‘केरलम् सीनियर सिटीजंस बिल, 2026' सर्वसम्मति से पारित - बुजुर्गों को सताया तो तीन साल की जेल

Jitendra Kumar Sinha
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जीवन की सबसे बड़ी पूंजी धन-दौलत या संपत्ति नहीं है, बल्कि परिवार का साथ, अपनों का स्नेह और सम्मान है। बचपन में जो माता-पिता अपनी संतान की उंगली पकड़कर उसे चलना सिखाते हैं, वही माता-पिता जब वृद्धावस्था में दूसरों के सहारे की जरूरत महसूस करते हैं, तो उनके लिए संतान का व्यवहार जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा बन जाता है। विडंबना यह है कि जिन बच्चों के भविष्य को संवारने में माता-पिता अपना पूरा जीवन लगा देते हैं, कभी-कभी उन्हीं के हाथों उन्हें अपमान, उपेक्षा, मानसिक प्रताड़ना और संपत्ति संबंधी विवादों का सामना करना पड़ता है।


बदलते सामाजिक परिवेश में बुजुर्गों की यह पीड़ा एक गंभीर सामाजिक चुनौती बनती जा रही है। ऐसे में केरलम विधानसभा द्वारा वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल, सुरक्षा और अधिकारों से संबंधित ‘केरलम सीनियर सिटीजंस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल, 2026’ को सर्वसम्मति से पारित किया जाना एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आया है। इस विधेयक का मूल संदेश स्पष्ट है कि बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार, उनकी संपत्ति पर अवैध कब्जा और उन्हें बेसहारा छोड़ना केवल पारिवारिक मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।


विधेयक में विभिन्न अपराधों के लिए तीन साल तक की कैद और 50 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान बताया गया है। इसके साथ ही देखभाल केंद्रों के नियमन, बुजुर्गों की स्वतंत्रता, उपचार संबंधी इच्छाओं और शोषण से सुरक्षा पर भी जोर दिया गया है। यह पहल समाज को याद दिलाती है कि माता-पिता की सेवा केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि उनके अधिकारों और गरिमा से जुड़ा विषय भी है।


भारतीय समाज में माता-पिता को परिवार की नींव और बुजुर्गों को अनुभव का भंडार माना जाता है। संयुक्त परिवारों की परंपरा में दादा-दादी और नाना-नानी बच्चों के संस्कार, पारिवारिक इतिहास और जीवन-मूल्यों के संवाहक रहे हैं। उनके अनुभव परिवार को कठिन परिस्थितियों में रास्ता दिखाते हैं। लेकिन शहरीकरण, रोजगार के लिए पलायन, एकल परिवारों के विस्तार और बदलती जीवनशैली ने पारिवारिक संबंधों की प्रकृति को भी प्रभावित किया है। आज अनेक बुजुर्ग ऐसे हैं जिनके बच्चे दूसरे शहरों या देशों में रहते हैं। दूरी अपने आप में समस्या नहीं है, लेकिन जब संपर्क, देखभाल और जिम्मेदारी का भाव कमजोर पड़ जाता है, तब अकेलापन गहराने लगता है। कुछ बुजुर्ग आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद भावनात्मक सहारे से वंचित रहते हैं। वहीं, कुछ लोगों को बीमारी, निर्भरता और सीमित आय के कारण दूसरों पर आश्रित होना पड़ता है।


चिंताजनक स्थिति तब पैदा होती है जब बुजुर्गों को घर में अपमानित किया जाता है, उनकी जरूरतों की अनदेखी होती है या उनकी संपत्ति अपने नाम कराने के लिए दबाव डाला जाता है। शारीरिक हिंसा दिखाई दे सकती है, लेकिन मानसिक प्रताड़ना अक्सर चारदीवारी के भीतर छिपी रहती है। अपमानजनक शब्द, धमकी, आर्थिक नियंत्रण, सामाजिक संपर्कों पर रोक और जानबूझकर उपेक्षा भी बुजुर्गों के जीवन को प्रभावित करती है। ऐसी परिस्थितियों में कानून की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। केरलम का प्रस्तावित कानूनी ढांचा इसी विचार को मजबूत करता है कि उम्र बढ़ने के साथ किसी व्यक्ति के अधिकार कम नहीं होते। बुजुर्ग भी स्वतंत्रता, सुरक्षा और सम्मान के उतने ही अधिकारी हैं, जितने समाज के अन्य नागरिक।


