युद्ध के बाद शांति क्यों, युद्ध से पहले क्यों नहीं?

Jitendra Kumar Sinha
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कभी घर का आंगन ही संसार हुआ करता था। परिवार के बीच प्रेम, विश्वास, अपनापन और संवाद जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा माने जाते थे। आज वही घर यदि संयुक्त राष्ट्र के सभाकक्ष का प्रतीक बन जाए, तो चारों ओर शांति, सद्भावना और प्रेम कुछ ऐसे गायब दिखाई देते हैं, जैसे स्वाति नक्षत्र की बूंद आकाश में विलीन हो गई हो। मनुष्य ने विज्ञान में अद्भुत प्रगति की, आकाश को छुआ, समुद्र की गहराइयों को नापा और अंतरिक्ष तक अपनी पहुंच बनाई, लेकिन अपने भीतर के भय, अहंकार, लालच और नफरत पर विजय पाने में अब भी असफल दिखाई देता है। आज राष्ट्र हो या व्यक्ति, पहला विचार सुरक्षा का आता है और उसके बाद शांति का। पहले हथियार, फिर संवाद; पहले शक्ति-प्रदर्शन, फिर समझौता; पहले भय पैदा करना, फिर प्रेम की बात, क्या यही मानव सभ्यता की नियति है? श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध पंक्ति “भय बिनु होइ न प्रीति” को हमने शायद आवश्यकता से अधिक अपने जीवन का सिद्धांत बना लिया है। इस पंक्ति का अपना संदर्भ और अर्थ है, लेकिन आधुनिक दुनिया में यदि इसका अर्थ यह निकाल लिया जाए कि भय के माध्यम से ही स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है, तो सवाल खड़ा होना स्वाभाविक है। सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि शांति के लिए सुरक्षा जरूरी है या सुरक्षा से ही शांति संभव है? यह प्रश्न कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे पूछा जाए कि पहले मुर्गी आई या अंडा?


किसी व्यक्ति को अपने घर, परिवार और जीवन की सुरक्षा चाहिए। किसी राष्ट्र को अपनी सीमाओं, नागरिकों और संप्रभुता की रक्षा करनी होती है। इसलिए सुरक्षा को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन सुरक्षा और शांति को एक ही अर्थ मान लेना भी उचित नहीं है। सुरक्षा हमें बाहरी खतरे से बचा सकती है, लेकिन शांति हमारे भीतर भय को कम करती है। सुरक्षा हथियारों से मजबूत हो सकती है, लेकिन शांति विश्वास से मजबूत होती है। सुरक्षा सीमा पर प्रहरी खड़ा करती है, जबकि शांति सीमाओं के दोनों ओर मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखने की दृष्टि पैदा करती है। यदि हथियारों का बढ़ना ही शांति की गारंटी होता, तो दुनिया में सबसे अधिक हथियार रखने वाले राष्ट्रों के नागरिक सबसे अधिक शांत होते। लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। एक ऐसा संसार, जहां हर राष्ट्र दूसरे राष्ट्र को संभावित शत्रु समझे, जहां हर पड़ोसी दूसरे पड़ोसी से भयभीत रहे और जहां प्रत्येक व्यक्ति अपने हित की रक्षा के लिए किसी भी सीमा तक जाने को तैयार हो, वह सुरक्षित दिखाई दे सकता है, लेकिन शांत नहीं।


