महादेव का नाम हो - ‘पाकिस्तानेश्वर’ से ‘सिन्धु-गंगेश्वर’

Jitendra Kumar Sinha
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धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की नगरी काशी में छोटी शीतला घाट स्थित राजमंदिर के पाकिस्तानेश्वर महादेव मंदिर के नाम परिवर्तन की मांग उठी है। सिंधी समाज के प्रतिनिधियों ने मंगलवार को नगर आयुक्त कार्यालय पहुंचकर अपर नगर आयुक्त विनोद कुमार गुप्ता को ज्ञापन सौंपा। समाज के प्रतिनिधियों ने मंदिर का नाम बदलकर ‘सिन्धु गंगेश्वर महादेव’ किए जाने की मांग की है। सिंधी समाज का कहना है कि मंदिर में स्थापित शिवलिंग का संबंध विभाजन के समय सिंध प्रांत से काशी आए हिन्दू सिंधी परिवारों की आस्था और धार्मिक परंपरा से है। ऐसे में मंदिर के वर्तमान नाम के स्थान पर ऐसा नाम होना चाहिए, जो सिंध और गंगा की सांस्कृतिक एवं धार्मिक स्मृतियों को जोड़ता हो।


पूर्व पार्षद सिगरा शंकर विशनानी के अनुसार, भारत विभाजन के समय सिंध प्रांत से अनेक हिन्दू सिंधी परिवार विस्थापित होकर भारत आए। इन्हीं परिवारों में से कुछ लोग अपने साथ एक शिवलिंग भी काशी लेकर आए थे। उनका उद्देश्य शिवलिंग की पूजा-अर्चना करना और उसे पवित्र जल से अभिषेक करना था। बताया जाता है कि जब सिंधी परिवार छोटी शीतला घाट पहुंचे और वहां शिवलिंग पर जल प्रवाहित करने लगे, तब स्थानीय लोगों ने उन्हें सुझाव दिया कि शिवलिंग को यहीं स्थापित कर दिया जाए। सिंधी समाज के लोगों ने स्थानीय लोगों के अनुरोध को स्वीकार किया और विधि-विधान से शिवलिंग की स्थापना कर दी। इस प्रकार यह स्थान सिंधी समाज की धार्मिक आस्था के साथ-साथ काशी की गंगा-जमुनी सांस्कृतिक स्मृतियों से भी जुड़ गया।


ज्ञापन में सिंधी समाज ने मांग की है कि मंदिर का नाम ‘पाकिस्तानेश्वर महादेव’ से बदलकर ‘सिन्धु गंगेश्वर महादेव’ किया जाए। समाज के प्रतिनिधियों का कहना है कि ‘सिन्धु’ शब्द सिंध की ऐतिहासिक-सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है, जबकि ‘गंगा’ काशी की सनातन धार्मिक परंपरा और आस्था का प्रतीक है। इस दृष्टि से प्रस्तावित नाम सिंध से विस्थापित होकर काशी पहुंचे सिंधी समाज और काशी की धार्मिक परंपरा के बीच संबंध को अभिव्यक्त करता है।


शंकर विशनानी ने दावा किया है कि शिवलिंग की स्थापना के संबंध में मंदिर परिसर में मौजूद प्राचीन शिलापट्ट भी महत्वपूर्ण प्रमाण है। उनके अनुसार, इस शिलापट्ट पर उन सिंधी भाषी लोगों के नाम अंकित हैं, जिन्होंने शिवलिंग की स्थापना में भूमिका निभाई थी। सिंधी समाज का कहना है कि मंदिर का इतिहास स्थानीय धार्मिक परंपरा और विभाजन के बाद काशी पहुंचे सिंधी परिवारों की स्मृतियों से जुड़ा हुआ है। इसलिए मंदिर के नाम को लेकर समाज की भावनाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।


सिंधी समाज के प्रतिनिधियों ने वर्तमान नाम पर आपत्ति जताते हुए कहा कि ‘पाकिस्तानेश्वर’ नाम काशी जैसे धार्मिक नगर में अनावश्यक विवाद का कारण बन सकता है। उनका आरोप है कि मंदिर के नाम के माध्यम से सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ज्ञापन में नगर निगम से ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग भी की गई है, जिनके बारे में समाज का आरोप है कि वे धार्मिक और सामाजिक माहौल को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं।


भारत विभाजन केवल सीमाओं के पुनर्गठन की घटना नहीं था, बल्कि लाखों परिवारों के विस्थापन और उनकी स्मृतियों से जुड़ा अध्याय भी रहा है। सिंधी समाज के लिए सिंध की धरती आज भी सांस्कृतिक और भावनात्मक पहचान का हिस्सा है। विभाजन के बाद देश के विभिन्न हिस्सों में बसे सिंधी परिवारों ने अपनी भाषा, संस्कृति, धार्मिक परंपराओं और सामाजिक पहचान को जीवित रखा। काशी में स्थापित यह शिवलिंग भी इसी स्मृति का प्रतीक माना जा रहा है। सिंधी समाज का प्रस्तावित नाम ‘सिन्धु गंगेश्वर महादेव’ इसी विरासत को नई पहचान देने की कोशिश के रूप में सामने आया है।


ज्ञापन सौंपे जाने के बाद अब इस मांग पर नगर निगम के स्तर पर क्या कार्रवाई होती है, इस पर निगाह रहेगी। मंदिर के नाम परिवर्तन का विषय धार्मिक आस्था, स्थानीय इतिहास और सामाजिक भावनाओं से जुड़ा है। ऐसे में किसी भी निर्णय के लिए मंदिर के ऐतिहासिक दस्तावेजों, शिलापट्ट, स्थानीय परंपराओं और संबंधित पक्षों की बातों का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा। काशी में महादेव की उपासना सदियों से धार्मिक जीवन का केंद्र रही है। ऐसे में सिंधी समाज की यह मांग केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं है, बल्कि विभाजन की स्मृतियों को काशी की गंगा और शिवभक्ति से जोड़ने की एक सांस्कृतिक पहल के रूप में भी देखी जा रही है।


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