विधेयक की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में बुजुर्गों के साथ दुर्व्यवहार और उनके शोषण के विरुद्ध कठोर दंड का प्रावधान शामिल है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, बुजुर्गों की संपत्ति पर कब्जा करने, उनके साथ क्रूरता या दुर्व्यवहार करने तथा उन्हें बेसहारा छोड़ने जैसे कृत्यों पर तीन साल तक की कैद और 50 हजार रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है। यह प्रावधान उन लोगों के लिए चेतावनी है जो बुजुर्गों की असहायता को अपनी मनमानी का अवसर समझते हैं। माता-पिता की संपत्ति पर अधिकार जताने का अर्थ यह नहीं कि उनकी इच्छा, स्वतंत्रता और जीवन की जरूरतों को नजरअंदाज कर दिया जाए। संपत्ति का विवाद किसी व्यक्ति को हिंसा या प्रताड़ना का अधिकार नहीं देता है। हालांकि, किसी भी मामले में सजा का निर्धारण कानून की निर्धारित प्रक्रिया, साक्ष्यों और सक्षम प्राधिकारी या न्यायालय के निर्णय के अनुसार ही होगा। केवल आरोप लगने से किसी को दोषी नहीं माना जा सकता। उचित जांच और निष्पक्ष सुनवाई इस व्यवस्था के आवश्यक अंग होंगे। कानून का उद्देश्य परिवारों को भयभीत करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि बुजुर्गों के साथ होने वाला अन्याय छिपा न रह जाए। जहां बातचीत और पारिवारिक सहयोग से समस्या सुलझ सकती है, वहां समाधान को प्रोत्साहित किया जा सकता है। लेकिन जहां हिंसा, आर्थिक शोषण या गंभीर प्रताड़ना हो, वहां प्रभावी कानूनी कार्रवाई जरूरी है।


बुजुर्गों से जुड़ी समस्याओं में संपत्ति का विवाद एक संवेदनशील विषय है। जीवनभर की मेहनत से बनाया गया मकान, जमीन, बचत या अन्य संपत्ति कई लोगों के लिए बुढ़ापे की सुरक्षा होती है। इसी के सहारे वे इलाज कराते हैं, अपनी दैनिक जरूरतें पूरी करते हैं और दूसरों पर निर्भर हुए बिना जीवन बिताने की कोशिश करते हैं। लेकिन कई बार संपत्ति को लेकर परिवार में तनाव उत्पन्न होता है। बुजुर्गों पर मकान या जमीन हस्तांतरित करने का दबाव डाला जाता है। कुछ मामलों में संपत्ति अपने नाम कराने के बाद उनकी देखभाल में रुचि कम हो जाती है। कहीं उन्हें अपने ही घर में पराया बना दिया जाता है, तो कहीं उनके आर्थिक निर्णयों पर जबरन नियंत्रण स्थापित कर लिया जाता है।


घटनाएं केवल आर्थिक नुकसान तक सीमित नहीं रहती है। इनसे बुजुर्गों की सुरक्षा, आत्मसम्मान और भविष्य की चिंता भी बढ़ जाती है। इसलिए संपत्ति संबंधी अधिकारों की रक्षा और दुर्व्यवहार के विरुद्ध कार्रवाई एक-दूसरे से जुड़ी हुई है। केरलम के विधेयक में संपत्ति पर अवैध कब्जे और क्रूरता जैसे कृत्यों के लिए दंड का प्रावधान इसी दिशा में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए बुजुर्गों को कानूनी सहायता, संपत्ति संबंधी दस्तावेजों की सुरक्षा और शिकायत दर्ज कराने की सरल व्यवस्था भी उपलब्ध होनी चाहिए। बुजुर्गों को यह जानकारी देना भी आवश्यक है कि किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने या संपत्ति हस्तांतरित करने से पहले वे स्वतंत्र कानूनी सलाह ले सकते हैं। परिवार के प्रति विश्वास महत्वपूर्ण है, लेकिन अपने भविष्य की सुरक्षा के प्रति जागरूक रहना भी उतना ही जरूरी है।