युद्ध की शुरुआत हमेशा सीमा पर नहीं होती है। कई बार युद्ध पहले मनुष्य के भीतर जन्म लेता है। अहम कहता है कि मैं सही हूं। अहंकार कहता है कि सिर्फ मेरी बात मानी जाए। लालच कहता है कि जो दूसरे के पास है, वह भी मेरा होना चाहिए। भय कहता है कि पहले हमला करो, कहीं दूसरा हमला न कर दे और नफरत कहती है कि सामने वाला मनुष्य नहीं, शत्रु है। यहीं से संघर्ष की जमीन तैयार होती है। व्यक्ति के स्तर पर यही मानसिकता परिवार को तोड़ती है, समाज में दूरी पैदा करती है और राष्ट्रों के स्तर पर यही सोच युद्ध का कारण बन सकती है। इसलिए शांति की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के सभाकक्ष से पहले मनुष्य के भीतर होनी चाहिए। जिस दिन मनुष्य अपने भीतर के युद्ध को जीत लेगा, उसी दिन बाहरी युद्धों की संभावना भी कम होने लगेगी।


यह मानना होगा कि सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन स्थायी शांति का आधार केवल सुरक्षा नहीं हो सकती। शांति का सबसे मजबूत आधार विकास है- मानसिक विकास, सामाजिक विकास, आर्थिक विकास और मानवीय विकास। जिस समाज में शिक्षा होगी, वहां संवाद की संभावना बढ़ेगी। जहां रोजगार होगा, वहां निराशा कम होगी। जहां न्याय होगा, वहां प्रतिशोध की भावना कमजोर होगी। जहां समान अवसर होंगे, वहां असंतोष का आधार कम होगा। जहां स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन होगा, वहां मनुष्य के भीतर हिंसा की जमीन कमजोर पड़ेगी। इसलिए विकास को केवल सड़कों, पुलों, कारखानों और सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों से नहीं मापा जाना चाहिए। विकास का अर्थ यह भी है कि मनुष्य दूसरे मनुष्य के अस्तित्व का सम्मान करना सीखे। भौतिक विकास जीवन को सुविधा देता है, लेकिन मानसिक विकास जीवन को दिशा देता है।


द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मानवता ने युद्ध की विभीषिका को नजदीक से देखा। परमाणु हथियारों ने यह स्पष्ट कर दिया कि विज्ञान यदि विवेक से अलग हो जाए तो मानव सभ्यता के लिए वरदान के बजाय विनाश का माध्यम बन सकता है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अल्बर्ट आइंस्टीन और बर्ट्रेंड रसेल ने मानवता को परमाणु युद्ध के खतरे के प्रति चेताया। 1955 में जारी रसेल-आइंस्टीन घोषणापत्र ने वैज्ञानिकों और मानव समाज से युद्ध तथा परमाणु विनाश के खतरे पर गंभीरता से विचार करने का आह्वान किया था। उस चेतावनी को लगभग सात दशक बीत चुके हैं। विज्ञान ने तब से असाधारण प्रगति की है, लेकिन मानवता के सामने युद्ध और विनाश का प्रश्न आज भी समाप्त नहीं हुआ। यानि समस्या विज्ञान की कमी नहीं है, बल्कि विवेक और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है। मनुष्य ने परमाणु बम बना लिया, लेकिन अभी तक ऐसा वैश्विक विश्वास नहीं बना पाया कि उसे इस्तेमाल करने की आवश्यकता ही न पड़े।


इतिहास का एक विचित्र अध्याय है। युद्ध शुरू होने से पहले राष्ट्र अपनी शक्ति गिनाते हैं। युद्ध के दौरान विनाश की गणना होती है। युद्ध के बाद शांति सम्मेलन होते हैं। जब शहर उजड़ जाते हैं, तब पुनर्निर्माण की बात होती है। जब परिवार बिखर जाते हैं, तब मानवीय संवेदना की चर्चा होती है। जब सैनिक और नागरिक मारे जाते हैं, तब शांति का महत्व समझ में आता है। जब अर्थव्यवस्थाएं तबाह हो जाती हैं, तब विकास की आवश्यकता महसूस होती है। तो प्रश्न यह है कि जो बात युद्ध के बाद समझ में आती है, उसे युद्ध से पहले क्यों नहीं समझा जा सकता है? यदि बातचीत युद्ध के बाद हो सकती है तो युद्ध से पहले क्यों नहीं? यदि समझौता हजारों लोगों की मृत्यु के बाद संभव है तो हजारों लोगों की मृत्यु से पहले क्यों नहीं? यदि शांति सम्मेलन बमों के शांत होने के बाद हो सकता है, तो बम गिरने से पहले शांति सम्मेलन क्यों नहीं हो सकता?


