्राप्त आय की पहचान, उसे सुरक्षित करने और धन को वैध वित्तीय प्रणाली में शामिल होने से रोकने की कार्रवाई करती है। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि किसी भी अघोषित धन पर अपने आप पीएमएलए लागू नहीं हो जाता है। पीएमएलए की कार्रवाई के लिए कानून में निर्धारित शर्तों और किसी अनुसूचित अपराध से जुड़े ‘प्रोसीड्स ऑफ क्राइम’ का संबंध महत्वपूर्ण होता है। सीमा क्षेत्र में यही कारण है कि वित्तीय अपराध की जांच और मूल आपराधिक गतिविधि की जांच कई बार एक-दूसरे से जुड़ सकती है।


यदि किसी वित्तीय नेटवर्क का संबंध आतंकवादी गतिविधियों, आतंकवादी संगठन या गैरकानूनी गतिविधियों से स्थापित होता है, तो मामला केवल आर्थिक अपराध तक सीमित नहीं रहता है। विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप (निवारण) अधिनियम यानि यूएपीए में आतंकवादी गतिविधियों से संबंधित कई प्रावधान हैं। भारत कोड के आधिकारिक विवरण में धारा 15 आतंकवादी कृत्य और धारा 17 आतंकवादी कृत्य के लिए धन जुटाने से संबंधित है। इसलिए किसी सीमा क्षेत्र में संदिग्ध वित्तीय नेटवर्क की जांच का महत्व तब और बढ़ जाता है जब उसके तार संगठित अपराध या आतंकवादी गतिविधियों से जुड़ने के प्रमाण सामने आएं। लेकिन यहां भी कानूनी प्रक्रिया का महत्व सर्वोपरि है। किसी व्यक्ति, संस्था या कारोबारी गतिविधि को केवल संदेह के आधार पर राष्ट्रविरोधी घोषित करना उचित नहीं है। आरोप, जांच और न्यायिक निष्कर्ष, इन तीनों के बीच अंतर बनाए रखना लोकतांत्रिक और कानूनी व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है।


सीमा क्षेत्रों में आबादी की संरचना में बदलाव का मुद्दा अक्सर सुरक्षा बहस का हिस्सा बनता है। लेकिन इस विषय पर चर्चा करते समय आंकड़ों और प्रमाणों का सहारा लेना जरूरी है। जनसंख्या में बदलाव के अनेक कारण हो सकते हैं, प्राकृतिक जनसंख्या वृद्धि, रोजगार के लिए पलायन, विवाह, शहरीकरण, शिक्षा, व्यापार और वैध सीमापार आवागमन। इसलिए किसी क्षेत्र में किसी समुदाय की आबादी बढ़ने मात्र से अवैध घुसपैठ या राष्ट्रविरोधी गतिविधि का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। सुरक्षा एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण बात यह होती है कि क्या किसी व्यक्ति या समूह की गतिविधि कानून के विरुद्ध है, क्या उसके पास वैध दस्तावेज हैं, क्या वह संगठित अपराध से जुड़ा है और क्या उसके वित्तीय या संचार संबंध किसी आपराधिक नेटवर्क की ओर संकेत करते हैं। इस अंतर को बनाए रखना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि सीमा क्षेत्रों में रहने वाले लाखों सामान्य नागरिकों का जीवन सीमा की विशेष परिस्थितियों से प्रभावित होता है।


भारत-नेपाल संबंधों की मजबूती का एक आधार दोनों देशों के नागरिकों के बीच गहरे सामाजिक रिश्ते हैं। इसलिए सीमा प्रबंधन का उद्देश्य सामान्य नागरिकों के जीवन को कठिन बनाना नहीं, बल्कि अवैध गतिविधियों को रोकना होना चाहिए। भारत और नेपाल ने सीमापार अपराध, अनधिकृत व्यापार और अन्य अवैध गतिविधियों को रोकने के लिए सहयोग की व्यवस्थाएं भी विकसित की हैं। 2009 के भारत-नेपाल समझौते में दोनों देशों ने सीमा के आर-पार अवैध व्यापार को रोकने तथा सीमा शुल्क, मादक पदार्थ, विदेशी मुद्रा और विदेशी व्यापार से जुड़े नियमों के उल्लंघन पर सहयोग, जांच और सूचनाओं के आदान-प्रदान की बात स्वीकार की थी। इससे स्पष्ट है कि नेपाल सीमा की सुरक्षा का समाधान केवल एक देश की कार्रवाई से संभव नहीं है। दोनों देशों की एजेंसियों के बीच समन्वय आवश्यक है।


आज सीमा सुरक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। जहां भौतिक बाड़ लगाना संभव नहीं या व्यावहारिक नहीं है, वहां तकनीकी निगरानी, संचार नेटवर्क, सेंसर, कैमरा, ड्रोन और डेटा आधारित विश्लेषण जैसी व्यवस्थाओं का महत्व बढ़ रहा है। गृह मंत्रालय की सीमा प्रबंधन व्यवस्था में भी तकनीकी समाधान, सीमा चौकियों, सड़कों और अन्य बुनियादी ढांचे को मजबूत करने पर जोर दिया गया है। नेपाल सीमा के संदर्भ में तकनीक का सबसे बड़ा लाभ यह हो सकता है कि निगरानी को अधिक लक्षित बनाया जाए। इसका उद्देश्य हर नागरिक को संदिग्ध मानना नहीं, बल्कि वास्तविक जोखिम वाले पैटर्न की पहचान करना होना चाहिए।