विधेयक की एक उल्लेखनीय अवधारणा बुजुर्गों को सुरक्षित और स्वतंत्र रूप से अपने घर में रहने का अधिकार देना है। संस्थागत देखभाल को अंतिम विकल्प मानने का विचार इस बात पर जोर देता है कि वृद्धावस्था में व्यक्ति को केवल इसलिए अपने परिचित परिवेश से अलग नहीं होना चाहिए कि वह उम्रदराज हो गया है। घर केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं होता। वहां यादें होती हैं, जीवनभर के संबंध होते हैं और वह परिचित वातावरण होता है जिसमें व्यक्ति स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है। बुजुर्गों के लिए अपने घर में रहना मानसिक संतोष और आत्मनिर्भरता से भी जुड़ा हो सकता है। हालांकि, हर व्यक्ति की परिस्थितियां अलग होती हैं। कुछ बुजुर्ग अकेले रहते हुए सुरक्षित महसूस करते हैं, जबकि कुछ को निरंतर चिकित्सा सहायता या विशेष देखभाल की आवश्यकता होती है। ऐसे मामलों में प्रशिक्षित देखभाल केंद्र और वृद्धाश्रम उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं।


महत्वपूर्ण यह है कि किसी बुजुर्ग को उसकी इच्छा के विरुद्ध किसी संस्था में भेजना या उसे घर में रहने के लिए मजबूर करना उचित नहीं होगा। निर्णय लेते समय उसकी इच्छा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और वास्तविक जरूरतों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। घर में देखभाल को प्रोत्साहित करने के लिए परिवारों को भी सहयोग की जरूरत है। नियमित स्वास्थ्य जांच, घर में सुरक्षित आवागमन की व्यवस्था, आपातकालीन संपर्क, दवाओं का उचित प्रबंधन और पड़ोसियों के साथ संपर्क जैसी छोटी पहल बुजुर्गों के जीवन को अधिक सुरक्षित बना सकती है।


आज बदलती पारिवारिक परिस्थितियों में वृद्धाश्रम, वरिष्ठ नागरिक आवास और अन्य देखभाल केंद्र महत्वपूर्ण सेवाएं उपलब्ध करा रहे हैं। लेकिन इन संस्थानों में रहने वाले बुजुर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। विधेयक के तहत वृद्धाश्रमों, देखभाल केंद्रों और धर्मशालाओं के लिए निर्धारित मानक बनाने तथा शोषण से बचाव के लिए सुरक्षा केंद्र स्थापित करने की व्यवस्था का उल्लेख है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बुजुर्गों को देखभाल के नाम पर असुरक्षित या अमानवीय परिस्थितियों में न रहना पड़े। ऐसे संस्थानों में स्वच्छता, भोजन, रहने की सुविधा, चिकित्सा सहायता, कर्मचारियों की उपलब्धता और शिकायत निवारण की व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है। केवल भवन और बिस्तर उपलब्ध करा देना पर्याप्त नहीं है। बुजुर्गों को भावनात्मक सहारा, सम्मानजनक व्यवहार और अपनी बात कहने का अवसर भी मिलना चाहिए।


निगरानी व्यवस्था तभी प्रभावी होगी, जब निरीक्षण नियमित और निष्पक्ष हों। शिकायतों की जांच के लिए स्पष्ट प्रक्रिया हो तथा गंभीर लापरवाही पाए जाने पर जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए। बुजुर्गों और उनके परिजनों को भी यह जानकारी होनी चाहिए कि किसी संस्था के खिलाफ शिकायत कहां और कैसे की जा सकती है। वृद्धाश्रमों को केवल परित्यक्त लोगों के रहने की जगह मानना भी उचित नहीं है। कई वरिष्ठ नागरिक अपनी इच्छा से ऐसे संस्थानों में रहना पसंद करते हैं, क्योंकि वहां उन्हें साथ, सुरक्षा और चिकित्सा सहायता मिलती है। इसलिए लक्ष्य संस्थागत देखभाल को बदनाम करना नहीं, बल्कि उसे जवाबदेह, सुरक्षित और मानवीय बनाना होना चाहिए।