इतिहास के कैलेंडर में कई ऐसे दिन हैं जो युद्धों, संघर्षों और सैन्य अभियानों की स्मृतियां लेकर आते हैं। हैफा की लड़ाई से जुड़ा स्मृति दिवस हो या भारत और ब्रिटिश शासन के बीच हुए ऐतिहासिक संघर्षों की याद, ऐसे अवसर हमें केवल विजय और पराजय का हिसाब रखने के लिए नहीं मिले हैं। इतिहास का वास्तविक उद्देश्य भविष्य को बेहतर बनाना है। यदि हम युद्धों को केवल वीरता की कहानियों के रूप में याद करेंगे, तो हम उनके पीछे छिपे मानवीय दर्द को भूल सकते हैं। लेकिन यदि हम उन्हें इस दृष्टि से देखेंगे कि युद्ध ने मनुष्य से क्या छीना, परिवारों को कैसे तोड़ा और समाजों को कितने लंबे समय तक प्रभावित किया, तो इतिहास शांति का शिक्षक बन सकता है। इतिहास की सबसे बड़ी उपयोगिता यही है कि वह अपनी गलतियों को दोहराने से रोकता है।


दुनिया के लगभग हर राष्ट्र ने अपनी सुरक्षा के लिए रक्षा व्यवस्था बनाई है। सेनाएं हैं, सीमाएं हैं, रक्षा मंत्रालय हैं, खुफिया तंत्र हैं और सैन्य बजट हैं। यह सब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक व्यवस्थाओं का हिस्सा है। लेकिन एक प्रश्न मानवता से पूछा जाना चाहिए कि क्या राष्ट्रों को शांति के लिए भी उतनी ही संस्थागत गंभीरता नहीं दिखानी चाहिए? क्यों न प्रत्येक देश में ऐसा मजबूत संस्थागत तंत्र हो जिसका प्रमुख उद्देश्य संघर्षों को युद्ध में बदलने से पहले रोकना हो? क्यों न अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए स्थायी संवाद व्यवस्था और मजबूत की जाए? क्यों न युवाओं को युद्ध की तकनीक के साथ शांति की संस्कृति भी सिखाई जाए? क्यों न कूटनीति को युद्ध के विकल्प के रूप में और अधिक सक्षम बनाया जाए? इसे किसी पारंपरिक मंत्रालय के नाम या ढांचे तक सीमित करने के बजाय एक “शांति तंत्र” के रूप में भी विकसित किया जा सकता है- जो शिक्षा, कूटनीति, सामाजिक संवाद, संघर्ष-निवारण और मानवीय सहयोग को एक साथ जोड़ सके। क्योंकि जिस दुनिया ने युद्ध की तैयारी के लिए संस्थाएं बना ली हैं, उसे शांति की तैयारी के लिए भी संस्थागत व्यवस्था विकसित करनी होगी।


श्रीरामचरितमानस की पंक्ति को उसके मूल संदर्भ से काटकर देखने के बजाय उसके व्यापक दार्शनिक संदर्भ को समझना जरूरी है। भय से उत्पन्न अनुशासन कुछ परिस्थितियों में तत्काल परिणाम दे सकता है, लेकिन स्थायी प्रेम और विश्वास भय के आधार पर नहीं टिकते। एक बच्चा माता-पिता से केवल डरता रहे तो घर अनुशासन का स्थान तो हो सकता है, आत्मीयता का नहीं। नागरिक सरकार से केवल भयभीत रहें तो कानून का पालन संभव है, लेकिन लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर हो सकता है। राष्ट्र एक-दूसरे से केवल डरते रहें तो युद्ध टल सकता है, लेकिन स्थायी मित्रता पैदा नहीं होती। इसलिए आधुनिक विश्व को भय से आगे बढ़कर विश्वास आधारित सुरक्षा की ओर जाना होगा।


