ज्ञान बढ़ रहा है, लेकिन विनम्रता क्यों घट रही है?

Jitendra Kumar Sinha
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आधुनिक युग में शिक्षा का विस्तार तेजी से हो रहा है। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ रही है। विद्यार्थी बड़ी-बड़ी डिग्रियां हासिल कर रहे हैं और विज्ञान, तकनीक तथा प्रबंधन के क्षेत्र में नई ऊंचाइयां छू रहे हैं। इसके बावजूद एक महत्वपूर्ण प्रश्न आज भी हमारे सामने खड़ा है कि क्या शिक्षा के साथ मनुष्य के भीतर विनम्रता, सहनशीलता और संस्कारों का भी विकास हो रहा है? ज्ञान की बढ़ती चमक के बीच नम्रता का कम होना समाज के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है। विजयपुर स्थित श्री जगवल्लभ पार्श्व भवन में आयोजित संबोधि वर्षावास के अंतर्गत धर्मसभा को संबोधित करते हुए गणिप्रवर मेहुलप्रभसागर ने जीवन, ज्ञान, निष्काम कर्म और विनम्रता के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मानव जीवन प्रभु-भक्ति और निष्काम कर्म के लिए प्राप्त हुआ है। मनुष्य को फल की अपेक्षा किए बिना अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए। जीवन में धैर्य और प्रतीक्षा का विशेष महत्व है, क्योंकि लक्ष्य की प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयास और संयम आवश्यक है।


गणिप्रवर मेहुलप्रभसागर ने भगवान महावीर और गौतम स्वामी के संवाद का उल्लेख करते हुए बताया कि सच्चा ज्ञान केवल पुस्तकों को पढ़ लेने या शास्त्रों का अध्ययन कर लेने से प्राप्त नहीं होता है। ज्ञान की वास्तविक सार्थकता तब प्रकट होती है, जब वह मनुष्य के व्यवहार, विचार और आचरण में दिखाई देता है। पुस्तकें हमें तथ्यों और सिद्धांतों से परिचित कराती हैं, लेकिन उन सिद्धांतों को जीवन में उतारने के लिए विनम्रता, जिज्ञासा और गुरु का सानिध्य आवश्यक है। जो व्यक्ति स्वयं को सर्वज्ञ मान लेता है, उसके सीखने की प्रक्रिया वहीं रुक जाती है। इसके विपरीत, विनम्र व्यक्ति दूसरों के अनुभवों से सीखता है, अपनी गलतियों को स्वीकार करता है और निरंतर स्वयं को बेहतर बनाने का प्रयास करता है। ज्ञान का उद्देश्य केवल दूसरों से आगे निकलना नहीं है, बल्कि अपने भीतर की कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करना भी है। यही दृष्टिकोण शिक्षा को संस्कारों से जोड़ता है।


आज की शिक्षा व्यवस्था में अच्छे अंक, प्रतिष्ठित संस्थानों में प्रवेश, ऊंचे पद और बेहतर रोजगार सफलता के प्रमुख मानक बन गए हैं। इन उपलब्धियों का अपना महत्व है, लेकिन यदि इनके साथ विनम्रता, संवेदनशीलता और नैतिकता का विकास नहीं होता, तो शिक्षा अधूरी रह जाती है। किसी व्यक्ति की वास्तविक श्रेष्ठता उसकी डिग्रियों, संपत्ति या पद से ही निर्धारित नहीं होती। उसका व्यवहार, दूसरों के प्रति सम्मान और कठिन परिस्थितियों में उसका संयम भी उसकी पहचान बनाते हैं। शिक्षा का उद्देश्य ऐसे नागरिक तैयार करना होना चाहिए, जो अपनी योग्यता का उपयोग समाज के कल्याण के लिए करें। विद्यार्थी अपने शिक्षकों का सम्मान करें, सहपाठियों के प्रति सहयोग की भावना रखें और असहमति के समय भी मर्यादा बनाए रखें। परिवार और शिक्षण संस्थानों में इन मूल्यों को प्रोत्साहित करना समय की आवश्यकता है।