बुजुर्गों की देखभाल एक जिम्मेदारी भरा कार्य है। इसके लिए धैर्य, संवेदनशीलता और कई बार विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। चलने-फिरने में कठिनाई, स्मरणशक्ति संबंधी समस्याएं, लंबे समय की बीमारियां और दैनिक गतिविधियों में सहायता की जरूरत जैसी परिस्थितियों में देखभाल करने वाले व्यक्ति की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। विधेयक में देखभाल करने वालों के लिए निर्धारित प्रशिक्षण, अनिवार्य पुलिस मंजूरी और राज्यस्तरीय प्रमाणन व्यवस्था बनाने का प्रावधान बताया गया है। इससे देखभाल के क्षेत्र में जवाबदेही बढ़ाने और बुजुर्गों की सुरक्षा मजबूत करने में मदद मिल सकती है।


बिना पंजीकरण देखभाल केंद्र चलाने पर दंड का प्रावधान भी इसी उद्देश्य से जुड़ा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, कानून के क्रियान्वयन में बाधा डालने पर दो साल तक कैद और 25 हजार रुपये तक जुर्माना हो सकता है। संदिग्ध दुर्व्यवहार या शोषण की सूचना नहीं देने पर भी 10 हजार रुपये तक जुर्माने का प्रावधान बताया गया है। इन व्यवस्थाओं का प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रमाणन प्रक्रिया कितनी व्यावहारिक है, प्रशिक्षण कितना उपयोगी है और शिकायत मिलने पर अधिकारी कितनी तत्परता से कार्रवाई करते हैं। छोटे देखभाल केंद्रों के लिए भी स्पष्ट नियम और उचित मार्गदर्शन जरूरी होंगे, ताकि सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित हो और व्यवस्था अनावश्यक जटिलता का शिकार न बने। प्रशिक्षित देखभालकर्ता बुजुर्गों की जरूरतों को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। इससे दुर्घटनाओं, उपेक्षा और गलत व्यवहार का जोखिम कम करने में सहायता मिल सकती है।


वृद्धावस्था में गंभीर बीमारी या जीवन के अंतिम चरण से जुड़े चिकित्सा निर्णय बेहद संवेदनशील होते हैं। ऐसे समय में मरीज की इच्छा, उसकी गरिमा और उसके हितों का सम्मान करना आवश्यक है। विधेयक में ‘लिविंग विल’ के माध्यम से गहन चिकित्सा और जीवनरक्षक उपचारों के संबंध में अपनी प्राथमिकताएं व्यक्त करने की सुविधा का उल्लेख है। इसका मूल विचार यह है कि व्यक्ति स्वस्थ और निर्णय लेने में सक्षम रहते हुए भविष्य की गंभीर चिकित्सा परिस्थितियों के बारे में अपनी इच्छाएं दर्ज कर सके। हालांकि, लिविंग विल का अर्थ यह नहीं है कि किसी मरीज की देखभाल बंद करने का निर्णय मनमाने ढंग से लिया जा सकता है। ऐसे दस्तावेजों की वैधता, उनके क्रियान्वयन की शर्तें और चिकित्सकीय प्रक्रिया लागू कानूनों के अनुसार ही निर्धारित होती हैं। मरीज की इच्छा के साथ-साथ उसकी गरिमा, चिकित्सा संबंधी मानकों और कानूनी सुरक्षा का ध्यान रखना आवश्यक है। इस विषय पर परिवारों में खुलकर बातचीत होनी चाहिए। गंभीर बीमारी से जुड़े निर्णय केवल उस समय के लिए नहीं छोड़े जाने चाहिए, जब मरीज स्वयं अपनी बात स्पष्ट रूप से रखने की स्थिति में न हो। पहले से दर्ज इच्छाएं परिवार और चिकित्सकों को निर्णय लेने में मार्गदर्शन दे सकती है।