शांति की बात करने वाले को कमजोर समझना मानव सभ्यता की बड़ी भूलों में से एक है। युद्ध करना आसान हो सकता है,  युद्ध रोकना कठिन है। क्रोध करना आसान है, संवाद करना कठिन है। बदला लेना आसान है, क्षमा करना कठिन है। दीवार बनाना आसान है, पुल बनाना कठिन है। इसलिए शांति निष्क्रियता नहीं है। शांति सक्रिय प्रयास है। इसमें धैर्य चाहिए, संवाद चाहिए, आत्मसंयम चाहिए और सबसे बढ़कर दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करने की क्षमता चाहिए। राष्ट्र की शक्ति केवल उसके हथियारों में नहीं होती। उसकी शक्ति उसकी अर्थव्यवस्था, शिक्षा, संस्थाओं, नागरिकों के विश्वास और कूटनीतिक क्षमता में भी होती है।


संयुक्त राष्ट्र में भाषण देना आसान है, लेकिन घर में शांति कायम करना कठिन। दुनिया के राष्ट्रों से युद्ध न करने की अपील करना आसान है, लेकिन अपने भीतर के अहंकार को शांत करना कठिन। इसलिए शांति की पहली प्रयोगशाला हमारा अपना घर होना चाहिए। परिवार में संवाद हो। समाज में सम्मान हो। राजनीति में मर्यादा हो। धर्म में करुणा हो। शिक्षा में मानवता हो। अर्थव्यवस्था में संवेदनशीलता हो और राष्ट्रों के बीच संबंधों में संवाद हो। यदि ये छोटे-छोटे वृक्ष लगाए जाएं तो एक दिन शांति का विशाल वन तैयार हो सकता है।


मानवता ने युद्धों से बहुत कुछ सीखा है। लेकिन अब सीख को व्यवहार में बदलने का समय है। सुरक्षा आवश्यक है, लेकिन सुरक्षा का अंतिम उद्देश्य शांति ही होना चाहिए। हथियारों का उद्देश्य युद्ध को बढ़ाना नहीं, युद्ध को रोकने की क्षमता पैदा करना होना चाहिए। राष्ट्रहित आवश्यक है, लेकिन राष्ट्रहित और मानवहित को एक-दूसरे का विरोधी नहीं बनाया जा सकता। आज दुनिया को ऐसे नेताओं, संस्थाओं और नागरिकों की आवश्यकता है जो युद्ध शुरू होने के बाद शांति की तलाश न करें, बल्कि युद्ध शुरू होने से पहले ही शांति का रास्ता खोज लें। क्योंकि युद्ध के बाद शांति स्थापित करना ऐसा है जैसे घर जलने के बाद पानी ढूंढना। सच्ची दूरदर्शिता यह होगी कि आग लगने से पहले ही पानी उपलब्ध हो और शायद यही वह समय है जब मानवता को अपनी प्राथमिकताएं बदलनी होगी। पहले भय नहीं, विश्वास।  पहले हथियार नहीं, संवाद।  पहले युद्ध नहीं, शांति।  पहले विनाश नहीं, विकास। घर का आंगन हो या संयुक्त राष्ट्र का सभाकक्ष, शांति तभी संभव होगी जब मनुष्य यह समझे कि सुरक्षा दीवारों से मिल सकती है, लेकिन स्थायी शांति पुलों से ही आती है और अंततः प्रश्न केवल यह नहीं है कि पहले मुर्गी आई या अंडा। प्रश्न यह है कि मानवता कब यह तय करेगी कि उसके भविष्य को जन्म देने वाला तत्व भय होगा या विश्वास? युद्ध होगा या शांति?


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