गणिप्रवर मेहुलप्रभसागर ने चेताया है कि धन, पद और विद्वत्ता का अहंकार वास्तविक ज्ञान की राह में बाधा बनता है। जब व्यक्ति अपनी उपलब्धियों को ही अपनी संपूर्ण पहचान मानने लगता है, तब वह दूसरों की योग्यता और विचारों को कमतर आंकने लगता है। अहंकार मनुष्य को अपनी कमियां देखने से रोकता है। वह आलोचना को सुधार का अवसर मानने के बजाय अपमान समझने लगता है। धीरे-धीरे उसके संबंधों में कटुता और व्यवहार में कठोरता आने लगती है। इसके विपरीत, विनम्रता व्यक्ति को कमजोर नहीं बनाती, बल्कि उसे अधिक विवेकशील और परिपक्व बनाती है। विनम्र व्यक्ति अपनी उपलब्धियों पर गर्व कर सकता है, लेकिन दूसरों का अपमान किए बिना। वह अपने ज्ञान का उपयोग मार्गदर्शन के लिए करता है, न कि किसी को छोटा साबित करने के लिए।


धर्मसभा में मुनि मयूखप्रभसागर ने कहा कि अहंकार का त्याग किए बिना समता और आत्म-साधना का वास्तविक सुख प्राप्त नहीं हो सकता। उन्होंने आत्मिक विकास में बाधा बनने वाले क्रोध, मान, माया, लोभ, राग और द्वेष जैसे विकारों से बचने की आवश्यकता पर बल दिया। क्रोध विवेक को प्रभावित करता है, मान अर्थात अहंकार व्यक्ति को दूसरों से दूर करता है, माया व्यवहार में छल-कपट को बढ़ाती है और लोभ कभी संतुष्ट नहीं होने देता। इसी प्रकार राग और द्वेष मन में पक्षपात तथा अशांति को जन्म देते हैं। इन प्रवृत्तियों पर नियंत्रण के लिए आत्मचिंतन, संयम और नियमित साधना आवश्यक है। आत्मिक शांति बाहरी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि मन की निर्मलता और संतुलित दृष्टिकोण से प्राप्त होती है। जो व्यक्ति अपनी इच्छाओं और प्रतिक्रियाओं पर नियंत्रण रखना सीख लेता है, वह कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य बनाए रख सकता है।


जीवन में सफलता पाने के लिए परिश्रम जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है परिणाम के प्रति संतुलित दृष्टिकोण। हर प्रयास का फल तुरंत नहीं मिलता। कई बार असफलताएं मनुष्य की परीक्षा लेती हैं, लेकिन धैर्य और निरंतरता उसे आगे बढ़ने की शक्ति देते हैं। निष्काम कर्म का अर्थ कर्तव्य से विमुख होना नहीं, बल्कि परिणाम की अत्यधिक चिंता में उलझे बिना ईमानदारी से अपना कार्य करना है। विद्यार्थी मन लगाकर अध्ययन करें, शिक्षक समर्पण से पढ़ाएं और समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारियां निष्ठापूर्वक निभानी चाहिए। जब कर्म में ईमानदारी, विचारों में शुद्धता और व्यवहार में विनम्रता जुड़ जाती है, तब जीवन की सफलता अधिक व्यापक और सार्थक बनती है।


आज आवश्यकता केवल शिक्षित समाज बनाने की नहीं, बल्कि संस्कारित और संवेदनशील समाज के निर्माण की भी है। शिक्षा के साथ विनम्रता, ज्ञान के साथ विवेक और सफलता के साथ सेवा-भाव का विकास होना चाहिए। गणिप्रवर मेहुलप्रभसागर और मुनि मयूखप्रभसागर के संदेश का मूल भाव यही है कि मनुष्य अपनी उपलब्धियों के बीच भी अपनी सीमाओं को पहचाने, सीखने की जिज्ञासा बनाए रखे और दूसरों के प्रति सम्मान का भाव रखे। सच्चा ज्ञानी वह नहीं, जो केवल बहुत कुछ जानता है, बल्कि वह है जो अपने ज्ञान के बावजूद विनम्र बना रहता है। जिस दिन शिक्षा मनुष्य को अहंकार के बजाय आत्मचिंतन, प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग और स्वार्थ के बजाय कर्तव्य की प्रेरणा देने लगेगी, उसी दिन उसका वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा। विनम्रता ही वह गुण है, जो ज्ञान को चरित्र में और चरित्र को जीवन की सार्थकता में बदल देता है।


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