सीमा सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर कम चर्चित पहलू स्थानीय समुदाय है। सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोग अपने क्षेत्र की गतिविधियों को सबसे करीब से देखते हैं। यदि प्रशासन और सुरक्षा एजेंसियां स्थानीय नागरिकों के साथ विश्वास का संबंध कायम करती हैं, तो संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी समय रहते मिल सकती है। एसएसबी की आधिकारिक भूमिका में भी सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों में सुरक्षा की भावना पैदा करने और स्थानीय स्तर पर संपर्क बनाए रखने की बात शामिल है। इसलिए सीमा सुरक्षा को केवल बंदूक और चौकी के नजरिए से देखना अधूरा होगा। सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार, रोजगार और प्रशासनिक पहुंच भी लंबे समय में सीमा सुरक्षा को मजबूत करते हैं।


सीमावर्ती इलाकों में आर्थिक अवसरों की कमी होने पर अवैध गतिविधियों के लिए जगह बन सकती है। यदि स्थानीय युवाओं के पास वैध रोजगार और कारोबार के अवसर हैं, तो संगठित तस्करी नेटवर्क के लिए स्थानीय लोगों को अपने साथ जोड़ना अपेक्षाकृत कठिन हो सकता है। इसलिए सीमा विकास और सीमा सुरक्षा को अलग-अलग विषय मानने के बजाय एक-दूसरे से जुड़ा हुआ देखना चाहिए। बेहतर सड़कें, वैध व्यापार केंद्र, बैंकिंग सुविधा, डिजिटल भुगतान, दस्तावेजीकरण और प्रशासनिक सेवाओं की पहुंच न केवल विकास को गति देती है, बल्कि आर्थिक गतिविधियों को अधिक पारदर्शी भी बना सकती है।


नेपाल सीमा को लेकर समय-समय पर यह सवाल उठता है कि क्या खुली सीमा को पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। लेकिन ऐसा कदम भारत-नेपाल के ऐतिहासिक सामाजिक और आर्थिक संबंधों पर व्यापक प्रभाव डाल सकता है। खुली सीमा दोनों देशों के नागरिकों के लिए कई वैध सुविधाएं उपलब्ध कराती है। इसलिए चुनौती यह है कि खुलेपन और सुरक्षा के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। एक प्रभावी सीमा व्यवस्था वह होगी जिसमें सामान्य नागरिकों के लिए वैध आवाजाही यथासंभव सहज रहे, जबकि अपराधियों, तस्करों और संगठित नेटवर्क के लिए जोखिम बढ़े।


आज सुरक्षा का अर्थ केवल यह देखना नहीं है कि कौन व्यक्ति सीमा पार कर रहा है। यह भी देखना जरूरी है कि कौन सा धन कहां से आ रहा है, कहां जा रहा है और किस उद्देश्य से इस्तेमाल हो रहा है। यदि किसी आपराधिक नेटवर्क का वास्तविक आधार सीमा के किसी गांव में नहीं बल्कि किसी दूसरे शहर या देश में है, तो केवल सीमा चौकी पर निगरानी करके पूरे नेटवर्क को समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए वित्तीय जांच, डिजिटल साक्ष्य, बैंकिंग डेटा, संचार संबंध और अंतर-एजेंसी सहयोग आवश्यक है। यही आधुनिक सीमा सुरक्षा का महत्वपूर्ण परिवर्तन है, सीमा की सुरक्षा अब जमीन की रेखा के साथ-साथ सूचना और धन के प्रवाह की निगरानी का विषय भी बन चुकी है।


भारत-नेपाल सीमा संवेदनशील है क्योंकि इसकी प्रकृति अन्य कई अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से अलग है। लगभग 1,751 किलोमीटर लंबी यह सीमा पांच भारतीय राज्यों से जुड़ी है और इसके बड़े हिस्से में सामाजिक तथा आर्थिक संपर्क बेहद गहरा है। यही खुलापन इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सुरक्षा प्रबंधन के लिए चुनौती भी। राष्ट्रविरोधी या आपराधिक तत्व यदि इस व्यवस्था का दुरुपयोग कर अवैध व्यापार, मादक पदार्थों की तस्करी, फर्जी दस्तावेज, हवाला या धन शोधन जैसी गतिविधियां संचालित करने की कोशिश करते हैं, तो उनसे निपटने के लिए सीमा सुरक्षा के साथ वित्तीय और खुफिया तंत्र को भी सक्रिय रहना पड़ता है। आयकर कानून के तहत अघोषित धन और संपत्ति की जांच, पीएमएलए के तहत अपराध से प्राप्त आय से जुड़े मामलों की कार्रवाई तथा परिस्थितियों के अनुसार यूएपीए जैसे कानूनों का इस्तेमाल, ये सभी अलग-अलग कानूनी ढांचे हैं और इनका प्रयोग निर्धारित शर्तों के अनुसार ही होता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि सीमा की सुरक्षा और सामान्य नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन बना रहे। नेपाल भारत का पड़ोसी ही नहीं, बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक-सांस्कृतिक रिश्तों वाला देश है। इसलिए सीमा प्रबंधन का लक्ष्य दोनों देशों के नागरिकों के बीच विश्वास को कमजोर करना नहीं, बल्कि अपराध और अवैध नेटवर्क के लिए रास्ते बंद करना होना चाहिए। नेपाल सीमा की सुरक्षा का वास्तविक सूत्र शायद यही है कि लोगों के लिए सीमा सहज, अपराधियों के लिए कठिन और अवैध धन के लिए पारदर्शिता अनिवार्य। तभी खुली सीमा अपनी सामाजिक उपयोगिता बनाए रखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए मजबूत व्यवस्था का हिस्सा बन सकती है।


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