किसी विधेयक का सर्वसम्मति से पारित होना लोकतांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। इससे यह संदेश मिलता है कि वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और गरिमा जैसे विषय राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर विचार किए जाने चाहिए। बुजुर्गों की समस्याएं किसी एक राज्य, समुदाय या आर्थिक वर्ग तक सीमित नहीं हैं। संपन्न परिवारों में भी उपेक्षा और अकेलेपन की समस्या हो सकती है, जबकि कम आय वाले परिवारों में आर्थिक कठिनाइयां देखभाल को प्रभावित कर सकती हैं। इसलिए समाधान भी बहुआयामी होना चाहिए। कानून के साथ सामाजिक सुरक्षा योजनाएं, पेंशन, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और सामुदायिक देखभाल का विस्तार जरूरी है। आर्थिक रूप से कमजोर बुजुर्गों के लिए समय पर पेंशन और सस्ती दवाएं उपलब्ध हों, तो उनकी दूसरों पर निर्भरता कम हो सकती है। इसी प्रकार, वरिष्ठ नागरिकों के लिए हेल्पलाइन, कानूनी सहायता केंद्र और स्थानीय स्तर पर शिकायत निवारण व्यवस्था उपयोगी साबित हो सकती है। पंचायतों, नगर निकायों, स्वयंसेवी संस्थाओं और सामाजिक संगठनों को भी इस दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। विधेयक की सफलता केवल दंड के आंकड़ों से नहीं मापी जाएगी। असली कसौटी यह होगी कि कितने बुजुर्ग बिना भय के अपनी बात कह पाते हैं, कितने मामलों में समय पर सहायता मिलती है और कितने लोग सम्मान के साथ जीवन जी पाते हैं।


केरलम की इस पहल से अन्य राज्यों को भी वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं की समीक्षा करने की प्रेरणा मिल सकती है। भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण से संबंधित केंद्रीय कानून पहले से मौजूद है। इसलिए नए राज्यीय विधायी प्रावधानों को मौजूदा कानूनी ढांचे के साथ समन्वित करना महत्वपूर्ण होगा। बिहार सहित अनेक राज्यों में बड़ी संख्या में बुजुर्ग ऐसे परिवारों में रहते हैं, जिनके युवा सदस्य रोजगार के लिए दूसरे राज्यों में चले गए हैं। गांवों में अकेले रह रहे माता-पिता, शहरों में छोटे घरों में रहने वाले वरिष्ठ नागरिक और पेंशन पर निर्भर बुजुर्ग अलग-अलग तरह की चुनौतियों का सामना करते हैं। ऐसी परिस्थितियों में राज्यों को केवल दंडात्मक कानूनों पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। बुजुर्गों की नियमित देखभाल, स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता, सार्वजनिक स्थानों को सुविधाजनक बनाना और स्थानीय स्तर पर सहायता नेटवर्क तैयार करना भी जरूरी है। साथ ही, परिवारों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाए जा सकते हैं। विद्यालयों और महाविद्यालयों में पीढ़ियों के बीच सम्मान और संवाद पर कार्यक्रम आयोजित हों। समाज में यह समझ विकसित की जाए कि वृद्धावस्था कमजोरी का पर्याय नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव और योगदान का महत्वपूर्ण पड़ाव है। केरलम का विधेयक यदि प्रभावी ढंग से लागू होता है, तो इससे यह सीख मिल सकती है कि वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों को केवल कागज पर दर्ज करना पर्याप्त नहीं है; उन्हें व्यवहार में सुरक्षित करना भी आवश्यक है।


कानून अपराध को रोकने और पीड़ित को न्याय दिलाने का महत्वपूर्ण साधन है, लेकिन कोई भी कानून परिवारों में प्रेम और संवेदना पैदा नहीं कर सकता। इसके लिए समाज की सोच में बदलाव जरूरी है। माता-पिता की सेवा को केवल धार्मिक कर्तव्य या सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय मानना भी पर्याप्त नहीं है। यह उस मानवीय संबंध की स्वाभाविक जिम्मेदारी है, जिसमें एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को जीवन देती है, उसका पालन-पोषण करती है और उसे आत्मनिर्भर बनाती है। लेकिन बुजुर्गों की गरिमा को केवल संतान की सेवा पर निर्भर नहीं किया जा सकता। हर वरिष्ठ नागरिक को अपने अधिकारों के साथ जीने का अवसर मिलना चाहिए, चाहे उसके बच्चे उसके पास हों या दूर। जिनके परिवार नहीं हैं, जिनके संबंध टूट चुके हैं या जो अकेले जीवन बिताते हैं, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी समाज और शासन की है। बुजुर्गों का सम्मान केवल उनके चरण छूने, त्योहारों पर उपहार देने या सार्वजनिक मंचों से उनकी महिमा गाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। असली सम्मान तब है, जब उनकी बात सुनी जाए, उनके निर्णयों का आदर हो, उनकी आर्थिक स्वतंत्रता सुरक्षित रहे और बीमारी या निर्बलता के समय उन्हें बोझ न समझा जाए। वृद्धावस्था जीवन का स्वाभाविक पड़ाव है। आज जो युवा हैं, वे भी कल बुजुर्ग होंगे। इसलिए वरिष्ठ नागरिकों के अधिकारों की रक्षा किसी दूसरे वर्ग के लिए किया जाने वाला उपकार नहीं, बल्कि भविष्य के समाज को सुरक्षित बनाने का प्रयास है।


केरलम सीनियर सिटीजंस (केयर एंड प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स) बिल, 2026 को सर्वसम्मति से पारित किए जाने की पहल वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और गरिमा पर नए सिरे से ध्यान आकर्षित करती है। दुर्व्यवहार, संपत्ति पर अवैध कब्जे, परित्याग और बिना पंजीकरण देखभाल केंद्र चलाने जैसे मामलों के लिए दंड का प्रावधान जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। हालांकि, इस विधेयक के वास्तविक प्रभाव का आकलन इसके अंतिम कानूनी स्वरूप, लागू होने की स्थिति और क्रियान्वयन की व्यवस्था के आधार पर ही किया जाना चाहिए। कानून में प्रावधान होना और उनका जमीन पर प्रभावी होना दो अलग-अलग बातें हैं। फिर भी इसका व्यापक संदेश स्पष्ट है कि बुजुर्गों की सुरक्षा केवल परिवार की इच्छा पर निर्भर नहीं रहनी चाहिए। उन्हें अपने घर में सुरक्षित रहने, अपनी संपत्ति की रक्षा करने, चिकित्सा संबंधी प्राथमिकताएं व्यक्त करने और सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार मिलना चाहिए। जिस समाज में बुजुर्ग सुरक्षित होते हैं, वहां पीढ़ियों के बीच विश्वास मजबूत होता है। जिस परिवार में माता-पिता का सम्मान होता है, वहां बच्चों को भी रिश्तों का वास्तविक अर्थ समझने का अवसर मिलता है। अंततः सवाल यह नहीं है कि बुजुर्गों की उपेक्षा करने पर कितने साल की सजा होगी। बड़ा सवाल यह है कि क्या हम ऐसा समाज बना पाएंगे, जहां किसी माता-पिता को अपने ही घर में सम्मान पाने के लिए कानून का दरवाजा खटखटाने की नौबत न आए? कानून अन्याय करने वालों को दंडित कर सकता है, लेकिन बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कान तभी लौटेगी, जब परिवारों में संवेदना, समाज में जिम्मेदारी और शासन में जवाबदेही एक साथ दिखाई देगी। बुढ़ापा किसी का अपराध नहीं है; यह जीवन का वह पड़ाव है, जहां सबसे अधिक सम्मान, सुरक्षा और अपनापन मिलना चाहिए।


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